बलात्कार विरोधी कानून की उलझी हुई परतें

दिल्ली सामूहिक बलात्कार
Image caption बलात्कारियों के लिए कड़ी सजा की मांग जोर पकड़ रही है.

बलात्कार जैसे अपराध को किस श्रेणी में रखा जाए? अगर किसी महिला का पति उससे बलात्कार करता है तो ये अपराध की श्रेणी में क्यों नहीं आता? लड़के और लड़कियों के लिए सेक्स की उम्र 18 वर्ष से कम न किए जाने के क्या मायने हैं? ऐसे कई सवाल पिछले दिनों इस सिलसिले में चली बहसों में उभर कर सामने आए हैं.

पिछले दिनों संसद ने बलात्कारियों के लिए मृत्यु दंड सहित कड़ी से कड़ी सज़ा के प्रावधान वाले नए विधेयक को पास कर दिया है. यौन अपराधों से निपटने में प्रस्तावित नए कानून की भूमिका पर बीबीसी ने सुप्रीम कोर्ट की वकील करुणा नंदी से बात की:

इस कानून के पीछे क्या विचार है?

दिल्ली गैंग रेप वाली घटना के विरोध में हुए ज़बरजस्त प्रदर्शनों के बाद सरकार ने एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा के नेतृत्व में यौन हिंसा को रोकने के लिए कानूनी सुधारों समेत अन्य उपायों की सिफारिश के लिए एक पैनल गठित किया था.

जस्टिस वर्मा कमेटी को 80 हज़ार सिफारिशें मिली. कमेटी ने दुनिया भर के उदाहरणों को ध्यान में रखते हुए इस पर गहराई से विचार किया.

इस रिपोर्ट से बहुत सी महिलाओं में हिम्मत बँधी कि उन्हें हिंसा से छुटकारा मिलेगा और यौन अपराध के मामलों में न्याय किया जाएगा.

ये कहा जा सकता है कि सरकार ने कई पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ये कानून बनाया, मसलन महिलाओं के प्रति वाजिब बर्ताव, समाज में पितृसत्तात्मक विचारों का प्रभुत्त्व आदि. साथ ही सरकार औपनिवेशिक काल (1860) की भारतीय दंड संहिता को थोड़ा और कठोर दिखाना चाहती थी.

इसलिए 'महिलाओं के शील उल्लंघन' को कानूनी कार्रवाई का तर्कसंगत आधार माना जाता है, महिलाओं की देह पर होने वाले आक्रमण और यौन प्रताड़ना के अपराध भी इसमें शामिल कर लिए गए हैं.

लेकिन साथ ही हिंसा के ज़रिए महिलाओं को मजबूर करने के लिए भी स्पष्ट नियम बनाए जाने चाहिए थे.

इसके बजाय पत्नी के साथ बलात्कार अभी भी वैध है यहां तक कि 15 से 18 साल की शादी शुदा बच्ची के साथ बलात्कार की भी कोई सज़ा नहीं है.

खाप पंचायतें या नैतिकता के पहरेदार या नाखुश माता-पिता चाहें तो 17 साल की उम्र में अपनी हमउम्र लड़की के साथ सेक्स करने वाले लड़के को तीन साल के लिए बाल सुधार गृह भिजवा सकते हैं.

पिछले कानून से नया कानून किस तरह बेहतर है?

नए कानून में महिलाओं के प्रति होने वाले उन अपराधों को शामिल किया गया है जिनका वो अक्सर शिकार होती हैं.

इसमें महिलाओं का पीछा करने जैसे अपराध भी शामिल किए गए हैं. पीछा किए जाने से महिलाएं भयभीत होती हैं. अक्सर इसका नतीजा उनपर हमले और यहां तक कि उनकी हत्या के तौर पर होता है.

महिलाओं पर तेजाब फेंकना और उन्हें निर्वस्त्र करने जैसी घटनाएं भारत में अक्सर सामने आती हैं. अब नए कानून में इन्हें अलग से अपराध की श्रेणी में रखा गया है.

महिलाओं को उनके एकांत के पलों में छिपकर देखना, किसी स्त्री की तस्वीर का बिना उसकी सहमति के आदान प्रदान करना, उनका पीछा करना या निर्वस्त्र देखना अब अपराध माना जाएगा.

Image caption नए कानून में कई तरह के सुरक्षा उपाय किए गए हैं.

