आखिर क्यों बन रहे हैं फरहान अख़्तर 'मर्द'

Image caption पुरुषों की मानसिकता को बदलने के लिए फरहान अख़्तर का नई मुहिम

फरहान अख़्तर इन दिनों बेहद व्यस्त हैं. वैसे व्यस्तता तो उनकी जीवनशैली का अहम हिस्सा भी है. अगर वे अभिनय नहीं कर रहे होते तो निर्देशन कर रहे होते हैं या फिर गाना गा रहे होते हैं.

वे एक ऐसे इंसान हैं जो चुनौतियों का सामना करना पसंद करते हैं. इन दिनों वे अपने फिल्मी कामकाज से हटकर पुरुषों को जागरुक करने के लिए “मर्द” (मेन अगेंस्ट रेसिज्म एंड डिस्क्रिमिनेशन) अभियान को आगे बढ़ाने में लगे हैं.

इसी सिलसिले में वे कोलकाता पहुंचे और “मर्द” अभियान के प्रतीक चिन्ह मूंछों को आम लोगों के बीच वितरित कर रहे हैं.

मूंछें भारत में पुरुषत्व का प्रतीक है. अपने इस अभियान के जरिए फरहान भारतीय पुरुषों को महिलाओं के हकों के प्रति जागरूक करना चाहते हैं ताकि वे महिलाओं को सम्मान दे सकें.

सहयोगी के साथ हादसा

अब ऐसे में सवाल ये उठता है कि मशहूर फिल्म अभिनेता भारतीय समाज में बदलाव लाने के प्रति इतना प्रतिबद्ध क्यों हैं?

फरहान बीबीसी से बातचीत में बताते हैं, “देश भर में महिलाओं के प्रति होने वाले व्यवहार को देख कर मैं बेहद नाराज और दुखी हो जाता हूं.”

लेकिन बात इतनी भर नहीं है. दरअसल महिलाओं के प्रति हिंसा का दर्द फरहान अख़्तर ने करीब से महसूस किया है.

उनकी कंपनी एक्सेल इंटरटेनमेंट में काम करती थीं पल्लवी पुरकायस्थ. 25 साल की पल्लवी इस समूह की वकील थीं.

उनके सामने चमकदार करियर था. लेकिन बीते साल अगस्त महीने में किसी ने उनके साथ बलात्कार करने की कोशिश की और असफल होने पर पल्लवी की हत्या कर दी.

फरहान अख़्तर कहते हैं, “इस हादसे की वजह से मैं इस अभियान से जुड़ा. मैं कुछ करना चाहता था. हम सब ये सोच रहे हैं कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या करें? लेकिन कोई यह नहीं बता रहा है कि ऐसी घटनाओं को कैसे रोका जाए?

फरहान अख़्तर के इस अभियान के लिए मूंछें कोलकाता में आईपीएल मैचों के दौरान बांटी गईं. लेकिन उन्हें ये देखकर काफी दुख हुआ कि युवा बस मौज मस्ती के नाम पर मूंछें लगा रहे थे.

Image caption दिल्ली में 16 दिसंबर को चलती बस में एक छात्रा के साथ हुए गैंगरेप के बाद हुए विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार को नया कानून बनाना पड़ा

फरहान के मुताबिक ये बेहद गंभीर मुद्दा है.

'ख़ास मनोवृति के शिकार हैं पुरुष'

फरहान को ऐसा क्यों महसूस होता है कि कुछ पुरुषों के मन में महिलाओं के लिए कम सम्मान होता है?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “देखिए हम एक पारंपरिक पितृसत्ता वाले समाज से आते हैं. इसके कारण एक खास तरह की मनोवृत्ति बनती है. यह वर्तमान में एक घातक रूप ले रही है. जो भविष्य के लिए काफी ख़तरनाक है.”

वे आगे कहते हैं, “जो लोग इस तरह की पारंपरिक सोच से इत्तेफ़ाक नहीं रखते, उनको बाकी लोगों को बताना होगा कि आप महिलाओं के इस तरह का बर्ताव नहीं कर सकते. मर्द होने का मतलब महिलाओं से दुर्व्यवहार करना नहीं है.”

