आखिर कितने ख़तरे में है यूपीए सरकार?

  • 20 मार्च 2013
एम करुणानिधि
Image caption डीएमके नेता करुणानिधि ने मंगलवार को यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया.

आठ साल तक हर ऊँच नीच में केंद्र का साथ देने के बाद मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापिस लेने की घोषणा कर द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने आने वाले दिनों की राजनीतिक बिसात में एक महत्वपूर्ण चाल चली है.

हालाँकि लोकसभा में मौजूद सांसदों का घटा-जोड़ लगाने के बाद यूपीए के संकटमोचकों ने दावा किया है कि सरकार बिलकुल स्थिर है क्योंकि समाजवादी पार्टी (22 सांसद) और बहुजन समाज पार्टी (21 सांसद) बाहर से समर्थन जारी रखेंगी.

पर आम चुनाव वक़्त से पहले करवाए जाने की अटकलें भी लंबे समय से चल रही हैं. ज़्यादातर लोग ये मानते हैं कि मुलायम सिंह यादव और मायावती, दोनों ही सरकार को मुसीबत से उबारने की राजनीतिक क़ीमत वसूलेंगे.

तो गठबंधन के दबावों से निपटने के लिए सरकार के पास क्या विकल्प हैं?

वक़्त से पहले आम चुनाव?

वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल मानते हैं कि चुनाव वक़्त से पहले होने की बहुत मज़बूत संभावना है. उनका कहना है कि मनमोहन सिंह सरकार जिनके सहारे चल रही है – यानी मुलायम सिंह यादव और मायावती - वो ही ये मानकर चल रहे हैं कि चुनाव जल्दी होंगे.

मुलायम ने पिछले दिनों कई जगहों पर अपने कार्यकर्ताओं को समय से पहले चुनावों के लिए तैयार रहने को कहा भी है.

अगर वक़्त से पहले चुनाव करवाने का फ़ैसला किया जाता है तो सरकार पिछले कुछ महीनों में किए गए फ़ैसलों को अपनी उपलब्धियों के तौर पर सामने रखेगी.

इनमें बलात्कार विरोधी क़ानून, खाद्य सुरक्षा कानून और ‘आपका पैसा आपके हाथ’ जैसी योजनाएँ हैं.

लेकिन रामकृपाल मानते हैं कि अगर सरकार वक़्त से पहले चुनाव करवाना चाहेगी तो उसे एक ऐसे मुद्दे का इंतज़ार रहेगा जिसपर वो रुख़ कड़ा करके अपनी सरकार क़ुरबान कर दे ताकि उसका चुनावी फ़ायदा उठा सके.

आइसीयू में सरकार

Image caption मुलायम सिंह यादव अपने कार्यकर्ताओं को वक़्त से पहले चुनाव के प्रति आगाह करते रहे हैं.

दूसरा परिदृश्य ये हो सकता है कि मनमोहन सिंह सरकार आइसीयू में भर्ती मरीज़ की तरह चलती रहे और किसी तरह अपने पाँच साल पूरे कर ले.

पर इस बीच सरकार को ऑक्सीजन सप्लाई करने में मायावती और मुलायम सिंह यादव की भूमिका अहम होगी.

और दोनों के बीच छत्तीस के आँकड़े को देखते हुए पर उत्तर प्रदेश की राजनीतिक हकीकत तय करेगी कि अगल अलग मुद्दों पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का क्या रुख़ होता है.

आज की स्थिति में मायावती चाहेंगी कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार कुछ और ग़लतियाँ करे ताकि उसकी राजनीतिक साख ख़राब हो और फिर चुनावों की घोषणा हो.

इसलिए वो हर संभव कोशिश करेंगी कि चुनावों की घोषणा आनन फानन में न हो. और अगर हो तो उसका फ़ायदा समाजवादी पार्टी को न मिल पाए.

रामकृपाल कहते हैं कि डीएमके ने समर्थन वापिस लेने का फ़ैसला ज़रूर किया है पर ये भी कहा जा रहा है कि संकट की घड़ी में सरकार को बचाने के लिए वॉकआउट करके वो अब भी मददगार साबित हो सकती है.

क़ुरबानी का मुद्दा

Image caption मायावती ने यूपीए सरकार को समर्थन जारी रखने का फ़ैसला किया है.

काँग्रेस के जानकार कहते हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी पारी खेल चुके हैं और उन्हें इस बात का एहसास है कि राहुल गाँधी के उपाध्यक्ष बनने के बाद उनके फिर से प्रधानमंत्री बनने की संभावना लगभग नहीं के बराबर है.

ऐसे में वो कम से कम नीतियों के स्तर पर तेवर कड़े रखेंगे. जैसे कि उन्होंने तृणमूल काँग्रेस की ममता बनर्जी की घुड़कियों की परवाह किए बिना खुदरा क्षेत्र में विदेशी पैसे को हरी झंडी दे दी थी. पिछले साल सितंबर के महीने में ममता बनर्जी ने सरकार से समर्थन वापिस ले लिया फिर भी सरकार गिरी नहीं.

मनमोहन सिंह ने अपनी नीतियों के लिए पहले दौर में वामपंथियों को और अब तृणमूल काँग्रेस के सहयोग की परवाह नहीं की. उन्हें मुलायम और मायावती को दूसरे तरह की रियायतें देने में शायद कोई एतराज़ न हो.

वो किस शक्ल में होगा, इस पर अटकलें लगाई जा रही हैं क्योंकि दोनों के ही सिर पर सीबीआई जाँच की तलवार लटकी है.

पर अगर दोनों में से किसी ने भी काँग्रेस सरकार की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश की तो शायद कांग्रेस नेतृत्व इसी पर सरकार क़ुरबान कर दे और फिर मतदाता के सामने जाकर उसी पर जनादेश माँगे.

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