क्या ये झारखंड का 'सलवा जुड़ूम' है?

माओवादी बाल छापामार

अपने छोटे से कंधे पर भारी राइफ़ल टाँगे बारह साल के राजूबाबू से जब नवंबर 2010 में दक्षिणी बिहार के धुर अंदरूनी देहात में मेरी मुलाक़ात हुई, तब तक इस बच्चे ने किसी मुठभेड़ में हिस्सा नहीं लिया था.

मौत से राजूबाबू की शायद पहली टक्कर पिछले हफ़्ते हुई और वो बच कर निकलने में कामयाब हो गया.

पर इस बात की पूरी संभावना थी कि इस बच्चे की लाश भी उन माओवादियों में शामिल होती जिन्हें झारखंड के चतरा ज़िले में तृतीय प्रस्तुति कमेटी (टीपीसी) के हथियारबंद लोगों ने अचानक किए गए हमले में मार डाला और 25 को बंधक बना लिया.

चतरा के कुंडा थाने के लकड़मांदा गाँव में हुई इस मुठभेड़ से सिर्फ़ चार माओवादी छापामार निकल भागने में कामयाब हुए और उनमें से एक राजूबाबू भी था.

पर राजूबाबू और उनकी तरह बच निकले माओवादी छापामारों के लिए मुश्किलें ख़त्म नहीं हुई बल्कि बढ़ गई हैं.

झारखंड और दक्षिण बिहार के जिन इलाकों में पिछले कई बरसों से माओवादी लगभग समानांतर सरकार की तरह काम करते थे, टीपीसी छापामारों ने उनके स्थानीय नेतृत्व का लगभग सफ़ाया कर दिया है.

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मुख्य दुश्मन

तृतीय प्रस्तुति कमेटी माओवादियों से ही छिटक कर निकला एक छापामार संगठन है जिसके नेता अब कहते हैं कि “हमारी मुख्य दुश्मन पुलिस नहीं बल्कि माओवादी हैं.”

स्थानीय प्रशासन, सरकार और पुलिस इस ख़ून ख़राबे से बिलकुल भी परेशान नहीं हैं बल्कि उन्हें ख़ुशी है कि दो छापामार गुट एक दूसरे से लड़ रहे हैं.

चतरा के पुलिस सुपरिंटेंडेंट अनूप बिरथरे ने बीबीसी हिंदी से कहा, “निश्चित तौर पर माओवादी टीम को नुकसान तो हुआ है और उग्रवादी किसी भी संगठन का हो अगर उसको नुकसान होगा - टीपीसी हो या माओवादी - निश्चित तौर पर डेमोक्रेसी और प्रशासन के लिए तो अच्छा ही है.”

लकड़मांदा गाँव के चश्मदीद लोगों के हवाले से हिंदू अख़बार ने ख़बर दी है कि टीपीसी के लोगों ने मारे गए माओवादियों की लाशें कोबरा फ़ोर्स (कमांडो बटालियन फ़ॉर रिज़ॉल्यूट एक्शन) के जवानों को सौंपीं.

चश्मदीदों ने कहा है कि कोबरा फ़ोर्स और केंद्रीय रिज़र्व पुलिस के लोग अगले दिन तड़के चार बजे गाँव में पहुँचे. उनके मुताबिक, “सीआरपी ने तृतीय प्रस्तुति कमेटी पर बिलकुल भी गोलियाँ नहीं चलाईं, बल्कि उन्हें पकड़े गए माओवादियों को अपने साथ ले जाने दिया”.

हालाँकि चतरा के पुलिस सुपरिंटेंडेंट अनूप बिरथरे ने बीबीसी से कहा कि माओवादी हों या टीपीसी दोनों ही प्रतिबंधित संगठन हैं लेकिन टीपीसी के प्रति उनका नर्म रवैया साफ़ साफ़ देखा जा सकता था.

भरोसा कैसे?

Image caption माओवादियों के पास आधुनिक हथियारों का ज़ख़ीरा है.

उन्होंने इन ख़बरों की पुष्टि की कि टीपीसी ने 25 माओवादियों को बंधक बनाया है, पर साथ ही ये भी कहा कि टीपीसी “सभी को छोड़ देगी”.

अनूप बिरथरे के शब्दों में, “जिन 25 उग्रवादियों को टीपीसी द्वारा पकड़े जाने की बात थी, उनमें से किसी को भी इन लोगों ने नुकसान नहीं पहुँचाया है. अल्टीमेटली, या तो वो अपनी इच्छा से टीपीसी में शामिल हो रहे हैं या फिर उन्हें छोड़ दिया जाएगा.”

एक पुलिस अधिकारी आख़िर इतने विश्वास से कैसे कह सकता है कि एक प्रतिबंधित हथियारबंद संगठन अपने प्रतिद्वंद्वी संगठन के बंधक लोगों को छोड़ देगा?

