तेज़ाब फेंकने वालों के लिए मौत की सज़ा?

Image caption भारत , पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे देशों में सबसे ज़्यादा मामले देखने को मिलते हैं

"किसी के चेहरे पर तेज़ाब फेंक कर, उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बर्बाद करके, उसे असहाय बनाले वाले को सिर्फ़ पाँच साल की सज़ा कहाँ का न्याय है? वो तो ज़मानत पर रिहा होकर अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं लेकिन मेरी जैसी लड़कियों का तो जीवन नष्ट हो गया."

हमले से पहले और हमले के बाद: तस्वीरों में

एसिड अटैक की शिकार हुई युवती अनु से मिलने के बाद उसका पूछा हुआ ये सवाल बार-बार मेरे दिमाग में घूम रहा है. अनु तेज़ाब फेंकने वालों के लिए मौत की सज़ा चाहती है.

केंद्र सरकार हाल ही में नया अध्यादेश लेकर आई है जिसमें दोषियों को दस साल की न्यूनतम सज़ा का प्रस्ताव रखा गया है.

वही पाकिस्तान में ऐसे मामले अब बेहद गंभीरता से लिए जाते हैं. वहाँ एसिड अटैक के मामले आंतकवादी निरोधी अदालतों में चलते हैं जिसमें दोषियों को 10 लाख का जुर्माना और दस साल तक की सज़ा होती है. पाकिस्तान में हाल में तेज़ाब फेंकने के मामले में मौत की सज़ा सुनाई गई. बांग्लादेश में तो तेज़ाब हमलों में मौत की सज़ा तक का प्रावधान है.

तेज़ाब हमले के बाद ज़िंदा लाश हूँ: अनु

कमलेश जैन सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं और एसिड अटैक पीड़ित का मामला भी लड़ रही हैं. कमलेश जैन कहती है. "एसिड अटैक हमलों को लेकर सरकार, कानून और समाज सभी बेहद असंवेदनशील है. वे इससे लड़की पर होने वाले असर को समझते ही नहीं. इसलिए दोषियों को इतनी कम सज़ा होती है. इस अपराध के लिए न्यूनतम सज़ा उम्र कैद होनी चाहिए. मैं एसिड अटैक को बलात्कर से भी जघन्य अपराध मानती हूँ."

भारत में बहुत से लोग किसी भी अपराध के लिए मौत की सज़ा के खिलाफ हैं लेकिन कमलेश जैन एसिड अटैक के मामलों में इसे सही बताती हैं.

कमलेश जैन मामलों के निपटारे में लगने वाले लंबे समय पर भी सवाल उठाती हैं. अनु मुखर्जी पर 2004 में तेज़ाब फेंका गया था जबकि फैसला 2011 में आया.

पुरुषवादी मानसिकता

लेकिन बात सिर्फ कानून तक आकर नहीं रूकती. समाज का भी इसमें अहम हिस्सा है. कई बार देखा गया है कि घरेलू हिंसा का शिकार महिलाएँ एसिड अटैक का शिकार हो जाती हैं या फिर प्रेम संबंध बिखरने पर या प्रेम प्रस्ताव ठुकरा देने पर पुरुष महिला पर तेज़ाब डालकर अपना बदला लेता है.

सोनाली ने हमले के बाद इच्छामृत्यु माँगी थी

ईरान की एक युवती अमानेह को 2007 में माजिद ने शादी का प्रस्ताव दिया तो अमानेह ने इसे ठुकरा दिया. माजिद को ये नागवार गुज़रा तो उसने लड़की के चेहरे पर तेज़ाब फेंक दिया. वो अंधी हो गई और चेहरा भी खराब हो गया.

इन हालातों में कानून के दायरे से परे समाज में एसिड अटैक की पीडितों को स्वीकार करने के लिए पहल ज़रूरी है.

ब्रिटेन की केटी एक उभरती हुई मॉडल थीं. लेकिन 2008 में उनके पूर्व बॉयफ्रेंड ने केटी के चेहरे पर किसी से तेज़ाब डलवा दिया. केटी ये कहती आई हैं कि जिन महिलाओं का चेहरा खराब हो जाता है उन्हें लेकर समाज के रवैये में बदलाव की ज़रूरत है ताकि उन्हें स्वीकार्यता मिल सके.

अकसर देखा गया है कि एसिड अटैक की पीड़ित महिलाएँ समाज में अलग थलग पड़ जाती हैं. कानून भी ज़्यादा साथ नहीं देता.

एसिड अटैक की शिकार हुई सभी पीड़ित महिलाएँ एक सुर में इस बात पर ज़ोर देती हैं कि इस अपराध के लिए कड़े से कड़े कानून की जरूरत है ताकि दोषियों के मन में कानून का खौफ हो. वहीं समाज को भी पीड़ितों के ज़ख्मों पर हमदर्दी और सहारे का मरहम लगाना होगा ताकि ये ज़िंदगी में वापस लौटने की तरफ एक कदम बढ़ा सकें.

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