फरहान अख़्तर फिल्म इंडस्ट्री से आते हैं, जो लोगों का ध्यान आकर्षित करने का तरीका जानती है. वे अपनी सारी खूबियों क इस्तेमाल कैंपेन को सफल बनाने के लिए कर रहे हैं.

वे भारतीय युवाओं को सोशल मीडिया के माध्यम से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं.

वे कहते हैं, “सिविल सोसायटी में बदलाव के लिए उसके ऊपर ध्यान देने की जरुरत है. पुरुषों को बताने की जरुरत है कि अगर आप महिलाओं के साथ एकसमान व्यवहार नहीं करते, लड़के और लड़की के बीच भेदभाव करते हैं, महिलाओं पर हाथ उठाते हैं और महिलाओं के साथ छेड़खानी करते हैं तो आप समाज का हिस्सा बनने के काबिल नहीं हैं.”

'दो बेटियों का बाप हूं'

Image caption फरहान अख़्तर अपने मुहिम को देश भर में फैलाना चाहते हैं

फरहान ख़ुद दो बेटियों के पिता हैं. उन्हें अपनी बेटियों के भविष्य की चिंता भी है.

वे कहते हैं कि “मैं भी आम माता-पिता में हूं. मैं चाहता हूं कि मेरी बेटियां भी मजे से जिंदगी जी सकें. मैं उन्हें इस काबिल बनाना चाहता हूं कि देश के किसी भी कोने में दोस्तों के साथ घूम सकें. उन्हें लगे कि उनकी परवाह करने वाले लोग समाज में हैं. इसके लिए मुझे समाज के अन्य लोगों तक पहुंचना होगा.”

अभिनेता फरहान अख़्तर को लगता है कि करीब 1.3 अरब की आबादी वाले भारत के लोगों में सिविक सेंस की कमी है.

वे हालात में बदलाव चाहते हैं लेकिन उन्हें मालूम है कि चुनौती बेहद मुश्किल है क्योंकि यहां के समाज में गहरा वर्गअंतर है.

दिल्ली में 23 वर्षीय छात्रा के ब्लात्कार और हत्या के बाद से फिल्म इंडस्ट्री में महिला पात्रों को दिखाने के तौर-तरीकों की आलोचना हो रही है.

फरहान अख़्तर के पिता और मशहूर पटकथा लेखक-गीतकार जावेद अख़्तर फिल्म इंडस्ट्री की ऐसी आलोचनाओं से सहमत हैं. लेकिन बहुत सारे लोग ऐसी आलोचनाओं को सिरे से नकार भी रहे हैं.

ऐसे में पर्दे के सामने और पीछे दोनों जगहों पर काम करने वाले फरहान अख़्तर क्या सोचते हैं?

अपनी सोच के बारे में फरहान अख़्तर बताते हैं, “बॉलीवुड में बहुत सारे लोग सतही फिल्में बना रहे हैं, लेकिन दूसरे लोग हैं जो अच्छा काम कर रहे हैं.”

फरहान आगे कहते हैं, “हमें उदाहरण पेश करने होंगे. इसके लिए दर्शकों को चाहिए कि वे महिलाओं को महज भोग की वस्तु की तरह परोसने वाली फिल्में न देखें. अभी ऐसा नहीं हो रहा, लेकिन जब लोग अलग तरीके से सोचना शुरू करेंगे तो ऐसा संभव होगा.”

'सब तक पहुंचे संदेश'

इस कैंपेंन का अगला ठिकाना कहां होगा?

इस सवाल के जवाब में फरहान कहते हैं, “इस संदेश को पहुंचाने के लिए मैं पूरे देश में स्कूल और कॉलेजों में जाएंगे.”

फरहान की मानें तो ये संदेश कहां तक पहुंचेगा, ये आम लोग ही तय करेंगे.

वे कहते हैं, “मैं इसे अपने तक सीमित नहीं रखना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि लोग तय करें कि इस संदेश को कहां तक पहुंचाना है और लोगों को इससे कैसे जोड़ना है?

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