भारतीय खरीददारों के लिए सोना कितना सोणा?

सोना

ऐसे देश में जहां धरती की 17 फीसदी आबादी रहती हो और जो दुनिया की जीडीपी में दो फीसदी की हिस्सेदारी रखता हो. उसके लोग दुनिया में मौजूद सोने का एक चौथाई अपनी खपत के लिए इस्तेमाल कर लेते हैं. क्या मतलब है इसका?

भारतीयों का सोने के साथ लगभग एकतरफा इश्क रहा है. इसलिए यूं ही भारत को दुनिया में सोने का सबसे बड़ा खरीददार नहीं माना जाता है.

देश के आम घरों में सोना समृद्धि के प्रतीक के तौर पर देखा जाता रहा है. यह ऐसी चीज है जो पास होने पर इतराने की वजह दे जाती है.

यहां पर्व त्योहारों पर इस पीली धातु को खरीदने का रिवाज रहा है. शादियों और दूसरे उत्सवों के दौरान लोग उपहारों में सोना देते रहे हैं.

सिर्फ इतना ही नहीं देश में मौजूद सोने का दो-तिहाई सोना अपने पास रखने वाले ग्रामीण घर-परिवारों के लिए यह बचत और निवेश का जरिया रहा है.

सोने से इश्क

सोने से बेइंतहा इश्क को इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि पुणे शहर के एक महाजन ने दुनिया की सबसे मंहगी कमीज खरीद ली.

उनकी शर्ट को बनाने में तीन किलो सोने का इस्तेमाल किया गया था और जिसकी बाजार कीमत तकरीबन एक करोड़ 34 लाख रुपए के करीब बनती है.

सोने ने अतीत में भारत को आर्थिक संकट से बचाया भी है. साल 1991 में भारत जब भुगतान संतुलन से गुजर रहा था और आयात की जरूरतें पूरी करने के लिए कुछ हफ्तों का विदेशी मुद्रा भंडार बचा रह गया था. तब सोने ने ही भारत की साख रखी थी.

लेकिन पिछले हफ्ते सोने की कीमत में जबरदस्त गिरावट देखी गई. यह पिछले दो साल के अपने निचले स्तर पर पहुंत गया था.

सवाल यह उठता है कि दुनिया में सोने के सबसे बड़े खरीददार देश के लिए सोने का मतलब क्या है?

निर्यात से ज्यादा आयात

Image caption आम गृहस्थों के बीच सोने के जेवरों को लेकर बहुत उत्साह रहता है.

भारत मौजूदा दौर में चालू खाते के बढ़ते घाटे से बुरी तरह परेशान है. इसका मतलब यह हुआ कि भारत जितना निर्यात कर रहा है उससे कहीं ज्यादा आयात कर रहा है.

दिसंबर 2012 में खत्म होने वाली तिमाही में चालू खाते का घाटा 1780 अरब रुपए पर पहुंच गया था. यह सकल घरेलू उत्पाद के 6.7 फीसदी के ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्तर के बराबर था.

सोना और कच्चा तेल दो ऐसी चीजें हैं जो भारत के आयात बिल में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं. इसके मद्देनजर अगर सोने की कीमत गिरती है तो इसका मतलब यह हुआ कि भारत अपना बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भंडार बचा सकेगा और इससे कमजोर पड़ते रुपए को ताकत मिलेगी.

2012 में अप्रैल से दिसंबर के दरम्यां भारत का आयात बिल 19,483 अरब रुपए था जबकि इसी अवधि में देश से बाहर 11,549 अरब रुपए के बराबर का निर्यात किया गया था.

खरीददारों पर असर

आयात की गई चीजों में सोने की हिस्सेदारी 10 फीसदी के बराबर थीं. अब सोने की कीमतों में गिरावट के साथ ही आयात और निर्यात बिल के बीच का फासला सिकुड़ेगा.

सोने की कीमतों में 10 फीसदी तक की गिरावट चालू खाते के घाटे में 269 अरब रुपए तक की गिरावट ला देगा.

लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि सोने की कीमतों में गिरावट से भारतीय खरीरददारों पर क्या असर पड़ेगा?

साल 2002 से ही सोने की कीमतों में लगातार इजाफा हुआ है. हालांकि 2008 में मार्च और अक्टूबर महीने के दरम्यां थोड़े समय के लिए ही सही इसकी कीमतों में 30 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई थी.

ज्यादातर खरीरददार यह मानते हैं कि हाल में आई कीमतों में गिरावट एक तात्कालिक बदलाव है. सोने के प्रति लोगों का रुझान पहले जैसा ही रहेगा और यह खरीदा-बेचा जाता रहेगा.

परपंराएं शायद ही खत्म हों

Image caption साइप्रस की घोषणा का सोने की कीमत पर असर देखा जा सकता है.

भारत में खरीदा जाने वाला तकरीबन आधा सोना जेवर बनाने के काम आता है और एक चौथाई सोना मंदिरों में चढ़ावा या दान देने के लिए खरीदे जाने की बात कही जाती है.

शेषा मात्रा लोग सोने के सिक्के या ईंटों की शक्ल में निवेश के तौर पर खरीरदते हैं. ऐसी परंपराएं शायद ही खत्म होंगी.

वैसे सोने में आदतन निवेश करने वाले लोग अब दूसरे विकल्पों पर भी गौर कर सकते हैं.

एक सवाल यह भी है कि यहां से आगे की तस्वीर कैसी बनेगी और सोने को लेकर किस तरह के भविष्य की उम्मीद की जा सकती है.

सोने का तब तक कोई बहुत ज्यादा आर्थिक महत्व नहीं है जब तक कि आप उसे बेचना न चाहें और कोई पैसे के बदले उसे खरीदने की ख्वाहिश न जता दे.

यही सोने की सबसे बड़ी खासियत है. उसके धातु मान पर लोगों का भरोसा ही उसे दुनिया भर में आकर्षण के केंद्र में रखता है.

साइप्रस का फैसला

यूरोपीय देश साइप्रस ने हाल ही में यह घोषणा की है कि वह अपने सोने के भंडार का बड़ा हिस्सा बेचने की योजना बना रहा है और इसका असर इस पीली धातु की गिरती कीमतों के तौर पर देखा जा सकता है.

दूसरे देश भी यह तरीका अपना सकते हैं. अतिरिक्त आपूर्ति के असर का दबाव सोने की कीमतों पर पड़ने के पूरे आसार हैं.

निवेशकों के लिए सोना एक सुरक्षित माध्यम माना जाता रहा है. हालांकि सारी दुनिया में सामान्य तौर पर आर्थिक परिस्थितियों में सुधार देखा जा रहा है और इन सबके बीच दूसरी वस्तुएं और विदेशी मुद्राएं निवेशकों की जेब से अपना हिस्सा निकालने के लिए सोने से प्रतिस्पर्धा करेंगी.

भविष्य की परिस्थितियों में इस बात की उम्मीद की जा रही है कि सोने की कीमतों में और गिरावट आ सकती है.

बैंकिंग कारोबार करने वाली कंपनी गोल्डमैन सैक्स ने अनुमान लगाया है कि साल 2017 के आखिर तक 30 ग्राम सोने की कीमत तकरीबन 64 हजार रुपए के करीब आ सकती है. यह अब से तकरीबन तीन फीसदी सालाना गिरावट के बराबर होगी.

हालांकि भारतीयों का सोने के साथ रोमांस इन हलचलों के बावजूद भी जारी रहने के आसार हैं. मांग में बड़ी गिरावट होने की संभावना कम ही है.

वैसे बेहतर वसूली की चाह रखने वाले निवेशक अब अधिक सावधानी से निर्णय लेंगे.

(रॉबिन बनर्जी हिंदुस्तान युनिलीवर, आर्सिलर मित्तल और सुजलॉन एनर्जी जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ जुड़े रहे हैं.)

संबंधित समाचार