'भइया, मुझे बचा लो, मैं मरना नहीं चाहती'

  • 15 मई 2013
Image caption पूनम इलाहाबद यूनिवर्सिटी से लॉ में पीएचडी कर रही थी.

(ऐश्वर्य मोहन गहराना ने अपनी मां और बहन को स्तन कैंसर के कारण खोया है. उन्होंने अपने अनुभव बीबीसी हिंदी के साथ साझा किए हैं.)

''भइया मैं मरना नहीं चाहती. प्लीज़ मुझे बचा लो. तुम्हीं मुझे बचा सकते हो.''

मेरी छोटी बहन पूनम सिर्फ 31 की थी जब स्तन कैंसर के कारण उसकी मौत हो गई. अस्पताल के बिस्तर पर मेरा हाथ पकड़े जब वो कहती कि वो मरना नहीं चाहती तो मैं खुद को कितना असहाय महसूस करता था वो बता नहीं सकता.

मेरी मां की मौत भी स्तन कैंसर के कारण ही हुई थी. डर तो था कि बहन को भी हो सकता है. फिर एक दिन रात में बहन का फोन आया कि स्तन में गांठ है. मैं दिल्ली से दौड़ा दौड़ा अलीगढ़ गया था.

स्थानीय अस्पताल गए तो शक हुआ फिर हम उसे दिल्ली ले आए. दिल्ली कई अस्पतालों में जांच करवाई और कैंसर पाया गया. रॉकलैंड अस्पताल में स्तन की गांठ और आस पास का हिस्सा निकाला गया. प्रयोग सफल रहा.

उस समय पूनम 24 की थी. वो अपना स्तन बिल्कुल नहीं निकलवाना चाहती थी. उसके बाद पूनम ने पढ़ाई जारी रखी. वो अपनी पीएचडी करने के लिए इलाहाबाद गई.

'स्तन हटवाना नहीं चाहती थी पूनम'

Image caption ऐश्वर्य पूनम को याद कर के अभी भी भावुक हो जाते हैं.

करीब छह साल बाद फिर फोन आया कि भईया दूसरे स्तन में गांठ पता चला है. फिर से हमने डॉक्टरों से संपर्क किया. दिल्ली के डॉक्टरों ने कहा कि स्तन हटाना पड़ेगा. पूनम दो तीन दिन तक रोती रही थी. वो बिल्कुल नहीं चाहती थी कि स्तन पूरा निकाला जाए.

बहुत समझाना पड़ा था. डॉक्टरों ने बताया कि इसके अलावा कोई चारा नहीं है.

कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी भी होती दोबारा. पूनम अब मां भी नहीं बन सकती थी. उसके लैपटॉप में पढ़ाई से अधिक फाइलें कैंसर से जुड़ी थी. उसे उतना ही पता था कैंसर के बारे में जितना उसके डॉक्टरों को.

इलाज़ चला लेकिन हमने फैसला किया कि स्तन नहीं हटाया जाएगा क्योंकि कैंसर स्तन से ऊपर गले और मस्तिष्क तक पहुंच गया था. डॉक्टरों ने कहा था कि छह महीना या साल भर का ही समय है. अगर स्तन हटाया तो दर्द के साथ कुछ और समय जी पाएगी पूनम.

फरवरी 2012 उसकी हालत बिगड़ने लगी. सारे शरीर में गांठे आने लगी. दिमाग तक पहुंच गई गांठे. उसकी मानसिक हालत भी खराब हो गई थी.

मां और बहन दोनों को हमने अपने सामने जाते हुए देखा. कितना शारीरिक दर्द होता है उसका अंदाज़ा लोगों को नहीं है.

भारत में इन बीमारियों की लोगों को समझ नहीं है. अगर किसी को बुखार होता है तो लोग ज्यादा सहानुभूति दिखाते हैं. स्तन कैंसर जैसी बीमारियां बाहर दिखती नहीं हैं तो लोग समझते नहीं हैं.

पूनम अपनी बीमारी के बारे में ज्यादा लोगों को बताना नहीं चाहती थी क्योंकि उसे पता था लोग समझेंगे नहीं.

'लोगों को समझ नहीं है'

Image caption कैंसर का पता चलने के बाद भी पूनम ने पढ़ाई जारी रखी और वो इलाहाबाद से पीएचडी कर रही थीं.

मैंने जब बीबीसी के फेसबुक पन्ने पर टिप्पणियां देखीं तो बुरा लगा.

किसी ने लिखा है कि स्तन के बिना दुनिया नीरस हो जाएगी. उन्हें ये सोचना चाहिए कि स्तन महिला के शरीर का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है और कोई अपनी खुशी से स्तन नहीं निकलवाता है. जो शारीरिक दर्द और मानसिक परेशानी होती है उसका अंदाज़ा लोगों को नहीं है.

मौत से कोई नहीं लड़ सकता लेकिन किसी बीमारी के बारे में ऐसी उथली बात नहीं होनी चाहिए. हमारे आसपास भी कई लोगों ने कहा कि क्यों समय नष्ट कर रहे हैं जो होना है हो जाएगा.

जब बीमारी शुरु होती है तब लोग सहानुभूति दिखाते हैं. बाद में हर दिन के संघर्ष में समाज के कम लोग साथ देते हैं.

हमारे देश में लोग हर बात को पाप पुण्य से जोड़ देते हैं. वो नहीं समझते कि कैंसर किसी को भी हो सकता है. मैंने मां और बहन खोया है.

मौत तो आती है सबको लेकिन कैंसर से मौत दर्दनाक होती है. सात साल तक मेरी बहन ने कैंसर को भोगा है और पल पल मरी है. उस दर्द का अहसास लोगों को होना चाहिए.

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