'भावुक' भारतीय मीडिया, पाकिस्तान 'संयमित'

  • 2 मई 2013
Image caption सरबजीत की रिहाई, जल्द स्वस्थय होने के लिए भारत में लोगों ने जुलूस निकाला और प्रार्थनाएं की

पाकिस्तान में लाहौर के जिन्ना अस्पताल में सरबजीत सिंह की मौत की रिपोर्टिंग करते वक्त भारत और पाकिस्तान की मीडिया ने अलग-अलग रुख अपनाया.

सरबजीत पिछले शुक्रवार के बाद से ही कोमा में थे. उन पर लाहौर की कोट लखपत जेल में कैदियों ने ईंटों से हमला किया था.

आधी रात के बाद उनकी मौत की खबर पाते ही दोनों देशों के चैनलों ने ब्रेकिंग न्यूज के साथ रिपोर्टिंग शुरू की. लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतता गया, दोनों ओर की रिपोर्टिंग का अंदाज बदलता गया.

एक तरफ जहां भारत के चैनल और वेबसाइट ने सरबजीत सिंह को शहीद बताया, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तानी चैनलों ने तथ्यों पर आधारित सरकारी लाइन पर रिपोर्टिंग की. पाक चैनलों ने कहा कि सरबजीत सिंह को सबसे अच्छी चिकित्सा सुविधा प्रदान की गई.

रवैया

जिओ न्यूज, एआरवाई न्यूज, एक्सप्रेस न्यूज, डॉन न्यूज जैसे चैनलों में सरबजीत सिंह की मौत की खबर को थोड़ी देर बाद बुलेटिन में नीचे कर दिया गया. शुरुआत में कुछ देर तक ये बुलेटिन की खबर नंबर एक थी.

पाकिस्तान के सभी चैनलों के एंकर इस मसले पर वस्तुगत रुख अपना रहे हैं. वे न तो सरकार का समर्थन कर रहे हैं और न ही उसकी आलोचना कर रहे हैं.

आमतौर पर ऐसा होता नहीं. भारत और पाकिस्तान की मीडिया में इस तरह के मसलों पर छींटकशी का दौर शुरू हो जाता है.

जिओ और एआरवाई जैसे चैनलों ने तो सरबजीत सिंह की पृष्ठभूमि औऱ पाकिस्तान में उनके मुकदमे और मौत से संबंधित खबरें भी दिखाई हैं.

सोशल मीडिया

Image caption सरबजीत की मौत को पाकिस्तान की मीडिया ने वस्तुगत तरीके से पेश किया. उनकी बहन और बेटी लाहौर भी गई थीं.

न केवल न्यूज चैनल बल्कि सोशल मीडिया में भी सरबजीत सिंह की मौत पर अलग अलग राय सामने आई है.

ट्विटर पर पाकिस्तान के लोगों की ओर से संयमित टिप्पणी आ रही है. हालांकि कुछ लोग ऐसे हैं, जो सरबजीत की मौत के तौर तरीकों पर सवाल उठा रहे हैं लेकिन बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने देश पर सवाल नहीं खड़ा करना चाहते.

पत्रकार बनीना सरवार कहती हैं, “इससे पहले भी पाकिस्तान के कैदी और गार्ड दूसरे कैदियों को मारते रहे हैं. खासतौर से अगर कैदी “दूसरे” देश का है तो स्थिति और भी खराब हो जाती है.”

पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता मारवी सिरमद कहते हैं, “आज आपके राष्ट्रप्रेम का पैमाना यही है कि आप सरबजीत सिंह को नफरत करें और जो भी इस बर्बर हत्याकांड से दुखी है उस पर भी हमला कीजिए.”

जिओ न्यूज के पत्रकार फैजन लखवी कहते हैं, “लाहौर बम धमाके में सरबजीत ने अपनी भूमिका स्वीकार की थी. भारत उसे हर तरह का सम्मान भी दे रहा है इसके बाद भी भारत हर बात के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहरा रहा है.”

भारत का मीडिया

इसके विपरीत भारत के समाचार चैनल जैसे एनडीटीवी, सीनएनएन-आईबीएन, टाइम्स नाऊ, आजतक, एबीपी न्यूज इस खबर को प्रमुखता से चला रहे हैं.

इन चैनलों का रुख खबर को लेकर भावुकतावादी है. टाइम्स नाऊ ने कहा है, “भारत ने तुष्टिकरण की, जबकि पाकिस्तान ने की हत्या.”

सीएनएन-आईबीएन जैसे गंभीर माने जाने वाले चैनल भी मांग कर रहे हैं कि पाकिस्तान को मामले की स्वतंत्र जांच करानी चाहिए. कई चैनल सरबजीत सिंह की मौत के कूटनीतिक परिणाम के बारे में भी अनुमान लगा रहे हैं.

संवेदनशील रुख़ अपनाते हुए चैनल सरबजीत सिंह के परिवार के दुख को बढ़-चढ़कर दिखा रहे हैं. भारत के चैनलों ने सरबजीत सिंह की बहन दलबीर कौर का गुस्से से भरा बयान भी दिखाया है.

ट्विटर पर दुख

भारत में भी ट्विटर पर सरबजीत सिंह की मौत को लेकर लोग अपने-अपने विचार जाहिर कर रहे हैं.

कुछ लोगों ने इस पर दुख जताया है तो कुछ लोगों ने सरकार को पर आरोप लगाया है कि उसने सरबजीत सिंह के मामले में पर्याप्त प्रयास नहीं किया.

मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता किरण बेदी ने ट्विटर पर लिखा,“ये मानवाधिकार हनन का गंभीर मामला है.”

फोटो पत्रकार अतुल कासबेकर लिखते हैं, “हम कहते हैं कि वो किसान था. वो कहते हैं कि वो जासूस था. कुछ भी हो 16 साल से अधिक का वक्त वो जेल में बिता चुका था. क्या ये सजा पर्याप्त नहीं थी?”

"द न्यू इंडियन एक्प्रेस" के संपादकीय निदेशक प्रभु चावला कहते हैं, “बातचीत की पैरवी करने वाले कहां छिप गए? लोगों का उनका समाजिक बहिष्कार करना चाहिए.”

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