कर्नाटक में मोदीः भाजपा का भला हो न हो

  • 29 अप्रैल 2013
Image caption गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बीजेपी की ओर से पीएम पद का संभावित दावेदार बताया जा रहा है

कर्नाटक में भाजपा ने नरेंद्र मोदी का बेहतर इस्तेमाल जान-बूझकर नहीं किया या यह पार्टी के भीतरी दबाव का परिणाम था? सिर्फ एक रैली से मोदी पार्टी के सर्वमान्य नए राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित नहीं होते.

हाँ, वे प्रादेशिक नेता के बजाय राष्ट्रीय नेता के रूप में प्रकट ज़रूर हुए हैं. उससे ज्यादा बड़ी बात यह है कि उन्होंने मौका लगते ही ‘ताकतवर नेता’ की ज़रूरत को फिर से राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया है.

बताते हैं कि पार्टी की कर्नाटक शाखा चाहती थी कि मोदी कम से कम दर्जन भर चुनावी रैलियाँ संबोधित करें. लेकिन मोदी जोखिम नहीं लेना चाहते थे.

मोदी ने टिकट के बँटवारे से भी खुद को अलग रखा. पार्टी का अनुमान है कि चुनाव के बहुकोणीय रहने पर ज्यादा नुकसान नहीं है. मोदी के सघन अभियान से भाजपा विरोधी वोट एक जगह आ जाएंगे, जिसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा.

हार से बच पाएगी भाजपा

भारतीय जनता पार्टी ने अपनी हार काफी पहले कबूल कर ली है. अब वह न्यूनतम नुकसान चाहती है.

कहना मुश्किल है कि नरेंद्र मोदी के बेहतर इस्तेमाल से हालात सुधरते या नहीं. लेकिन मोदी को परखने का एक मौका मिल सकता था.

पार्टी को लगता है कि मोदी के अतिशय इस्तेमाल के बाद भी हारेंगे तो यह हथियार राष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल होने के पहले ही धार खो बैठेगा. इस नकारात्मक सोच के बरक्स भाजपा के पास कोई सकारात्मक योजना नहीं है.

सन 2008 के चुनाव में भाजपा के पक्ष में हवा बनाने का काम जेडीएस की धोखाधड़ी और येदियुरप्पा के लिंगायत वोटों ने किया था. बीएस येदियुरप्पा के हटने के बावजूद भाजपा सरकार पर से भ्रष्टाचार का कलंक हटा नहीं है. अलबत्ता बड़ा जनाधार टूट चुका है.

Image caption मोदी अपने भषणों में राहुल,सोनिया और यूपीए सरकार पर जमकर बरसते हैं

येदियुरप्पा का कर्नाटक जनता पक्ष (केजेपी) भी कोई कमाल नहीं कर पाएगा. उसकी भूमिका बीजेपी को नुकसान पहुँचाने भर की होगी.

येदियुरप्पा के साथ मोदी के रिश्ते अच्छे थे, लेकिन पार्टी ने शायद इस दिशा में नहीं सोचा. उमा भारती कुछ समय से कह रहीं हैं कि येदियुरप्पा को वापस लाना चाहिए. संभव है आसन्न पराजय के बाद ऐसा हो. फिलहाल येदियुरप्पा और भाजपा दोनों घाटे में रहेंगे.

घुड़सवार मोदी

इस महीने के शुरू में सीआईआई के भाषण में राहुल गांधी ने कहा था कि हमें उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि कोई घोड़े पर सवार होकर आएगा और हमारी समस्याओं के समाधान कर देगा.

नरेंद्र मोदी ने इस बात को पकड़ लिया है. शायद राहुल का इशारा नरेंद्र मोदी ही थे. और नहीं थे तब भी मोदी उसे खुद से जोड़ने में कामयाब हुए हैं.

वे तब से राहुल को ही जवाब देते नज़र आते हैं. नेतृत्व-विहीनता को कांग्रेस की कमज़ोरी के रूप में स्थापित कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “कर्नाटक में कांग्रेस बिना सिर के हाथ हो गई है.”

मोदी ने देश के एकीकरण में सरदार बल्लभ भाई पटेल की भूमिका का हवाला दिया. लाल बहादुर शास्त्री के 'जय जवान, जय किसान' के नारे का उल्लेख किया जिसने देश में हरित क्रांति का सूत्रपात किया. किसी कांग्रेसी के लिए यह अटपटी बात है.

जिस पार्टी में ‘इंदिरा इज़ इंडिया’ का नारा लगता रहा हो वहाँ व्यक्ति के महत्व को नकारना मुश्किल है. वे गांधी-नेहरू परिवार पर ही वार करते हैं और राहुल का मज़ाक बनाने के हर मौके का फायदा उठाते हैं.

उन्होंने जयपुर के संदर्भ में कहा, “माँ (सोनिया गांधी) रो-रोकर कहती है कि सत्ता जहर है, और बेटा कर्नाटक में घूम-घूमकर कह रहा है हमें सत्ता दो.”

कांग्रेस की छवि बिगाड़ते रहेंगे

कर्नाटक के चुनाव सुशासन और साफ छवि के महत्व को रेखांकित करेंगे. वहाँ के बहुकोणीय मुकाबलों को देखते हुए लगता है किसी पार्टी को पूरा बहुमत नहीं मिलेगा. उसके बाद की जोड़-गाँठ का पहला शिकार सुशासन होगा. चुनाव में अभी तकरीबन एक हफ्ता बाकी है.

Image caption कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा राज्य में बीजेपी का खेल बिगाड़ सकते हैं

इस बीच कोल ब्लॉक आबंटन को लेकर सीबीआई निदेशक के हलफनामे, टूजी पर जेपीसी की रिपोर्ट, लद्दाख में चीनी घुसपैठ और सरबजीत के मामलों को लेकर भाजपा शोर मचाएगी, पर कर्नाटक की कोई उपलब्धि उसके पास नहीं है.

दूसरी ओर भाजपा सरकार की लूट को मुद्दा बनाने वाली कांग्रेस पर इसी किस्म के आरोप हैं. कर्नाटक का वोटर असमंजस में है. भाजपा की फिलहाल रणनीति है कांग्रेस की छवि बिगाड़ते रहो.

नरेंद्र मोदी के लिए व्यक्तिगत रूप से कर्नाटक के चुनाव में कुछ खास करने या पाने को नहीं है, पर सोनिया और राहुल पर हमला करके उन्होंने मधु मक्खियों के छत्ते पर पत्थर फेंक दिए हैं. वे चाहते हैं कांग्रेस भड़के. कांग्रेस क्या मोदी को जवाब देगी? जवाब देने से भी मोदी चर्चा में आते हैं.

इसीलिए दिग्विजय सिंह ने कहा है कि मोदी हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं. पर यह बात जब मीडिया में आती है तब मोदी की महत्ता को और गहराई से रेखांकित कर जाती है.

मोदी हर मौके का फायदा उठा रहे हैं चाहे वह हरिद्वार का संत सम्मेलन ही क्यों न हो. कोई वजह है कि मोदी का भाषण मीडिया लाइव काटता है. क्या मीडिया मोदी की मदद कर रहा है? हाँ तो क्यों? आप सोचें.

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