'मुलायम के बेटवा में कलेजा' दिखा था!

अखिलेश यादव
Image caption अखिलेश साल भर पहले पिता की राजनीतिक विरासत संभालते हुए मुख्यमंत्री बने थे

उत्तर प्रदेश की राजनीति ने 2012 में एक नया सवेरा देखा था जब अखिलेश यादव ने तमाम कयासों को दरकिनार करते हुए एक मज़बूत सरकार का गठन किया था.

फर्राटे से अंग्रेजी बोलने वाले, लोगों से गले मिलने को बेताब अखिलेश यादव ने चुनाव के पहले जब 'साइकिल यात्रा' शुरू की थी तब प्रदेश में समाजवादी पार्टी के समर्थकों के अलावा दूसरों में भी एक आस बंधी थी.

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आस एक ऐसी सरकार की जिसमें सुशासन होगा, भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और युवा वर्ग के सपने और हौसले दोनों बुलंद होंगे.

उस विधानसभा चुनाव कवर करते वक़्त न जाने कितने ऐसे लोगों से मिलना हुआ था जिन्हें 'मुलायम के बेटवा में कलेजा' दिखा था.

अगर यह कहूँ कि दूर दिल्ली में बैठ कर असलियत बगल में दिखती है तो थोडा ग़लत होगा.

लेकिन जब साल भर बाद दोबारा तमाम ऐसे इलाकों में जाना हुआ जहाँ से अखिलेश भारी मतों से जीते थे और जहाँ उनकी 'आंधी' सी आई हुई थी, तब थोड़ी निराशा ज़रूर हाथ लगी.

निराशा

वहीं वे लोग जो समाजवादी पार्टी के मसीहा के रूप में अखिलेश यादव को देखते थे, आज उन दंगों को याद कर रहे हैं जो पिछले एक साल में उत्तर प्रदेश के क़रीब ग्यारह कस्बों और गांवों में हुए हैं.

कोसीकलां (मथुरा), मुज़फ्फरनगर, मेरठ, प्रतापगढ़, बरेली, फैजाबाद और टांडा कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं जहाँ दंगों की वजह जान या माल का नुकसान हुआ.

फैजाबाद के एक सम्मानित व्यक्ति ने मुझसे कहा,"जिस इलाके में बाबरी मस्जिद गिर जाने के बाद सांप्रदायिक तनाव नहीं बढ़ा, उसी इलाके में दुर्गा पूजा और दशहरे के बाद से दंगे भड़क उठे."

मथुरा के कोसीकलां में एक शाही मस्जिद है जिसके इमाम तीसरी पीढ़ी के हैं.

पिछले साल इलाके में हुए सांप्रदायिक तनाव और ख़ून ख़राबे के सदमे से आज तक निकल नहीं सके हैं इमाम साहब.

कहते हैं,"हमारे इलाके में हिन्दुओं का काम मुसलमान के बिना और मुसलमान की रोज़ी हिन्दुओं के बिना नहीं चलती थी. लेकिन आज आलम यह है कि इलाके में जैसे किसी ने दोनों समुदायों के बीच एक लकीर खींच दी है."

अफ़वाह

उत्तर प्रदेश में क़रीब सात ज़िलों में घूमते वक़्त न जाने कितने ऐसे लोग मिले जिन्हें लगा कि अखिलेश यादव आदमी तो बेहतरीन हैं, लेकिन अपनी ही सरकार पर नकेल कस पाने में कामयाब नहीं रहे हैं.

मथुरा और अंबेडकर नगर ऐसे दो ज़िले लगे जहां आम लोग इस बात से ज्यादा हैरान हैं कि जब सांप्रदायिक अफवाहें फैलनी शुरू होती हैं तो प्रशासन देर से ही हरकत में क्यों आता है?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई लोग अभी भी इस बात से खफ़ा हैं कि जहाँ दंगे भड़के वहां ज़्यादातर बाहर के लोग पहुंचे और हिंसा को अंजाम दिया.

यात्रा के दौरान चार ऐसे परिवारों से भी सामना हुआ जिन्होंने अपनों को इन दंगों की भेंट चढ़ते देखा.

बिगड़ते हालात

Image caption युवा मुख्यमंत्री से आम लोगों की बहुत उम्मीदें हैं

इन परिवारों मिलकर लगा कि केवल मुआवज़े भर से ही इन लोगों की दिन पर दिन बिगड़ती दशा सुधरने वाली नहीं है.

हालांकि इस बात में कोई शक नहीं कि ज़्यादातर दंगा प्रभावित परिवारों को मुआवजा देने में उत्तर प्रदेश सरकार ने ज्यादा देर नहीं की. लेकिन बुनियादी सवाल यही है कि दंगे आखिर भड़कने ही क्यों दिए गए?

अब इसे अखिलेश यादव का दुर्भाग्य कहिए या फिर उनके आलोचकों की खुशकिस्मती, सच्चाई यही है कि ज्यादा से ज्यादा आम लोगों का मानना यही है कि सरकार की प्रशासन पर से लगाम ढीली पड़ती जा रही है.

देवरिया के एक गाँव में जब मैं मृत पुलिस उपाधीक्षक ज़ियाउल हक के परिवार से मिलने जा रहा था तो रास्ते में एक ढाबे पर रुक कर चाय पी और उनके घर का पता पूछा.

जवाब में पता भी मिला और एक सवाल भी."पिछली सरकार में कितने डीएसपी मारे गए रहे भैया".

इस तरह के कई सवालों के जवाब अखिलेश यादव को कम से कम तैयार रखने होंगे.

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