कोला कोला के प्लांट पर गर्माता गुस्सा

  • 20 अप्रैल 2013
कोका कोला पर आरोप
Image caption कोका कोला पर भूजल के अत्यधिक दोहन के आरोप लगते हैं

अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी कोका कोला ने केरल और बनारस में अत्यधिक जल दोहन और प्रदूषण के आरोपों के बीच अब नया ठिकाना ढूंढ निकाला है - देहरादून के पास यमुना घाटी में.

कंपनी यहां 600 करोड़ रुपए की लागत से शीतल पेय का प्लांट लगाने जा रही है. राज्य सरकार इस निवेश के सौदे पर अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन इस पर कई सवाल उठाए जा रहे हैं और पर्यावरणविद् भी इसके विरोध में आगे आए हैं.

पर्यावरणविद् डॉ. वंदना शिवा ने देहरादून में एक प्रेस कांफ्रेंस में मुख्यमंत्री को चुनौती देते हुए कहा, “वो बिना देर किए कोका कोला के साथ किए इस करार को रद्द कर दें वरना आंदोलन किया जाएगा और फिर उन्हें इसे रद्द करना ही होगा.”

कोका कोला कंपनी और उत्तराखंड सरकार के बीच हुए अनुबंध के मुताबिक देहरादून के विकासनगर तहसील के गांव छरबा में ये प्लांट लगाया जाएगा. कंपनी को 95 लाख रुपए प्रति एकड़ की दर से 60 एकड़ जमीन दी जा रही है.

मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने दावा किया कि कोका कोला जैसी कंपनी के राज्य में निवेश करने से पूरे उद्योग जगत में सकारात्मक संदेश जाएगा और अन्य कंपनियां भी यहां निवेश के लिए आगे आएंगी.

ठंडा मतलब..

लेकिन निवेश लाने का श्रेय लेने की हड़बड़ी में लगता है उत्तराखंड सरकार कंपनी का पिछला रिकॉर्ड खंगालना भूल गई है.

केरल के प्लाचीमाड़ा प्लांट से लेकर उत्तर प्रदेश में वाराणसी के मेहदीगंज और राजस्थान, तमिलनाडु और महाराष्ट्र तक कोका कोला कंपनी अपने प्लांटों को लेकर सवालों और विवादों में रही है.

केरल में राज्य प्रदूषण बोर्ड इन आरोपों को पुष्टि कर चुका है कि कैसे कोका कोला प्लांट के लिए अति जल दोहन से वहां का जल स्तर नीचे चला गया और स्थानीय खेती चौपट हो गई.

Image caption मुख्यमंत्री कोका कोला के प्लांट को राज्य में निवेश के लिए अहम बता रहे हैं

इस बात के भी प्रमाण हैं कि कोका कोला प्लांट से निकलनेवाले अवशिष्ट में जहरीले रासायनों कैडमियम, क्रोमियम और लेड के मिट्टी और भूजल में रिसाव से स्थानीय जन-जीवन और पर्यावरण को खतरनाक ढंग से नुकसान पंहुचता है.

इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी वाद दाखिल किए जा चुके हैं और केंद्र सरकार के सेंटर ग्राउंड वॉटर बोर्ड के कई आंकड़े भी कोका कोला प्लांट के भूजल दोहन पर सवाल खड़े करते हैं.

'संसाधनों की लूट'

हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरण और स्थानीय सरोकारों से जुड़े डॉ. शेखर पाठक का कहना है, “उत्तराखंड की सरकार संसाधनों की खुली लूट की छूट दे रही है और कंपनियों के हित साध रही है. पहले उसने जमीनें बेचीं और अब पानी भी.”

देहरादून में पर्यावरणविद् और हेस्को के अध्यक्ष डॉ. अनिल जोशी कहते हैं, “कोका कोला कंपनी ने भारत में जहां-जहां प्लांट लगाए हैं वहां की समस्याओं का सरकार ने अध्ययन क्यों नहीं किया. दूसरे खेती और पीने के लिए जरूरी पानी को इस तरह कंपनी को उपयोग करने के लिए दे देना कहां तक जायज है.”

देहरादून में विकासनगर तहसील के जिस इलाके में कोका कोला की योजना प्रस्तावित है वो उर्वर खेतिहर इलाका है. इसके अलावा यमुना घाटी में पानी का संकट पहले से ही गहरा रहा है.

ऐसी स्थिति में स्थानीय हितों की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा इस पर राज्य सरकार मौन है और कोका कोला कंपनी के अधिकारी भी. क्या ये गारंटी कंपनी दे रही है कि वो भूजल का दोहन नहीं करेगी, पानी की किल्लत नहीं होने देगी और उसके प्लांट से कोई जहरीला अवशिष्ट नहीं निकलेगा और अगर ऐसा हुआ तो उससे होने वाले नुकसान की क्या कोई भरपाई हो भी पाएगी.

हालांकि कंपनी के अधिकारी इस बारे में भी कई बड़े दावे करते रहे हैं कि पानी को कोई नुकसान नहीं होने देंगे लेकिन दूसरे राज्यों का अनुभव इसे गलत ठहराता है. ऐसे में सवाल ये है कि क्या यमुना घाटी की नियति भी वही होगी.

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