भारत की तरक्की में संसद का रोड़ा

  • 2 मई 2013
Image caption संसद की कार्यवाही बाधित होने से करोड़ों रुपये का नुकसान

संसद सत्र के एक मिनट का खर्च ढाई लाख रुपये आता है. एक बजट सत्र के नहीं चलने से तकरीबन 18 करोड़ रुपये या उससे अधिक का नुकसान देश को होता है. लेकिन इससे भी बड़ा नुकसान देश की अर्थव्यवस्था और अवाम के विश्वास का होता है.

संसदीय कार्यवाही के लगातार अवरुद्ध होने से सौ से ज़्यादा बिल एक अरसे से अटके पड़े हैं, जिनमें खाद्य सुरक्षा बिल, भूमि अधिग्रहण बिल, लोकपाल बिल, व्हिसल ब्लोअर्स प्रोटेक्शन बिल, प्रत्यक्ष आयकर संहिता, इश्योंरेंस कानून (संशोधन), ज्यूडिशियल स्टैंडर्ड एंड एकाउंटेबिलिटी, सेक्सुअल हरसमेंट ऑफ़ वूमेन एट वर्कप्लेस जैसे अति महत्वपूर्ण बिल शामिल हैं.

खाद्य सुरक्षा बिल के पारित होने से देश की एक अरब बीस करोड़ आबादी के 67 फ़ीसदी हिस्से को खाद्य सुरक्षा की गारंटी मिलेगी. इसके प्रावधानों से निर्धन वर्ग को प्रति व्यक्ति पांच किलोग्राम अनाज-चावल, गेहूं और मोटा अनाज क्रमश: तीन, दो और एक रुपये की दर से मिलना है.

अटके हुए हैं सौ बिल

निष्पक्ष जानकारों का कहना है कि इससे न केवल अवाम का खाद्य सुरक्षा मिलेगी बल्कि उनके शिक्षा और स्वास्थ्य का स्तर भी ऊंचा होगा. विडंबना यह है कि वित्त मंत्री पी. चिदंबरम वित्त वर्ष 2013-14 के बजट में इस बिल के कार्यान्वन के लिए अतिरिक्त राशि का आवंटन भी कर चुके हैं. यह बिल 2010 से अटका पड़ा है.

इस पर संसदीय स्टैंडिंग समिति की सिफारिशें भी आ चुकी हैं.

सर्वदलीय बैठक में इस बिल मसौदे पर सर्व सहमति भी बन चुकी है. भूमि, वन और पर्यावरण संबंधी मंजूरियां न मिलने से सात लाख करोड़ रुपये की विद्युत, सड़क और स्टील परियोजना खटाई में पड़ी हुई है.

भूमि अधिग्रहण नहीं कर पाने की वजह से 90 बिलियन डॉलर यानी करीब 482850 करोड़ रुपयों की मुंबई- दिल्ली औद्यौगिक कॉरीडोर परियोजना का कार्य गति नहीं पकड़ पा रहा है. विद्युत उत्पादन की परियोजनाओं के लंबित होने से डीजल उपयोग बेहिसाब बढ़ रहा है.

डीजल की बढ़ते उपयोग से इसका आयात बढ़ रहा है, जिससे डॉलर की कीमत पर सतत दबाव बना हुआ है.

प्रत्यक्ष आयकर संहिता बिल के पारित होने से देश के आयकरदाताओं को भारी राहत मिलेगी. इस पर संसदीय स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट भी आ चुकी है जिसमें आयकर छूट की सीमा को बढ़ाकर तीन लाख रुपये सालाना करने की सिफारिश की गई है.

विकास दर पर असर

इसके अलावा पांच लाख रुपये सालाना आय पर दस फ़ीसदी, पांच से दस लाख रुपये की सालाना आय पर बीस फ़ीसदी और दस लाख रुपये से अधिक की सालाना आय पर तीस फ़ीसदी टैक्स लगाने का सुझाव इसमें शामिल है.

कमरतोड़ महंगाई से लोगों की व्यय योग्य आय काफी घटी है जिससे मांग में भारी कमी दर्ज हुई है. घटती मांग दर से आर्थिक विकास दर नौ सालों के न्यूनतम दर पर आ चुकी है.

