'भारत का ख्वाब है कि मुशर्रफ कुछ कर पाएंगे'

परवेज़ मुशर्रफ
Image caption जनरल परवेज़ मुशर्रफ लगभग चार साल के स्वनिर्वासन के बाद रविवार को स्वदेश लौटे हैं

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ लगभग चार साल के स्वनिर्वासन के बाद रविवार को स्वदेश लौटे हैं लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि न तो पाकिस्तान में और न ही भारत की राजनीति मे उनकी कोई खास अहमियत है.

बीबीसी ने इस बारे में पाकिस्तान में सुरक्षा और आंतरिक मामलों की जानकार आयशा सिद्दीका और पाकिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत जी पार्थसारथी से बात की. दोनों का यही मानना है कि आने वाले दिनों में वे मुशर्रफ की कोई खास भूमिका नहीं देखते क्योंकि उनका कोई समर्थन नहीं है.

आयशा सिद्दीका का कहना है कि यह केवल भारत का ख्वाब है कि पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ कश्मीर में वही कर पाएंगे जो उन्होने पहले किया.

'घरेलू राजनीति हावी हुई थी'

सिद्दीका ने कहा, ''अब हालात बहुत अलग हैं. वो कुछ नहीं कर पाएंगे. यह बस एक ख्वाब ही है जो हिंदुस्तान देख रहा है.परवेज़ ने कहा था कि वक्त कम है कुछ करना है तो कर लो. लेकिन उस समय भारत की घरेलू राजनीति हावी पड़ गई. अगर भारत सोच रहा है कि वो अर्थव्यवस्था बदल पाएंगे तो ऐसा भी नहीं होने वाला. वे आर्थिक नीतियों में भी कोई बदलाव नहीं कर पाएंगे.''

उनका कहना है कि पाकिस्तान में भी वे कोई खास भूमिका नहीं निभा पाएंगे. वे मानती हैं ''मोहाजिरों में भी कुछ नहीं कर पाएंगे. अलताफ हुस्सेन उन्हें कोई अहम ओहदा देकर खुदकुशी नहीं करना चाहेंगे. चार साल से बाहर रहे हैं इस दौरान इमरान खान ने जगह बना ली है. उन पर तो तानाशाह होने का आरोप भी नहीं है.''

कमांडो सोच

वहीं पाकिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत जी पार्थसारथी का कहना है, ''परवेज़ मुशर्रफ फौज में भी कमांडो थे, कमांडो बिल्कुल सामने आ जाते है नतीजा सोचे बिना. वो अब भी दिल में कमांडो हैं. मैं समझता हूँ कि वो निर्षय लेते हैं तो ज्यादा सोच समझ के नहीं लेते बस जो मन में आता है उसी से लेते है.जैसे कि कारगिल में नतीजा गलत निकला तो उनको कर्ज़ चुकाना पड़ा. हालांकि इसे लेकर कोई पछतावा नहीं है. जो करना था वो किया.''

उनका कहना है, ''मैं नहीं समझता कि पाकिस्तान में उनका समर्थन है. क्योंकि अगर आप देखें तो वो कराची पहुंचे हैं. वो खुद मोहाजिर हैं. पंजाब में उनका कोई महत्व नहीं हैं क्योंकि वो पंजाबी नहीं है. कराची में उनका तालमेल अच्छा है लेकिन वो काफी नहीं है.''

कश्मीर और मुशर्रफ

लेकिन कश्मीर की बात करें तो क्या वो कितने प्रभावशाली साबित हो सकते हैं?

पार्थसारथी कहते हैं, ''यह बात सही है कि अपने आखिरी सालों में 2003 से 2007 तक उन्होने अपने आश्वासन को पूरा किया कि वो पाकिस्तान की सरज़मीन को आंतकवाद के लिए इस्तेमाल नहीं करने देंगे. आंतकवादी घटनाएं रुक गई थी. नियंत्रण रेखा पर 40 साल के बाद स्थाई संघर्ष विराम आया.''

वे कहते हैं, ''कश्मीर पर भी बातचीत हुई वो समझ गए थे कि वो पाकिस्तान की पहली मांग थी जनमत संग्रह में कोई महत्व नहीं रहा है. आधुनिक काल में कोई महत्व नहीं रहा है.''

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