माओवादी पार्टी की बिहार-झारखंड इकाई के प्रवक्ता गोपालजी ने किसी अज्ञात जगह से बीबीसी हिंदी से फ़ोन पर बात की और कहा, “इसका (टीसीपी) मूल काम संघर्ष को ख़त्म करना है. ये सब लोग डीजीपी और एसपी रैंक के अधिकारियों की देखरेख में अपना संगठन चलाते हैं.”

माओवादियों और टीपीसी के बीच यूँ तो इक्का दुक्का झड़पें होती रही हैं, लेकिन पिछले एक दशक में पहली बार टीपीसी ने एक साथ दस माओवादियों को मार डाला है.

मरने वालों में माओवादी पार्टी की बिहार रीजनल कमेटी के राज्य सचिव लालेश यादव उर्फ़ प्रशांत, पूर्वी पलामू ज़ोन कमेटी के सदस्य धर्मेंद्र यादव उर्फ़ वीरूजी और प्लाटून कमांडर जयकुमार यादव आदि शामिल हैं.

नवंबर-दिसंबर 2010 की उस सर्द और अँधेरी रात को औरंगाबाद ज़िले के एक अंदरूनी गाँव में एक लाइन में खड़े माओवादियों के दस्ते में प्रशांत ने सबसे ऊँची आवाज़ में मेरा स्वागत किया और कहा, “मेरी आवाज़ तो आप पहचान ही गए होंगे?”

ग़रीबी और ग़ुस्सा

Image caption माओवादी कहते हैं उन्होंने ग़रीबों के हक के लिए हथियार उठाए हैं.

दक्षिणी बिहार में माओवादी गतिविधियों की ख़बर देने के लिए प्रशांत ही मीडिया को फ़ोन किया करते थे, शायद इसीलिए उन्हें उम्मीद थी कि अँधेरे में भी उनकी आवाज़ को पहचान लिया जाएगा.

अगले तीन-चार दिन औरंगाबाद और गया के अंदरूनी हिस्से के माओवादी आधार इलाक़ों में मैं प्रशांत और पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) के लड़ाकों के साथ घूमा.

दलित और आदिवासियों के इन लगभग उजाड़ गाँवों में मुझे लकड़ी-झाड़ी काट बेच कर गुज़र-बसर करने वाले बेहद ग़रीब – और बेहद क्रोधित– लोग मिले.

मुझसे मिलने आए औरतों और मर्दों के हुजूम में शामिल झुकी पीठ वाले एक फटेहाल बुज़ुर्ग मुझे अब भी याद हैं.

मैंने उनसे पूछा कि एक दिन में आप कितना पैसा कमाते हैं? उनका जवाब था – खाने कमाने का ज़रिया है ही नहीं, पैसा कहाँ से देखेंगे.

औरंगबाद के कचनार गाँव को माओवादियों का गढ़ माना जा सकता है. इस गाँव में न बिजली है, न सड़क, न पीने के पानी का साधन, न अस्पताल और न स्कूल.

कमोबेश यही हाल इस इलाक़े के दूसरे गाँवों का भी है. पुलिस और प्रशासन कभी भूले से भी यहाँ नहीं फटकता.

सलवा जुडूम?

Image caption छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने माओवादियों के ख़िलाफ़ स्थानीय आदिवासियों को हथियारबंद किया.

गाँव वालों ने मुझे बताया कि माओवादियों की तलाश में पुलिस सालों में एक बार कभी 200 -300 की संख्या में आती है और गाँव वालों से मारपीट करके और उन्हें धमका कर चले जाती है.

पर अब ये स्थिति बदलती नज़र आ रही है.

जिन इलाक़ों में पुलिस और प्रशासन घुसने में डरता था वहाँ अगर टीपीसी के हथियारबंद छापामार सरकार का काम आसान कर रहे हों तो पुलिस-प्रशासन को क्या एतराज़ हो सकता है?

छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार ने लगभग इसी तरह का प्रयोग करके सैकड़ों आदिवासी गाँवों से लोगों को हटाकर सड़क किनारे के कैंपों में रहने पर मजबूर कर दिया.

इसे ‘सलवा जुडूम’ नाम दिया गया जिसके तहत ज़्यादातर आदिवासी माओवादियों का ख़ात्मा करने के लिए आदिवासी नौजवानों को ही हथियारबंद करके आपस में लड़ा दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने बाद में सलवा जुड़ूम को ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया और राज्य सरकार पर सख़्त टिप्पणी की.

अब 27 मार्च को चतरा ज़िले में माओवादियों और टीपीसी के बीच हुए ख़ूनी संघर्ष के बाद ये सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या ये झारखंड का सलवा जुड़ूम साबित होगा?

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