'दिलदार दिल्ली' या 'दाग़दार दिल्ली', क्या हो नारा?

Image caption दिसंबर में राजधानी में सामूहिक बलात्कार के बाद से महिलाओं को सुरक्षा देने की मांग तेज़ हुई है.

दिल्ली सरकार ने शहर को नई छवि देने के लिए इसके लिए नया स्लोगन दिया है- दिलदार दिल्ली.

लेकिन दिल्ली की आबोहवा में इस वक्त प्यार नहीं गुस्सा उबल रहा है. बार-बार बर्बर बलात्कार की घटनाओं ने महिलाओं की सुरक्षा की ओर पुलिस और प्रशासन के रवैये पर सवाल उठा दिए हैं.

यही झलका हमारे पाठकों के विचारों में भी जब हमने बीबीसी हिन्दी के फेसबुक पन्ने के ज़रिए उनसे पूछा कि वो दिल्ली को क्या तमगा देना चाहेंगे? उनकी राय का एक संकलन.

'रेपपुर' या 'शेम सिटी' ?

अक़बर अली, मनीश यादव और अमोद कुमार ने दिल्ली को ‘दाग़दार दिल्ली’ का स्लोगन दिया. राघवेन्द्र कुमार ने कुछ यूं लिखा, ‘दिलदार दिल्ली तो पहले से ही थी, अब तो दाग़दार दिल्ली है’.

दिल्ली सरकार के नारे के बारे में अमित भट्ट ने लिखा, ‘जिसका भी ये नारा है वो है पूरा शेखचिल्ली, हकीकत में तो गुंडों की पनाहगार हो रही है अब दिल्ली’.

ललन कुमार यादव ने दिल्ली को ‘रेपिस्ट की राजधानी’ बताया, तो सत्यपाल कटारिया ने ‘इंडियन रेप कैपिटल’, और रोहित शर्मा, छोटेलाल कुमार यादव ने ‘रेप सिटी’ कहा.

Image caption फ़रीद ख़ान ने लिखा, ‘दिल्ली का नया नाम रेपपुर होना चाहिए’.

गुरतेज सिंह तूर का सुझाव था, ‘बेदिल दिल्ली’, बलम सिंह जनोटी का ‘डरावनी दिल्ली’, दिनेश कुमार का ‘डेन्जरस दिल्ली’, मनोज चौहान का ‘बीमार दिल्ली’ और सत्यम तमांग का ‘दरिंदा दिल्ली’.

नवल जोशी ने लिखा, ‘दिल्ली! अपराधियों के आगे भीगी बिल्ली’. मोहम्मद अंसार, उमाशंकर झा और परशुराम राय की राय थी ‘बेकार दिल्ली’.

प्रवीन कुमार ने नाम दिया, ‘शेम सिटी’, सुभाष कुमार ने कहा, ‘दिक्कतों से भरी बिना दिल की दिल्ली’ और अवधेश सिन्हा ने लिखा, ‘करप्ट नेताओं और अपराधियों के लिए गुलज़ार दिल्ली’.

लोगों की पसंद भी – दिलदार दिल्ली

पिंटु कुमार ने लिखा, ‘दिल्ली भारत का दिल है. इसे ना तो रेप सिटी कह सकते हैं और ना ही बेकार दिल्ली. बेकार तो हमारी इंसानियत हो गई है. हम ख़ुद इंसान से शैतान बन गए हैं. चाहे वो दिल्ली का प्रशासन हो या आम लोग – सारे के सारे अपना वजूद खो रहे हैं. तो इसमें दिल्ली को क्या दोष दें?’

मोहम्मद ज़ीशान ख़ान ने कहा, ‘दिल्ली का ही नहीं पूरे इंडिया का नाम चेंज हो जाना चाहिए, क्योंकि बलात्कार तो हर जगह होता है, दिल्ली सिर्फ मीडिया की नज़र में आ जाती है’.

अशोक गुप्ता ने लिखा कि दिल्ली में बाहर से आए लोग भी बलात्कार की कई वारदातों के लिए ज़िम्मेदार रहे हैं, ऐसे में दिल्ली शहर या उसके बाशिंदों को ही कसूरवार ठहराना सही नहीं है.

संबंधित समाचार