'अगर एसीपी जैसे अफ़सर थप्पड़ मार सकते हैं तो.'....

  • 27 अप्रैल 2013
Image caption दिल्ली में एक बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में बीनू ने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था.

दिल्ली में कुछ दिनों पहले पाँच साल की एक बच्ची के साथ बलात्कार हुआ था जिसके विरोध में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए. इन्हीं प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और लोगों के बीच झड़प भी हुई. कैमरे में कै़द वीडियो में एक पुलिस अधिकारी को विरोध कर रही एक लड़की पर हाथ उठाते देखा गया था. इससे लड़की के कान में काफी चोट भी आई.

इस्तीफा नहीं देंगे दिल्ली पुलिस आयुक्त

वो लड़की हैं 17 साल की बीनू रावत जो दिल्ली की ही रहने वाली हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस घटना को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली पुलिस से जवाब माँगा है. दिल्ली पुलिस कह चुकी है कि वो मामले की जाँच कर रही है और अधिकारी को निलंबित कर दिया गया है. बीनू ने बीबीसी दफ्तर में बीबीसी संवाददाता वंदना से बातचीत की और अपने अनुभव बाँटे. पढ़िए बीनू की बातें उन्हीं की ज़बानी.

प्रदर्शन करने गई तो थप्पड़ मिला

मैं दिल्ली में रहती हूँ और दसवीं कक्षा में पढ़ती हूँ. मेरे मोहल्ले में एक दीदी रहती हैं जिनका नाम है संतोष. बचपन से ही मैने देखा है कि वो महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर काफी काम करती हैं. उन्हें देखकर मुझे काफी प्रेरणा मिली कि मैं भी कुछ ऐसा करूँ जिससे देश में बदलाव आए. दिल्ली में आजकल बलात्कार की कितनी घटनाएँ होती हैं. मेरे दिल से यही आवाज़ आई कि कैसे इसे कम किया जाए.

बलात्कार के एक लाख अभियुक्त 'बाइज़्जत बरी'

जब दिल्ली में पाँच साल की एक बच्ची का बलात्कार हुआ तो मेरे भाई ने मुझसे कहा कि हमें प्रदर्शन करना है. मैं अपने दोस्तों के साथ उस अस्पताल के बाहर पहुँच गई. हम पहले तो शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे. तभी वहाँ संदीप दीक्षित (सांसद) और एके वालिया (दिल्ली सरकार में मंत्री) आए तो हम भी उनके पीछे-पीछे अंदर चले गए. हम उनसे पूछना चाह रहे थे कि 15 अप्रैल से बच्ची ग़ायब थी तो जाँच पड़ताल जल्दी क्यों नहीं की गई.

इतने में दो पुलिस कॉन्स्टेबल मुझे पकड़ लेते हैं और एसीपी ने मुझे थप्पड़ मार दिया. मेरे कान से ख़ून बहने लगा. मेरी दोस्त ने कहा कि यहीं अस्पताल में इलाज करवा लूँ. मैंने इमरजेंसी में जाने की कोशिश की तो पुलिस ने मुझे अंदर भी नहीं जाने दिया.

मैं सुप्रीम कोर्ट की शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने ये मुद्दा उठाया और मेरे बारे में इतना सोचा. मैं चाहती हूँ कि ऐसे पुलिसकर्मियों को सख़्त से सख्त सज़ा हो ताकि वो ऐसा कभी किसी और महिला के साथ ऐसा न करें. जब एसीपी स्तर के अधिकारी ये कर सकते हैं तो सोचिए उनके नीचे के पुलिसकर्मी कैसे होंगे.

मैं ख़ुद एक लड़की हूँ और जानती हूँ कि रोज़ाना बाहर कितनी दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं. जब घर से निकलती हूँ तो डर लगता है कि वापस सही सलामत पहुंचुगी या नहीं. जब स्कूल जाती हूँ तो बाहर लड़के खड़े रहते हैं और छींटाकशी करते हैं. पुलिस से शिकायत करो तो कह दिया जाता है कि ये हमारा इलाक़ा नहीं है.

महिलाओं के लिए बनाऊँगी दामिनी ग्रुप

Image caption दिल्ली में बलात्कार के विरोध में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं

महिलाओं के खिलाफ़ अपराध रोकने के लिए सख़्त क़ानून की ज़रूरत है. मैं ये तो नहीं कहती कि ऐसी घटनाएँ ख़त्म हो जाएँगी अगर अगर क़ानून सख्त होता तो अपराधों में कमी ज़रूर होती.

हमें घर में, परिवार में भी सोच बदलनी होगी. माँ-बाप को सिखाना होगा कि लड़कियों की इज्ज़त करें. हमारे यहाँ देवियों को पूजा जाता है, लड़कियों को भी उसी नज़र से देखना चाहिए.

मैं बड़ी होकर समाज सेविका बनना चाहती हूँ. हम लोग मिलकर अपना एक ग्रुप बना रहे हैं जिसका नाम होगा दामिनी ग्रुप. हम उन लड़कियों की मदद करेंगे जो मुसीबत में है.

जब शुरु-शुरु में मैं प्रदर्शनों में जाती थी तो पिताजी मना करते थे. बोलते थे कि क्या ज़रूरत है, अपने स्कूल जाओ. लेकिन अब उनकी सोच बदल गई है. अब वे कहते हैं कि उन्हें मुझ पर गर्व है. वो तो ये भी कहते हैं कि उनकी और बेटियाँ ऐसी होतीं तो उन्हें और गर्व होगा.

मुझे बस यही लगता है कि महिलाओं के खिलाफ़ हो रहे अपराधों के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए. कल को ये किसी के भी साथ हो सकता है. इसलिए हम चुप्प न बैठें और आवाज़ उठाएँ.

( ये बीनू के निजी विचार हैं और इस लेख को छापने से पहले बीनू की माता और भाई की इजाज़त ली गई है)

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