....जब हुसैन बिक्रम पर हो गए थे फिदा

Image caption एम एफ हुसैन के साथ के बिक्रम सिंह. (फाइल फोटो)

रविवार को प्रख्यात स्तंभकार, डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर और फिल्मकार के बिक्रम सिंह का 74 साल की उम्र में निधन हो गया.

'तर्पण' जैसी चर्चित फिल्म बनाने वाले बिक्रम सिंह नियमित तौर पर अखबारों के लिए स्तंभ लिखते थे. वो जनसत्ता अखबार में स्तंभकार थे.

जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में कहा कि उनके लेखों का पाठक बेसब्री से इंतज़ार करते थे. वो सिनेमा, कला जगत के अलावा राजनैतिक विषयों पर भी स्तंभ लिखा करते थे.

उन्होंने कई चित्रकारों और कवियों पर वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) बनाए. मक़बूल फ़िदा हुसैन पर लिखी उनकी किताब को हुसैन पर लिखी सबसे गंभीर किताब माना जाता है.

ओम थानवी कहते हैं, "हुसैन साहब की कई पेंटिग्स के आधार उन पर सांप्रदायिक होने के आरोप लगे. लेकिन बिक्रम जी ने उनकी कला को और उनके व्यक्तित्व के विकास को समझने की पूरी कोशिश की. उनके रंगों के मनोविज्ञान को समझा. उनकी किताब में साफ तौर पर बताया गया कि एमएफ़ हुसैन पर सांप्रदायिकता के सारे आरोप ग़लत थे."

थानवी ने बताया कि ख़ुद मक़बूल फ़िदा हुसैन उनकी किताब से इतने ख़ुश हुए कि उन्होंने प्रकाशक से ढेर सारी किताबें ख़रीद लीं और हर मिलने वाले को वो किताब ज़रूर भेंट करते थे. हालांकि वो पुस्तक क़रीब दस हज़ार रुपए की थी.

फ़िल्मकार

उन्होंने 'अंधी गली' और 'तर्पण' जैसी चर्चित फिल्में बनाईं. शशि कपूर अभिनीत 'न्यू डेल्ही टाइम्स' के वो कार्यकारी निर्माता थे. लेकिन वो ज़्य़ादा फ़ीचर फिल्में नहीं बना पाए.

फिल्म 'तर्पण' में काम कर चुके अभिनेता ओम पुरी ने बीबीसी को बताया, "बिक्रम सिंह बेहद मीठे इंसान थे. सेट में किसी पर चीखते चिल्लाते नहीं थे. बड़े खेद की बात है कि उनके जैसे बेहतरीन फिल्मकार को वितरक नहीं मिल पाते थे."

ओम थानवी कहते हैं, "बिक्रम सिंह जिस तरह की गंभीर फिल्में बनाते थे, वैसी फिल्मों में पैसा लगाने के लिए निर्माता मिलते नहीं. लेकिन एक तरह से ये अच्छा हुआ. क्योंकि इससे वो पूरा ध्यान डॉक्यूमेंट्री बनाने पर लगा पाए. कला और साहित्य जगत से जुड़े लोगों पर इतने शानदार वृत्तचित्र शायद ही कोई बना पाया हो."

अधूरी तमन्ना

Image caption फ़िल्म 'तर्पण' की शूटिंग के दौरान ओमपुरी को एक सीन समझाते के बिक्रम सिंह.

हुसैन के अलावा बिक्रम सिंह ने कुंवरनारायण सिंह और केदारनाथ जैसे प्रख्यात हिंदी कवियों पर भी वृत्तचित्र बनाए.

वो प्रख्यात फिल्मकार सत्यजीत रे के बहुत बड़े प्रशंसक थे. उन्होंने सत्यजीत रे के साथ हुई अपनी एक मुलाक़ात को फिल्म की शक्ल में भी ढाला.

वो सत्यजीत रे पर एक किताब भी लिखना चाहते थे. जिसमें वो रे के सिनेमाई पक्ष को उभारना चाहते थे. लेकिन वो ऐसा कर नहीं पाए.

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