भाजपा की बिसात पर मोदी के बदलते मायने

Image caption राजनाथ सिंह ने मोदी के साथ साथ उनके विश्वस्त अमित शाह को भी जगह दी है.

भाजपा साल भर बाद होने वाले अहम लोकसभा चुनाव की रणनीति में अपने सबसे लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी का सबसे ज़्यादा फायदा उठाने में संकोच कर गई.

बेशक पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने गुजरात के चौथी बार सत्ता में आए मुख्यमंत्री को पार्टी की सबसे बड़े नीति निर्धारण फोरमों- पार्लियामेंटरी बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति में इज्जत से जगह दी, लेकिन पार्टी के आम कार्यकर्ता और युवा भारत के बड़े तबके से भारत के नए ‘विकास पुरुष’ मोदी को अगले प्रधानमंत्री का सबसे काबिल दावेदार घोषित करने की कर्णभेदी आवाज़ों को पार्टी ने फिलहाल अनसुना करने में ही अपनी खैरियत समझी.

हांलाकि यूपीए और खास तौर पर कांग्रेस जब अपनी सबसे कमज़ोर हालत में है तो मोदी जैसा विकास के साबित रिकार्ड वाला दबंग नेता वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान का शिराजा बिखेरने के अभियान में सबसे कारगार हथियार हो सकता है. फिर भाजपा पीछे क्यों हटी?

मोदी के मायने

इस अंदेशे में कुछ सच्चाई तो है. मोदी को आगे करते ही नीतीश कुमार की कमान वाला जदयू, यूपीए के संग जाने की नासमझी दिखाने की बजाय अलग मोर्चे की कोशिश कर सकता है.

इस बात में भी कुछ दम है कि मोदी को लाते ही गुजरात के शर्मनाक दंगों को लेकर मोदी पर हमलों का नया दौर शुरु हो सकता है और पार्टी को आक्रामक की बजाय रक्षात्मक रुख अपनाना पड़ सकता है, लेकिन देश में जड़ें जमा चुके सत्ता विरोधी माहौल के मद्देनज़र मोदी को आगे करने के फायदों को पार्टी ने अगर अभी अनदेखा कर दिया है तो उसकी सिर्फ यही दो वजहें नहीं हैं.

बड़ी वजह शायद ये है कि पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दूसरे आकांक्षी अभी मोदी का जलवा कुबूल करने के लिए राज़ी नहीं हैं और मानते हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले, हो सकता है, ऐसे हालात पैदा हो जाएं कि मोदी को गुजरात लौटना पड़े. आखिर सियासत संभावनाओं और उम्मीदों का ही तो खेल है.

मोदी का पार्टी के दो अहम फोरमों में रखने का फायदा भी शायद पूरा न मिले क्योंकि दोनो फोरम लालकृष्ण आडवाणी और उनके समर्थक नेताओं की छाया में हैं.

दूसरे, राजनाथ सिंह को, जाहिर है, मोदी के दवाब में उनके भरोसेमंद और हत्या जैसे गंभीर आरोपों का सामना कर रहे गुजरात के पूर्व गृहमंत्री अमित शाह को महासचिव बनाना पड़ा है.

पार्टी नेता उनके बचाव में जो भी सफाइयां दें, आज के हालात में देश के आम लोग दागदार नेताओं को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है.

लेकिन राजनाथ सिंह की नई टीम में दो बातें पार्टी के हक में हैं. एक, पार्टी के दोनों आला निर्णायक फोरमों की औसत उम्र 50 पर आना और वोट के लिहाज़ से कारगार होने का कसौटी से इतर महिलाओं- युवाओं को ज़्यादा नुमाइंदगी.

Image caption राजनाथ सिंह ने मोदी के बढ़ते कद पर मुहर लगाई है.

दूसरे, राजनाथ सिंह की आरएसएस के साथ साथ पार्टी के सभी आला क्षत्रपों की मर्ज़ी संभाले रखने की राजनैतिक समझदारी, लेकिन इस चक्कर में कुछ विसंगतियां हो गई हैं.

विसंगतियों की भरमार

2012-13 में देश में सबसे ज़्यादा 14.28 फीसदी विकास दर (गुजरात और बिहार से भी ज़्यादा) दर्ज करने वाले राज्य मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को एक तो मोदी की तुलना में कम महत्व मिला, (हांलाकि कहा जाता है कि राजनाथ मोदी के संग उन्हें भी संसदीय बोर्ड में रखने की पैरवी कर रहे थे) तिस पर उनकी आंखों की किरकिरी उमा भारती और प्रभात झा को जगह मिल गई.

बतौर महासचिव वरुण गांधी की नियुक्ति को पार्टी भले ही युवा प्रतिनिधित्व कहे, लेकिन उत्तर प्रदेश भाजपा के उग्र नेता विनय कटियार ने इसे गांधी नाम का प्रताप कह कर इसे भोथरा कर दिया.

सबसे ज़्यादा लोक सभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में वरुण को रखने के ज़्यादा मायने नही हैं. फिर पार्टी संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति में राजनाथ सिंह. मुरली मनोहर जोशी और कटियार के भरोसे उत्तर प्रदेश में जीत सकने वाले कितने उम्मीदवार ढूंढ निकालेगी, कहना मुश्किल है.

लेकिन उत्तर प्रदेश से मिल रहे हाल के रुझानों को कोई संकेत मानें तो मोदी वहाँ कारगर हो सकते हैं. वो इस साल होने वाले विधान सभा चुनाव में दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीस गढ़ में भी फायदेमंद हो सकते हैं.

लेकिन कर्नाटक में पार्टी की आसन्न हार राजनाथ सिंह की इस संतुलित कसरत की कुछ चमक बदरंग ज़रूर कर सकती है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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