भारत-चीन विवाद: फुंसी गई, दाग़ कब जाएगा?

भारत-चीन सीमा पर गश्त

विदेश मंत्री सलमान ख़ुर्शीद ने लद्दाख में भारत और चीन की सेनाओं के बीच हुए विवाद की तुलना ख़ूबसूरत चेहरे पर उग आए मुहांसे से की थी.

उन्होंने कहा था कि भारत और चीन के रिश्ते वैसे तो बहुत सुंदर हैं लेकिन लद्दाख में चल रहा सीमा विवाद एक मुहांसे जैसा है.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इसे “एक स्थानीय” विवाद बताया था.

पर ये विवाद सुलझने का नाम नहीं ले रहा था. पर रविवार की शाम दोनों देशों ने अपनी सेनाएँ पीछे हटाने का फ़ैसला किया - यानी कूटनीति के क्रीम ने अपना कमाल दिखाया है.

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने बीबीसी से कहा, “भारत और चीन की सरकारों ने पश्चिमी सेक्टर की वास्तविक नियंत्रण रेखा पर 15 अप्रैल 2013 से पूर्व की स्थिति बनाए जाने पर सहमति ज़ाहिर की है.”

पर अब सवाल ये उठ रहा है कि हो सकता है कि कूटनीति की क्रीम ने मुहांसे को ख़त्म कर दिया हो, पर बचे हुए दाग़ का क्या होगा?

सवालों का सिलसिला

Image caption लद्दाख इलाके में भारत और चीन के बीच सीमा अस्पष्ट है.

भारतीय पक्ष का कहना था कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने भारतीय सीमा के 19 किलोमीटर अंदर आकर अपने ख़ेमे गाड़ लिए हैं.

पर इस विवाद से भारत को क्या सबक सीखने चाहिए? क्या भारत इसे अपनी कूटनीतिक जीत कह सकता है? चीन के तंबू गाड़ने से जिस तरह दिल्ली में फ़ौजी, कूटनयिक और राजनीतिक तंत्र हिल गया उससे क्या भारत की अपनी कमज़ोरी उजागर नहीं हुई है?

पिछले एक पखवाड़े के दौरान भारतीय टेलीविज़न मीडिया में हिमालय के ठंडे और सूखे पहाड़ों पर चीनी तंबुओं की धुंधली तस्वीरें और चीनियों के सुर्ख़ रंग के बैनर की तस्वीरें कई बार दिखाई गईं.

दोनों देशों के फ़ौजी कमांडरों के बीच कई दौर की फ़्लैग मीटिंगों के बावजूद कोई नतीजा नहीं निकल पाया.

तब ये मामला ऊँचे कूटनयिक स्तर पर सुलझाने का फ़ैसला किया गया.

भारत के विदेश सचिव रंजन मथाई और चीन में भारत के राजदूत एस जयशंकर ने बड़ी भूमिका निभाई. कुल मिलाकर नतीजा क्या निकला?

कमज़ोरियाँ?

Image caption पचास साल पहले हुए युद्ध के बाद भारत और चीन एक दूसरे पर शक करते हैं.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर अलका आचार्य नहीं मानती कि इस पूरे घटनाक्रम में भारत की कमज़ोरियाँ उजागर हुई हैं.

उनका मानना है कि इस बार दोनों देशों ने परिवक्वता का परिचय दिया और पिछले दो दशकों में एक एक कदम करके जो कुछ हासिल किया है उसे बरबाद होने से बचा लिया.

कुछ विश्लेषक ये कहते हैं कि दरअसर ये विवाद चीन और भारत के बीच का विवाद नहीं बल्कि स्थानीय स्तर पर फ़ौजी कमांडरों का आपसी विवाद था.

उनका कहना है कि भारत और चीन दोनों के ही फ़ौजी कमांडरों ने अपनी “अति-सक्रियता” के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न होने दी जिसे सुलझाने के लिए दोनों देशों की सरकारों और कूटनयिकों को आगे आना पड़ा.

प्रोफ़ेसर अलका आचार्य कहती हैं कि ये मान लिया जाता है कि उस इलाक़े में दोनों देशों की सीमाएँ बाकयदा स्पष्ट हैं, लेकिन ऐसा है नहीं.

उन्होंने कहा, “जिस इलाके में ये विवाद हुआ वहाँ ऊँचे-ऊँचे निर्जन पहाड़ों में फ़ौजी गश्त करते हैं. ऐसे में कई बार इस तरह की ग़लकफ़हमिय़ाँ हो जाती हैं. पर सबसे बड़ी बात है कि उसे किस तरह सुलझाया जा रहा है.”

बहरहाल, उनका कहना है कि इस घटनाक्रम से सबक़ भारत को ये मिला है कि राजनीतिक स्तर पर चल रही कोशिशों के साथ साथ ज़मीन के यथार्थ को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए.

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