भारत प्रशासित कश्मीर में हिंदी की बयार

Image caption कश्मीर विश्विविद्यालय के हिंदी विभाग की रौनक अब बढ़ने लगी है

भारत प्रशासित कश्मीर में हिंदी को लेकर नई बयार बह रही है. दो दशक से अधिक समय तक चलने वाले सशस्त्र आन्दोलन के कारण दम तोड़ चुकी हिंदी अब एक नए सिरे से अपनी मौजूदगी का एहसास करा रही है.

ख़ास बात ये है कि इनमें अधिकांश मुस्लिम हैं और अन्य सिख समुदाय से संबंधित हैं. दिलचस्प ये भी है कि इनमें कोई हिंदू नहीं है.

अलगाववादी हिंसा शुरू होने के तुरंत बाद कश्मीरी पंडित समुदाय के लोग घाटी से पलायन कर गए. इसके चलते कश्मीर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग मे विद्यार्थियों की संख्या महज दो रह गई.इसके बाद पंद्रह वर्षों तक ऐसी ही स्थिति बनी रही.

लेकिन आज कश्मीर विश्वविद्यालय में हिंदी के विद्यार्थियों की संख्या पैंतालीस तक पहुंच गई है. इनमें पैंतीस छात्र हिंदी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे हैं. जबकि दस दूसरे छात्र हिंदी में शोध अध्ययन कर रहे हैं.

जोहरा का कमाल

भारत प्रशासित कश्मीर में हिंदी को नया जीवन दिलाना प्रोफेसर ज़ोहरा अफज़ल की कोशिशों का नतीजा है. उन्होंने इसके लिए काफी प्रयत्न किए.

उन्होंने उन कोशिशों को याद करते हुए बताया, “हिंदी विभाग करीब-करीब खत्म हो चुका था. सारे हिंदू विद्यार्थी और शिक्षक घाटी छोड़कर जा चुके थे. बस दो छात्र रह गए थे और मैं इकलौती शिक्षक. हम तीनों ही मुसलमान थे.”

मतलब हिंदी के लिए हालात अच्छे नहीं थे. लेकिन ज़ोहरा अफज़ल ने उम्मीद नहीं छोड़ी. उन्होंने बताया, “मैं उपकुलपति से मिली और उन्होंने मुझे एडहॉक शिक्षक नियुक्त करने की अनुमति दे दी.”

इसके अलावा उन्होंने स्थानीय रेडियो सेवा में टॉक शो के ज़रिए आम लोगों तक ये संदेश पहुंचाने की कोशिश की है हिंदी भाषा सीखने वालों को तुरंत नौकरी मिल सकती है.

नौकरी की भाषा बनी हिंदी

प्रोफेसर ज़ोहरा अफज़ल को अपना संघर्ष वर्षो तक जारी रखना पड़ा. आखिरकार उनको सफलता मिल ही गई.

वे कहती हैं, “मेरे पास कई माता पिता आए. उन्होंने कहा कि हमारे बच्चे स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में दाखिला नहीं ले सकते क्योंकि उन्होंने हिंदी में स्नातक का पाठ्यक्रम पूरा नहीं किया है. तब हमारे विश्वविद्यालय ने इस समस्या के हल के लिए बच्चों को सर्टिफिकेट कोर्स से परिचित कराया.”

कोशिशें इसलिए भी रंग लाने लगीं क्योंकि हिंदी पढ़ने वाले छात्रों को कामयाबी भी मिलने लगी.

उन्होंने बताया, “जो छात्र हिंदी में एमए करके निकले उन्हें कहीं न कहीं नौकरी मिल गई. कोई स्कूल में टीचर बन गया, तो कोई कॉलेज में लेक्चरर बना और किसी को अनुवादक की नौकरी मिल गई.”

Image caption हिंदी की कक्षा में छात्रों को पढ़ाती हुई जोहरा अफ़जल

कुमारी फराह भट्ट हिंदी में एमए कर रही हैं. उन्हें भरोसा है कि उन्हें भी नौकरी मिल जाएगी.

फराह कहती हैं, “मैंने हिंदी पढ़ने का फ़ैसला लिया तो मेरे माता-पिता ने मेरा पूरा साथ दिया. उन्होंने मुझे बताया है कि इसमें बहुत ज़्यादा स्कोप है और आप जानते हैं कि आजकल हर किसी को नौकरी की फ़िक्र रहती है.”

गैर हिंदू पढ़ रहे हैं हिंदी

यही वजह है कि आजकल भारत प्रशासित कश्मीर में संस्कृत पढ़ने के प्रति दिलचस्प भी बढ़ी है.

नौकरी पाने की उम्मीद में उत्तरी कस्बा पाटन की छात्रा परवीज़ा ने संस्कृत में दाखिला लिया था, जबकि उन्होंने विज्ञान विषयों में स्नातक किया था.

परवीज़ा बताती हैं, “मैंने सुना है कि सीबीएसआई स्कूलों में संस्कृत पढ़ाने वालों को नौकरी मिलती है.”

हालांकि कई छात्रों का ये भी मानना है कि हिंदी पढ़ने के कारण उन्हें कई बार असहज सवालों का भी सामना करना पड़ता है.

कुमारी फराह भट्ट कहती हैं, “एक बार एक महिला ने हमसे पूछा है कि हम हिंदी क्यूं पढ़ रही हैं? ये तो हिंदुओं की भाषा है. मैं हर बार ऐसे सवालों का जवाब नहीं देती लेकिन जब देती हूं तो कहती हूं कि भाषा का धर्म के साथ कोई लेना देना नहीं है.”

वरिष्ठ पत्रकार रशीद अहमद कहते हैं कि हिंदी को एक लम्बे समय से हिन्दुओं की भाषा माना जा रहा है जबकि उर्दू को मुसलमानों के साथ जोड़ा गया है.

वे याद करते है की 1990 के दशक में जब चरमपंथी आन्दोलन शुरू हुआ तो लोग हर उस चीज़ से दूर रहने लगे जो भारत की प्रतीक मानी जाती थी.

रशीद कहते हैं, “मैंने देखा है कि भारतीय अख़बारों के लिए काम करने वाले कई पत्रकार अपना पहचान पत्र तक दिखाने से कतराते थे.”

पुलवामा का हिंदी कवि

लेकिन दक्षिणी जिला पुलवामा में जन्मे हिंदी कवि निदा नवाज़ को अपनी पहचान छिपाने की ज़रुरत नहीं पड़ी. उन्हें ख़ुद के हिंदी कवि होने पर गौरव है.

निदा नवाज़ ने पटना, बिहार में हिंदी सीखी और वहीं से हिंदी में एमए की डिग्री प्राप्त की.

नवाज़ बताते हैं, "मैंने एक शॉर्ट स्टोरी लिखी जो जम्मू के एक हिन्दी अखबार में प्रकाशित हुई. मुझे देश के विभिन्न भागों से सराहना भरे पत्र मिले. इन प्रोत्साहनों की वजह से ही मैं हिंदी भाषा का होकर रह गया.”

नवाज़ को 1998 में 'अक्षर अक्षर रखत भरा' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था.

वे जम्मू कश्मीर के बाहर कई जगह कवि सम्मेलनों में भाग लेते रहे हैं लेकिन कश्मीर घाटी में सतीश विमल उनके एकमात्र साथी हैं जो कि हिंदी मे कविता करते हैं.

वे कहते हैं, "हम अक्सर कैंटीन में बैठते हैं. मैं उनको अपनी कविताए सुनाता हूँ और वे मुझे अपनी."

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