लालू की रैली क्या रंग लाएगी बिहार में?

Image caption बुधवार को पटना के गांधी मैदान में होने वाली राजद की रैली का पोस्टर

राष्ट्रीय जनता दल बिहार सरकार के खिलाफ़ 15 मई को पटना में ‘परिवर्तन महारैली’ नाम से एक रैली कर रहा है। इसे सफल बनाने में राजद ने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है.

पटना के गाँधी मैदान तक जाने वाली तमाम सड़कों और शहर के सभी चौक-चौराहों को बड़े-बड़े होर्डिंग्स और बैनर-पोस्टर से पाट दिया गया है.

इससे पहले यहाँ इतनी भारी तादाद में किसी पार्टी-रैली के प्रचार वाले होर्डिंग और बैनर-पोस्टर नहीं लगे थे.

राज्य के विभिन्न हिस्सों से लोगों को पटना लाने और वापस ले जाने के लिए पार्टी ने अपने खर्च पर तेरह रेलगाड़ियों की सेवाएं उपलब्ध कराई हैं.

(इस रैली के सन्दर्भ में लालू प्रसाद से बीबीसी की ख़ास बातचीत सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें )

यूं ही नहीं यह सक्रियता

इतनी व्यापक तैयारी के मद्देनज़र इस रैली में भारी भीड़ जुटने का अनुमान लगाया जा रहा है. लेकिन इसी सिलसिले में कई ऐसे सवाल भी उभरे हैं, जो ' लालू राज ' की वापसी होने या नहीं होने के कारणों से जुड़े हैं.

पहला बड़ा सवाल ये है कि क्या लालू प्रसाद को दो दशक पहले जैसा अवसर और जनाधार आज भी हासिल हो सकता है?

Image caption लालू के बेटे तेजस्वी यादव क्रिकट के मैदान में भी हाथ आजमा चुके हैं

उस समय उन्हें ' सामाजिक न्याय ' के नारे के तहत पिछड़ी जातियों की एकजुटता और मुस्लिम-यादव समीकरण जैसी सियासी ताक़त मिली हुई थी.

पंद्रह वर्षों के उस राज-पाट के दौरान जहाँ दलित-पिछड़े तबक़ों में अधिकार-बोध और आगे बढ़ने का हौसला बढ़ा, वहीं शासन-शक्ति के दुरूपयोग वाले ढेर सारे अशुभ लक्षण भी उभरते चले गए.

ख़ास कर स्व-परिवार केन्द्रित सत्ता सुखभोग और चारा घपले के आरोपों में फंसे लालू प्रसाद के सितारे मलिन होने लगे.

रेल मंत्री रहने तक जो उनकी चमक बाक़ी थी, बाद में वो भी मंद पड़ गयी.

अब आठ साल पुरानी नीतीश सरकार के कमज़ोर पक्षों से उपजे जनाक्रोश में लालू प्रसाद अपनी सत्ता-वापसी की संभावना देख रहे हैं.

इसलिए लंबी शिथिलता के बाद पिछले कुछ महीनों से वो सक्रिय हुए हैं.

लालू नहीं बदलेंगे

15 मई की 'परिवर्तन रैली' के ज़रिये लालू प्रसाद के दोनों बेटों- तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव को उभारने का सुनियोजित प्रयास भी साफ़ दिख रहा है.

( तेजस्वी का राहुल-प्रेम)

इस कारण ख़ुद राजद के कई बड़े नेता असहज हो उठे हैं. अनौपचारिक बातचीत में वह कहते हैं कि लालू जी ने अपने कथित परिवार मोह के अतीत से सबक नहीं सीखा है.

Image caption लालू के बेटे तेज प्रताप भी कई बार पार्टी की गतिविधियों में दिखाई देते हैं

भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के नेताओं का कहना है कि लालू जी के साले एस-2 (साधु यादव और सुभाष यादव ) की जगह अब टी-2 (तेजस्वी और तेज प्रताप) आ रहे हैं.

इस आरोप पर लालू प्रसाद ने बीबीसी के साथ एक बातचीत में कहा, ''नीतीश अपने बेटे की चिंता करें. मैं उनसे पूछता हूँ कि हमारे बच्चे 'लालटेन' नहीं उठाएंगे तो क्या 'कमल' और 'तीर' उठाएंगे? मेरे बेटे तेजस्वी का राजनीतिक रुझान लोगों ने पिछले विधानसभा चुनाव में भी देखा था. साधु और सुभाष को अपने किए की सज़ा मिल चुकी है और मैं उन पुरानी गलतियों के लिए जनता जनार्दन से माफी मांग चुका हूँ.''

जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद शिवानंद तिवारी मानते हैं कि लालू प्रसाद किसी भी हालत में अपना परिवार मोह और अपनी पुरानी आदत नहीं छोड़ सकते.

उन्होंने बीबीसी से कहा ''सत्ता में वापसी का सपना लालूजी भले ही देख रहे हों लेकिन वो कभी साकार होने वाला नहीं है. कारण है कि दोनों पति-पत्नी के शासन काल में जैसी अराजकता, अपराध और विकासहीनता वाला माहौल बना, उसका भय और आतंक लोगों के मानस में अब भी क़ायम है.''

गुंजाइश तो है

इसमें दो राय नहीं कि बिहार में विकल्पहीनता की मौजूदा राजनीतिक स्थिति जदयू- भाजपा गठबंधन को रास आ रही है. उसे मिल रही चुनौती एकमात्र और कमज़ोर राजद की ही है.

शायद इसलिए माना जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी के सवाल पर अगर भाजपा-जदयू गठबंधन टूटा, तो बिहार की भावी सत्ता-राजनीति में जदयू और भाजपा ही सत्ता पक्ष और मुख्य विपक्ष की भूमिका में होंगे.

Image caption रैली से एक दिन पहले पटना के गांधी मैदान में चर्चा करते बुजुर्ग

लेकिन ऐसी स्थिति में ये भी संभव हो सकता है कि मुक़ाबले का त्रिकोण बन जाय और उसमें लालू यादव का राजद एक मज़बूत कोण की शक्ल में उभर आए.

राजद के पक्षधर इस 'परिवर्तन रैली' में वैसा ही कोई संकेत ढूंढने का प्रयास करेंगे और विरोधियों की नज़र 'परिवारवाद' जैसी नुक्स तलाशी पर ज़्यादा होगी.

जो भी हो, चर्चा इस बात पर भी हो रही है कि लंबे समय के बाद लालू अपने शासनकाल की बहुचर्चित रैलियों वाले रंग में चुस्त नज़र आयेंगे या सुस्त दिखेंगे?

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