यह कानून बलात्कार की परिभाषा के दायरे को भी व्यापक बनाता है. इसमें साफ तौर पर यह कहा गया है कि बलात्कार का विरोध करने में अगर शारीरिक संघर्ष के निशान न भी हों तब भी इसका मतलब रज़ामंदी से सेक्स करना नहीं होता.

यौन आक्रमण की पुलिस रिपोर्टें कम होने की एक वजह ये भी है कि पुलिस ऐसी शिकायतों पर पूरी तरह ध्यान नहीं देते.

देखा गया है कि कुछ पुलिस अफसर और अन्य सरकारी अधिकारी औरतों को नापसंद करते हैं, उनकी शिकायतें दर्ज नहीं करते और जांच के दौरान पीड़िता के अधिकारों की अवहेलना करते हैं. ऐसे सरकारी अधिकारियों को अब किसी तरह का संरक्षण नहीं मिलेगा.

नए कानून में अगर कोई असैन्य पुलिस अधिकारी शिकायत नहीं दर्ज करता है या खुद ही यौन हिंसा का अपराध करता है तो उसे निश्चित तौर पर एक अवधि के लिए जेल की सजा भुगतनी होगी.

सबूत जुटाने की प्रक्रिया और मामले की सुनवाई को महिलाओं के लिए और विकलांग लोगों के अधिकारों के मद्देनजर पहले की तुलना में अपेक्षाकृत आसान बनाया गया है.

सिर्फ इतना ही नहीं स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने वाली तमाम एजेंसियां यौन हिंसा या एसिड हमले की पीड़ित लड़की को तुरंत इलाज करेंगी.

मुआवजे का भी कानूनी प्रावधान किया गया है लेकिन संबंधित सरकारों ने इसके लिए जरूरी इंतजाम नहीं किए हैं.

क्या नया कानून पहले की तुलना में सख्त है?

सख्त शब्द एक भुलावा है. लोग अक्सर सोचते हैं कि यह कड़ी सज़ा के बारे में है.

इस कानून में ज्यादातर मामलों में जेल की सजा को बढ़ा दिया गया है. बलात्कार के उन मामलों में जिनमें पीड़िता कोमा में चली गई हों या दोबारा रेप किया गया हो, मौत की सजा का प्रावधान किया गया है.

हमारे पास ऐसा कोई विश्वसनीय अध्ययन नहीं है जिससे यह पता चलता हो कि कड़ी सज़ा से यौन हिंसा के मामलों में कमी आती है.

अन्य देशों के उदाहरणों से पता चलता है कि कुछ जगहों पर मृत्यु दंड के प्रावधान से बलात्कार के मामलों में कोई कमी नहीं आई जबकि कुछ स्थानों पर महिलाओं के खिलाफ अधिक हिंसक अपराधों की घटनाएं बढ़ी.

इस बात को लेकर भी चिंता जताई जा रही है कि अगर जज यौन हिंसा के मामलों अधिक सख्त सजाएं सुनाने लगें तो अभियुक्तों के बरी होने के मामले भी बढ़ जाएंगे.

जल्द से जल्द न्याय किए जाने से यौन हिंसा के अपराधों में कमी आने की ज्यादा संभावना है.

आपराधिक न्याय प्रणाली के व्यापक विस्तार के बिना यह स्पष्ट नहीं है कि बलात्कार और यौन हिंसा के अपराधों के मामलों में किस तरह से जल्द सुनवाई की जा सकेगी.

लेकिन दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन से उम्मीद की किरण जगी है.

इस संशोधन के अनुसार ‘जहां तक संभव हो सके’ चार्जशीट फाइल किए जाने की तारीख के दो महीने के भीतर सुनवाई पूरी करनी होगी.

झूठी शिकायतों की आशंका भी जताई गई है लेकिन बदनीयती के साथ दायर किए जाने वाले मामलों में मौजूदा कानून के तहत ही कार्रवाई की जा सकती है.

ब्रिटेन में आपराधिक मामलों की अभियोजन एजेंसी ने इस महीने की शुरुआत में एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें कहा गया है कि कई लोगों की मान्यता के विपरीत बलात्कार और यौन हिंसा के झूठे मामले विरले ही होते हैं.

कई लोग इस मान्यता की वजह से बलात्कार या अन्य प्रकार की यौन हिंसा के मामलों में पीड़ित महिला के साथ न्याय करने में कोताही बरतते हैं.

सहमति की उम्र पर बहस, अब यह 18 है.

सहमति की उम्र एक ऐसा शब्द है जिससे ग़लतफ़हमियाँ ज़्यादा पैदा होती हैं.

