लालू नीतीश में फिर 'तेरा या मेरा' की जंग

Image caption 72 फीट ऊँची इस प्रतिमा को गांधी की सबसे ऊँची प्रतिमा माना जा रहा है

पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अब दो-दो प्रतिमाएं खड़ी हैं. एक की ऊंचाई 72 फ़ीट है, जबकि दूसरी मात्र 16 फ़ीट ऊंची है .

बिहार के दो बड़े नेताओं लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार से जुड़े इस दिलचस्प मूर्ति-प्रसंग के कुछ तल्ख़ राजनीतिक पहलू भी उभर आए हैं .

लगभग 10 करोड़ रूपए की लागत वाली बड़ी मूर्ति का निर्माण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसी वर्ष फ़रवरी महीने में कराया है . इसे विश्व में गांधी की सबसे बड़ी मूर्ति माना गया है .

मैदान के बीच में गांधी की जो छोटी मूर्ति लगी है, उसे 22 साल पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने बनवाया था. उस पर सिर्फ 2 लाख 10 हज़ार रूपए की लागत आई थी .

अब समस्या यह है कि इन दोनों गांधी-प्रतिमाओं के बहाने लालू और नीतीश खेमों के बीच छोटे-बड़े का विवाद तल्ख़ होता जा रहा है.

लालू प्रसाद ने इस ख़बर पर अपने पहले बयान में ही कहा था, ''नीतीश कुमार को ये पच ही नहीं रहा है कि यहाँ गांधी मैदान में गांधी-प्रतिमा लगाने का श्रेय लालू के खाते में रहे.''

वर्चस्व की लड़ाई!

अब लालू-ख़ेमे ने धमकी दी है कि छोटी मूर्ति हटाई गई तो भारी बावेला मच जाएगा. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद और महासचिव राम कृपाल यादव इसे एक सियासी मुद्दा बनाने का संकेत दे चुके हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''इसमें कहीं न कहीं नीतीश जी का राजनीतिक ईर्ष्या-द्वेष, जलन और अहंकार दिखता है. अपने आप को लालू जी से बड़ा साबित करने के लिए उन्होंने दस-ग्यारह करोड़ रूपए की लागत से गांधीजी की बड़ी मूर्ति बनवाई. अब अगर लालू जी की सरकार के समय वाली मूर्ति हटाई गईं तो हमारी पार्टी इसका जबर्दस्त प्रतिकार करेगी. मैं मुख्यमंत्री को आगाह करना चाहता हूँ कि वो ऐसा करने से बाज़ आएं.''

विरोध की इस आशंका ने नीतीश सरकार की चिंता बढ़ा दी है. बड़ी मूर्ति के निर्माण में बतौर मार्गदर्शक अहम् भूमिका निभाने वाले गांधीवादी विचारक रज़ी अहमद ऐसे विरोध या विवाद को मुनासिब नहीं मानते.

उनहोंने कहा, ''ये सियासी मसला नहीं बनना चाहिए. अब जो एक बड़ी मूर्ति बनी है और उसके सामने एक छोटी मूर्ति पहले से है, दोनों में राज्य सरकार का ही पैसा लगा है तो मुनासिब यही होगा कि किसी टकराव से बचते हुए छोटी मूर्ति को उचित स्थान चुनकर वहां शिफ़्ट कर देना चाहिए.''

उधर गांधी मैदान में इन दोनों मूर्तियों को देख रहे लोगों की प्रतिक्रियाएं भी ग़ौर करने लायक हैं.

लोगों का कहना है, ''विरोधी को नीचा और अपने को ऊँचा दिखाने जैसा काम तो नेता लोग करते ही रहते हैं लेकिन यहाँ तो गांधीजी की मूर्ति को भी इस बड़े-छोटे की राजनीति में ज़रिया बनाकर फंसा दिया गया है. अगर यही सिलसिला जारी रहा तो इसी गांधी मैदान में गांधी-प्रतिमाओं की लाइन लग जाएगी. फिर कोई हटाएगा तो विरोध में बवाल खड़ा होगा.''

फ़िज़ूलख़र्ची

Image caption छोटी प्रतिमा को कहां ले जाया जाए, इसे लेकर विवाद खड़ा हो गया है

यहाँ सुबह-शाम टहलने वालों की आपत्ति कुछ अलग है. उनका कहना है कि मूर्ति पर दस करोड़ रूपए ख़र्च करने की बजाय यहाँ की गंदगी और जल-जमाव हटाने पर उतनी रक़म खर्च की जाती तो इस मैदान का कायाकल्प हो जाता.

इस पर एक बुजुर्ग ने व्यंग्य भरा सवाल किया कि तब नीतीश कुमार अपने को लालू यादव से बड़ा कैसे दिखा पाते?

उधर ज़िला प्रशासन ने संकेत दिया है कि यहाँ से छोटी प्रतिमा को हटा कर कहीं और स्थापित कर दिया जाएगा. इसके लिए सचिवालय के पास 'ईको पार्क' में जगह खोजी जा रही है .

सरकारी तौर पर यह मामला भवन निर्माण विभाग के तहत आता है. इस बाबत विभागीय मंत्री दामोदर राउत ने बताया, ''एक ही जगह दोनों मूर्तियों का होना अटपटा ज़रूर लगता है लेकिन इस पर अंतिम निर्णय राज्य मंत्रिपरिषद को लेना है. हमारे विभाग को जैसा निर्देश होगा, वैसा किया जाएगा ''

यह विवाद ग़लत या सही जो भी हो, लेकिन इस में दो राय नहीं हो सकती कि यहाँ गांधी की विशाल प्रतिमा और उस के इर्द-गिर्द निर्मित लघु वाटिका ने पटना के इस विस्तृत मैदान की शोभा बढ़ा दी है

संबंधित समाचार