इससे ही जुड़ा हुआ सवाल है वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) का. यह भी कई सालों से हिचकोले खा रहा है. जानकारों का कहना है कि जीएसटी लागू किए बिना प्रत्यक्ष कर संहिता लागू होना मुश्किल है क्योंकि आयकर में राहत देने से जो भी राजस्व का नुकसान होगा, उसकी भरपाई जीएसटी लागू होने से ही मिल पाएगी.

ऐसा अनुमान है कि जीएसटी लागू होने से सकल घरेलू उत्पाद में 0.9 से 1.7 फ़ीसदी का इजाफा स्वत: ही हो जाएगा. उम्मीद जताई गई है कि इससे तीन लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व केंद्र सरकार को मिलेगा.

बीमा कानून (संशोधन) बिल-2008 संसद में धूल खा रहा है. इसके तहत बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की हिस्सेदारी बढ़ाकर 49 फ़ीसदी की जानी है. ऐसा होने पर देश में डॉलर की आमद बढ़ेगी.

Image caption भारतीय संसद में सौ से ज़्यादा बिल अटके पड़े हैं

वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने बजट भाषण 2013-14 में साफ कहा है कि डॉलर देश के लिए अपरिहार्य है. असल में नवउदारवादी नीतियों को अपनाने के बाद देश का आर्थिक अस्तित्व डॉलर की मुट्ठी में बंद हो चुका है.

ज्यूडिशिएल स्टैंडर्डर्स एंड अकाउंटेबिलिटी बिल की देश को अरसे से प्रतीक्षा है. न्यायिक सुधार के लिए आवश्यक इस बिल के तहत न्यायाधीशों के लिए अनिवार्य अचार संहिता लागू होनी है जिसमें न्यायाधीशों को अपनी संपदा और दायित्वों की घोषणा करना अनिवार्य हो जाएगा. इसके साथ ही न्यायाधीश के आचरण और अक्षमता को लेकर शिकायत भी की जा सकेगी.

लंबित हैं तीन करोड़ मुकदमे

ज्ञातव्य है कि देश की विभिन्न न्यायालयों में तीन करोड़ से अधिक मुकदमें लंबित है जिसमें बलात्कार और यौन उत्पीड़न के चौबीस हजार से अधिक मामले केवल उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं.

देश की राजधानी में घटित निर्भया कांड के बाद उम्मीद थी कि इस प्रकार की क्रूर घटनाओं से निबटने के लिए कानून व्यवस्था और न्यायिक प्रणाली में चुस्ती आएगी. लेकिन क्रूर मजाक है कि कार्य स्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न संबंधी बिल भी पारित कराने की चिंता संसद को नहीं है.

2011 के अन्ना हजारे के जनलोकपाल बिल के आंदोलन ने भ्रष्टाचार से बेहद क्षुब्द देश को हिलाकर रख दिया था, तब लोकपाल बिल पारित करने के लिए लोकसभा में सर्वसहमति बनी थी. लेकिन इसके बाद भी किसी राजनीतिक दल की इस बिल को पारित कराने में कोई रुचि नहीं दिखाई पड़ रही है.

लोकतंत्र के लिए ख़तरा

निस्संकोच कहा जा सकता है कि इससे राजनीतिक दलों, सरकारों, सांसदों और विधायकों की बेलगाम शक्ति पर अंकुश लगेगा.

व्हिसल ब्लोअर्स प्रोटेक्शन बिल सार्वजनिक शंकायाओं के अधिकारियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार की शिकायत करने वालों की सुरक्षा के लिए लाया गया है, ताकि निडर होकर लोग शिकायत कर सकें.

इससे जुड़ा हुआ और एक बिल शिकायत निवारक कानून भी लंबित है. इसके तहत सरकारी महकमों को निर्धारित समय में सुविधाओं, सेवाओं और वस्तुओं को मुहैया कराना पड़ेगा, लेकिन यह बिल भी संसद में धक्के खा रहा है.

कहना न होगा कि राजनीतिक दलों, सांसदों के आचरण से देश की सबसे बड़ी विधायी संस्था के प्रति लोगों का सम्मान और विश्वास खत्म हो रहा है, जो किसी भी देश के लोकतंत्र के लिए ख़तरे की घंटी है.

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