इसकी जगह पर बलात्कार की कानूनी उम्र अधिक बेहतर शब्द रहेगा.

तकरीबन 30 सालों तक सहमति की उम्र 16 साल थी. कुछ महीने पहले यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण के लिए साल 2012 में बने कानून में इसे बढ़ाकर 18 कर दिया गया था.

ऐसी सोच वाले लोग भी हैं जो सोचते हैं कि सेक्स के लिए सहमति देने की उम्र 16 साल रखने पर किशोर-किशोरियों को सैक्स की सामाजिक छूट मान लिया जाएगा.

सिर्फ़ कानूनी नज़रिए से देखा जाए तो कानून किसी को कोई काम करने या न करने के लिए नहीं कहता, जबकि स्कूल, परिवार और निजी इच्छा से लोग कई काम करते हैं.

Image caption पुलिस पर यौन हिंसा के मामलों में असंवेदनशील रवैया अपनाने का आरोप लगता रहा है.

अगर कोई किशोर और किशोरी सेक्स का फ़ैसला करते हैं तो कानून का डंडा चलाकर उनहें नहीं रोता जा सकता.

अब 16 से 18 साल या इससे थोड़ी ज्यादा उम्र का कोई लड़का अपनी ही उम्र की किसी लड़की के साथ सहमति से सेक्स करता है तो उससे बलात्कारी करार दिया जा सकता है और जज के पास इस मामले में अपनी समझदारी से फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं होगा.

भले ही भारत बच्चों के अधिकारों के लिए हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के समझौते पर भारत ने भी दस्तखत किए हों लेकिन इस महत्वपूर्ण फैसले पर पहुंचने के लिए किशोरों से सलाह तक नहीं ली गई.

यह किशोरों के ‘हित’ के खिलाफ है.

नए कानून में ऐसे प्रावधान की ज़रूरत है जिसके तहत 16 से 18 साल के किशोर किशोरी अपने से चार साल बड़े व्यक्ति से सेक्स करते हों तो उसे आपराधिक न करार दिया जाए.

प्रस्तावित कानून के 'नकारात्मक' पहलू

नया कानून केवल महिलाओं को बलात्कार और यौन हिंसा से संरक्षण देता है. पुरुषों और ट्रांसजेंडर लोगों के बचाव के लिए किसी तरह के प्रावधान का न होना इसकी एक बड़ी कमज़ोरी है.

दंड संहिता की कुख्यात धारा 377 ‘अप्राकृतिक यौन संबंध’ बनाने पर सजा का प्रावधान करती है. भले ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के बाद भी यह बरकरार रह जाए, यह इकलौती और सीमित प्रभाव वाली धारा है. इस धारा में हिंसा या दबाव जैसे तत्व शामिल नहीं हैं.

नजदीकी के प्रावधान के बगैर 18 को सहमति की उम्र बना देने से वयस्कों के यौन संबंध को अपराध करार दिया जाएगा जबकि वह न तो हिंसक होगा और न ही दबाव में किया जाने वाला सेक्स होगा.

पत्नी के साथ बलात्कार अब भी कानूनी है हालांकि अलग रह रहे दंपतियों के मामले में ऐसा नहीं है.

‘अशांत क्षेत्रों’ में सशस्त्र बलों को बलात्कार और यौन हिंसा के अपराधों से अभी तक प्रभावी रूप से संरक्षण मिला हुआ है.

इन जगहों पर जहां राज्य की इच्छा से बल प्रयोग किया जाता है, वहां के स्थानीय समुदाय के खिलाफ इस तरह के मामलों में और इजाफा होता है.

जबकि राज्य की विधानसभाओं और संसद में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले जनप्रतिनिधि बने रह सकते हैं और धीमी न्याय प्रणाली की वजह से दोषी साबित होने तक लाभ उठाते रह सकते हैं.

आगे क्या होगा?

जस्टिस वर्मा कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में महिलाओं को संविधानिक बराबरी का दर्जा दिए जाने के लिए एक विस्तृत योजना की नींव रखी है.

इसमें पुलिस सुधारों, शिक्षा सुधारों, आपराधिक न्याय प्रणाली से जुड़े लोगों का प्रशिक्षण शामिल हैं.

नया संधोशन केवल एक शुरुआत है और कोई कानून तब तक कुछ भी नहीं कर सकता है जब तक कि उसे लागू न कर दिया जाए. लेकिन कुछ बेहतरी के लिए सबसे पहले एक कानून मौजूद होना चाहिए.

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