एक गांव, दो पड़ोसी और दो 'विश्व रिकॉर्ड'

नालंदा आलू किसान
Image caption नितिश कुमार के लिए ‘नई विधि को अपनाना रिस्की था.’

गांव में घुसने वाली ईंट की सड़क पर आप जैसे ही पहला दांया मोड़ काटते हैं, सामने जो पक्का बड़ा मकान दिखता है, वो समुंत कुमार का है. वही किसान जिनके नाम बिहार सरकार धान की उपज का विश्व रिकॉर्ड कर रही है.

नीतीश कुमार की झोपड़ी समुंत के घर से दो तीन घर आगे पड़ती है. नहीं, नहीं ये वो नीतीश कुमार नहीं हैं, बिहार के मुख्यमंत्री.

ये वो हैं जिनके बारे में बिहार कृषि विभाग ने दावा किया था कि उनके खेतों में दुनियां भर की अबसे सबसे ज़्यादा 72.9 टन प्रति हेक्टयर, आलू की पैदावार हुई.

हालांकि जब आलू की बंपर फ़सल उगाने के लिए नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री ने सम्मानित किया था, तो उन्होंने झिझकते हुए कहा था,"सर, मेरा नाम भी आपका ही नाम है."

'पूराने मेथड को छोड़ नया तरीक़ा'

एक हेक्टयर में 22.4 टन धान की फ़सल उगाने के लिए सुमंत कुमार को तो सरकार, जनता, और गांव के लोगों से वाहवाही और सम्मान मिलना ही था.

हालांकि इस दावे पर ढ़ेर सारे सवाल भी उठ रहे हैं, लेकिन चाहे आलोचक हों या प्रशंसक, उत्सुकता के मारे ही सही दरवेशपुरा गांव का रूख़ करने से खुद को रोक नहीं पा रहे.

सुमंत कुमार कहते हैं,"जब अस्टार्टिंग में लगाए थे तो सब कहे थे कि एक-एक पौधे से कहीं फ़सल होती है? पहले धान की खेती में चार-पांच पौधे साथ लगाते थे."

आईएससी पास, पूर्व टेक्सटाइल सुपरवाइज़र के लिए नौकरी छोड़कर खेती में आना एक चैलेंज था.

इसलिए उन्होंने ‘पूराने मेथड को छोड़ नया तरीक़ा' अपनाया जिसके बारे में उन्हें स्थानीय कृषि सलाहकारों से पता चला था.

खिलखिलाते हुए वो कहते हैं,"हमने सोचा चलो लाटरी खेल के देखते हैं."

‘धान की फ़सल बेज्जोर रही’

मात्र एक एकड़ खेत के मालिक, बटाई की खेती पर गुज़ारा करने वाले, नितिश के लिए ‘नई विधि को अपनाना रिस्की था,’ लेकिन उन्होंने फिर भी हिम्मत की और उनकी ‘धान की फ़सल बेज्जोर रही.’

नीतीश के अलावा देरवेशपुरा और पास के गांवों के तीन और युवा किसानों ने उसी सीज़न में अपने खेतों में 17 टन प्रति हेक्टयर धान की फ़सल काटी थी.

सुमंत कुमार कहते हैं आसपास के इलाक़े के ‘हम आठ-दस युवा किसान हैं जिनमें कम्पटीशन है.’

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Image caption सुमंत ने श्रीविधि से धान की खेती करके एक उदाहरण पेश किया है.

नीतीश के खेत में भी 19.6 टन धान की पैदावार हुई थी हालांकि उन्हें शोहरत आलू की फ़सल ने दिलाया.

जिसमें उन्हें एक और दूसरे बीज के बीच अधिक दूरी बनाने और एक-एक क्यारियां भी पारंपरिक से ज़्यादा फासले पर तैयार करने की सलाह दी गई थी.

सिस्टम ऑफ राइस इंटेनसीफिकेश, या श्री विधि से की जानेवाली खेती में रोपनी, बीज की तैयारी, उम्र और सिंचाई पारंपरिक तरीक़े से अलग होती है.

अस्सी के दशक में विकसित इस विधि को गेंहूं और दूसरी फ़सलों में भी अपनाया जा रहा है.

मुझे भी नालंदा ज़िले के अपने दौरे के बीच किसानों में इसे लेकर उत्साह का एहसास हुआ. हालांकि ये सबसे अधिक सफ़ल धान की खेती में ही है.

‘अगर डीजल खाद वगैरह थोड़ा सस्ता होता तो और बढ़िया होता’

नीतीश कुमार ये तो मानते हैं कि उनके खेतों में हो रही बंपर उपज के बाद से आठ आदमियों के उनके परिवार की ‘भोजन वगैरह की दिक्क़त ख़त्म हो गई है,’ लेकिन साथ ही ये भी जोड़ देते हैं कि ‘अगर डीज़ल खाद वग़ैरह थोड़ा सस्ता होता तो और बढ़िया होता.’

सुमंत ने फ़सल से हुई आमदनी से खेती के कई आधुनिक उपकरण ख़रीद लिए हैं और उसे वो किराए पर देते हैं.

दोनों किसानों ने अपनी फ़सल में जैविक खाद का प्रयोग अधिक मात्रा में किया था, और पोटाश, जिंक, यूरिया और डीएपी का इस्तेमाल बनिस्बत कम, इसलिए ख़र्च में उन्हें कुछ बचत भी हई थी.

बच्चों के साथ टेनिस बॉल से क्रिकेट खेलने के शौकीन सुमंत का विचार है कि आने वाले दिनों में वो कृत्रिम खाद का प्रयोग बिल्कुल कम कर देंगे.

इसलिए आजकल कचरे से लेकर गोबर तक उन्हें जो कुछ मिल रहा है उसे वो अपने खेतों में डलवा रहे हैं.

वो कहते हैं,"हम तो बिहारशरीफ़ से गोबर भी ख़रीद के ले आते हैं, 900 रूपए का एक ट्रेक्टर का ट्रेलर."

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