सीवीसी करे लंबित सीबीआई केसों की निगरानीः सुप्रीम कोर्ट

  • 30 अप्रैल 2013
Image caption भारत का उच्चतम न्यायालय

भारत के उच्चतम न्यायालय ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त यानी सीवीसी को आदेश दिया है कि वह सीबीआई के सभी लंबित मामलों की निगरानी करे.

न्यायालय ने कोयला आवंटन में कथित घोटाले की जांच में सरकारी दखल के मामले पर सीबीआई से दोबारा हलफ़नामा दायर करने को भी कहा है.

न्यायालय की तीन सदस्यों वाली खंडपीठ ने सोमवार तक छह बिंदुओं पर जवाब मांगा है.

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट करने को कहा कि क्या जांच एजेंसी सीबीआई का मैनुअल इसकी इजाज़त देता है कि इस तरह के मसौदे कानून मंत्री के साथ साझा किए जाएं?

अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या कानून मंत्री को इस तरह का कोई अधिकार है?

और सीबीआई से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि रिपोर्ट के मसौदे में बदलाव किए गए था या नहीं?

न्यायालय के आदेश के बाद सीबीआई कार्यालय में एक आपातकालीन बैठक बुलाई गई है.

जांच अधिकारियों की सूची मांगी

भारत के उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो को 'राजनितिक आकाओं' से आदेश लेने की ज़रूरत नहीं है.

मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने कहा, "हमारी पहली प्राथमिकता है सीबीआई को राजनितिक दखल से मुक्त करना."

अदालत ने कहा, “यह इतना बड़ा विश्वासघात है, जिसने पूरी नींव को हिलाकर रख दिया है.”

कोयला खदान आवंटन घोटाले के सिलसिले में ब्यूरो के निदेशक रंजीत सिन्हा द्वारा दायर हलफनामे पर का संज्ञान लेते हुए न्यायालय ने ये टिप्पणियां कीं.

रंजीत सिन्हा ने सुप्रीम कोर्ट में कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले की 'स्टेटस रिपोर्ट' के संबंध में एक शपथ पत्र दाखिल किया था.

शपथ पत्र में कहा गया है कि 'स्टेटस रिपोर्ट का मसौदा क़ानून मंत्री अश्विनी कुमार, प्रधानमंत्री कार्यालय और कोयला मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों को दिखाया गया था.

इस मामले पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय की खंडपीठ ने सीबीआई से कहा कि वह उन अधिकारियों की सूची भी अदालत को सौंपे जो कोयला आवंटन मामले की जांच में लगे हुए हैं.

न्यायालय ने कहा कि इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि कोई दागदार अधिकारी जांच की प्रक्रिया में शामिल नहीं है.

इनकार कर सकती थी सीबीआई

उच्चतम न्यायालय की वरिष्ठ अधिवक्ता कामिनी जायसवाल ने इस मामले में सरकार की कड़ी आलोचना की है.

बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बातचीत में उन्होंने कहा, "यह बहुत शर्मनाक बात है कि सरकार धीरे-धीरे हर संस्था को ख़त्म की कोशिश में लगी हुई है. अटॉर्नी जनरल का कार्यालय झूठ बोल रहे हैं. उनके सहयोगी झूठ बोल रहे हैं. और यह सब कुछ उच्चतम न्यायालय के सामने हो रहा है."

कामिनी कहती हैं, अदालत में पेश की जाने वाली कोई भी 'स्टेटस रिपोर्ट' किसी भी सूरत में कानून के बारे में नहीं होती. इसका मतलब होता है कि जांच एजेंसी अदालत को जांच के बारे में बताए.

यह एक गुप्त दस्तावेज़ होता है और इसे देखने का अधिकार न तो कानून मंत्री का होता है और न ही अटॉर्नी जनरल का. इन्हें इसमें बदलाव करने का अधिकार भी नहीं है.

दूसरी सबसे बड़ी बात है कि सीबीआई के प्रति लोगों का भ्रम भी टूट गया है. आज इस संस्था की स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़ा हो गया है.

वर्ष 1997 में जस्टिस वर्मा ने सुझाव दिया था कि सीबीआई को निष्पक्ष रखने के लिए संस्था के निदेशक के कार्यकाल को दो साल तक के लिए किया जाए.

ऐसा नहीं होने से इस पद पर आने वाले लोग अपनी सेवानिवृत्ति के बाद के वक़्त को दिमाग में रख कर राजनीतिक आकाओं को खुश करने की कोशिश करते हैं.

अगर कानून मंत्री ने सीबीआई के निदेशक से स्टेटस रिपोर्ट का मसौदा देखने के लिए मांगा भी था तो वह इनकार कर सकते थे.

संसद में हंगामा

विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने इस मामले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि अदालत की टिप्पणी नहीं बल्कि फ़ैसले पर ही बयान दिया जाना चाहिए.

लोकसभा में इस मामले पर बहस करते हुए विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा कि यूपीए की सरकार भ्रष्टाचार के मामलों में अपने ही रिकॉर्ड तोड़ रही है.

भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री और कानून मंत्री अश्विनी कुमार के इस्तीफ़े की मांग पर अड़ी हुई है.

बीजेपी ने यह कहते हुए सदन का बहिष्कार कर दिया कि वह वित्त विधेयक को अटकाना नहीं चाहती.

सरकार का बचाव करते हुए संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि हम कुछ नहीं छुपा रहे हैं और बहस के लिए तैयार हैं.

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