ममता पर भरोसा, साथियों पर नहीं

  • 20 मई 2013

पश्चिम बंगाल के लोगों ने दो साल पहले ममता बनर्जी को धूम-धाम से सत्ता पर बिठाया था. वामपंथी मोर्चे को चुनाव में ज़बरदस्त शिकस्त देने का सेहरा ममता 'दीदी' को दिया गया.

और इसके साथ ही लोगों ने उनकी तरफ उम्मीद लगा कर देखना शुरू कर दिया.

इन उम्मीदों पर ममता कहती हैं, "हम ने जितना इस काल में काम कर दिखाया उतना वामपंथी मोर्चे ने 34 के अपने शासन काल में नहीं किया था."

सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए ममता की काबीना के शहरी विकास मंत्री फ़िर्हाद हकीम कहते हैं, "आर्थिक संकट के बावजूद हम ने माओवादी हिंसा ख़त्म की. हजारों लोगों को नौकरियां दीं. हमारे खिलाफ लोगों को शिकायत है तो उन्हें समझना होगा हमें विरासत में आर्थिक कठिनाइयाँ ही मिली हैं."

'10 में से 5.5 नंबर'

हालांकि ममता को लेकर लोगों का भरोसा हिला नहीं है. सैबल मुख़र्जी जलपाईगुड़ी के एक शिव मंदिर में पुजारी हैं.

उनका कहना है कि ममता बनर्जी ईमानदार है लेकिन वे उनके साथ के लोगों पर भरोसा नहीं कर पाते.

प्रोफ़ेसर गार्गी नाथ उसी जगमाया देवी कॉलेज की प्रिंसीपल हैं जहाँ से ममता बनर्जी ने बैचलर डिग्री हासिल की थी.

वह कहती हैं, "मैं उन्हें 10 में से 5 .5 नंबर दूँगी. उनसे अब भी उम्मीद है लेकिन उन्हें अपने साथियों पर नज़र रखनी होगी."

दक्षिण 24 परगना के जयनगर में पेशे से काश्तकार तपन दास कहते हैं, "दीदी ने हमसे बड़े-बड़े वादे किए थे लेकिन वो पूरे नहीं हुए. हमें उनसे मायूसी हुई है."

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार के दो साल पूरे होने पर समाज के अलग-अलग वर्गों के लोगों की मिली जुली राय है.

लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या ममता बनर्जी इन आवाजों को सुन पा रही हैं?

सत्ता में दो साल

Image caption ममता के कार्यकाल में नक्सली हिंसा के मामलों में कमी देखी गई है.

कौशिक सेन थिएटर से जुड़े है. नंदीग्राम आन्दोलन में वो ममता बनर्जी के समर्थन में आगे-आगे थे लेकिन अब उनसे मायूस हो कर अलग हो गए है.

वो कहते हैं, "ममता बनर्जी फिलहाल किसी की नहीं सुनतीं. उन्हें आलोचना बिलकुल ही पसंद नहीं है. उन्हें अपनी ग़लतियों का एहसास भी नहीं."

शहरी विकास मंत्री हकीम कहते हैं, "दरअसल समस्या ये है कि लोगों की आपेक्षाएं ज़रुरत से ज्यादा हैं. लोगों का मायूस होना समझ में आता है लेकिन उन्हें सब्र से काम लेना होगा. हमें आर्थिक तौर पर कर्जों से भरा खज़ाना मिला है. हमें दिक्कतें हो रही हैं लेकिन हम इन दिक्कतों का हल निकाल रहे हैं."

जनता की इस नकारात्मक समीक्षा के बावजूद कोलकाता से दो घंटे की दूरी पर दास पाड़ा थाने के बरियापुर गाँव में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के दफ्तर के बाहर कुछ नौजवान एक टेंट लगा रहे हैं.

ये पार्टी के सत्ता में दो साल पूरे होने के अवसर पर एक समारोह की तैयारी की एक झलक है.

मुश्किल आर्थिक परिस्थितियां

चिट फंड घोटाले में संदेह के घेरे में आने और पंचायती चुनाव को रोकने की अब तक नाकाम कोशिशों के बावजूद ममता बनर्जी की सरकार दो साल पूरे होने पर खुद को बधाई देने में जुटी है.

सरकार ने इस मौके पर दावा किया है कि 2012-13 में राज्य की अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.06 फ़ीसदी रही जबकि इसी अवधि में भारत की अर्थव्यवस्था की विकास दर 4.96 फीसदी थी.

विकास के इस दावे के बावजूद ये एक कड़वा सच है कि राज्य सरकार गर्दन तक कर्जों में डूबी है. इसे मुश्किल आर्थिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है.

हर साल राज्य सरकार के खजाने से रिज़र्व बैंक 26 हज़ार करोड़ रुपये निकाल लेता है जिससे राज्य के कर्जों की वसूली होती है.

इसके कारण सरकार के हाथ बंध गए हैं. ये सच है कि तृणमूल सरकार को ये कर्जे विरासत में मिले हैं लेकिन केंद्रीय सरकार द्वारा कर्जों की वसूली के कारण इसे आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.

सब से बड़ी उपलब्धि

Image caption ममता विरोध की राजनीति से आगे बढ़ी और दो साल के बाद उन्हें भी विरोध से दो-चार होना पड़ रहा है.

फ़िर्हाद हकीम कहते हैं, "हम ने सरकारी खजाने में पैसे बढ़ाने के लिए सीधे करों की वसूली का दायरा बढाया है जिसके फलस्वरूप अब हमें हर साल 11 हज़ार करोड़ रूपए अधिक मिल रहे हैं यानी अब 33 हज़ार करोड़ रुपये टैक्स से वसूल किये जा रहे हैं."

हकीम इसे अपनी सरकार की एक बड़ी उपलब्धि मानते हैं. लेकिन उनकी नज़र में इन दो सालों में तृणमूल सरकार की सब से बड़ी उपलब्धि है जंगल महल क्षेत्र में माओवादी हिंसा को ख़त्म करना

उन्होंने बताया, "देखिए जब हमारी सरकार आई तो जंगल महल इलाके में हर दिन एक दो हत्या के काण्ड होते थे. पिछली सरकार के मंत्री वहां नहीं जा सकते थे. लेकिन ममता बनर्जी वहां आठ बार जा चुकी है. और अब वहां हिंसा ख़त्म हो गयी है. सरकार ने दस हज़ार नक्सलवादियों को हिंसा के रस्ते से हटने पर पुलिस में नौकरियां दी है."

लेकिन तृणमूल कांग्रेस को इन दो सालों में कई झटके लग चुके हैं और सरकार की कुछ कारवाईयों से ममता बनर्जी की छवि पर असर पड़ा है.

पिछले साल कोलकता के जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफसर अम्बिकेश महापात्र को इस बात के लिये गिरफ्तार कर लिया गया कि उन्होंने ममता बनर्जी के कुछ व्यंगयात्मक कार्टून ईमेल से अपने दोस्तों को भेजे थे.

पंचायती चुनाव

अम्बिकेश महापात्र की गिरफ़्तारी पर बहुत हंगामा खड़ा हुआ. लोगों ने ममता बनर्जी के खिलाफ मानव अधिकार पर अंकुश लगाने का इलज़ाम लगाया और इस कांड के बाद से उनके आलोचक उन्हें तानाशाह कहने लगे.

खुद प्रोफ़ेसर महापात्र कहते हैं, "मैं इस सरकार से मायूस हुआ हूँ. उन्होंने मेरी गिरफ़्तारी पर होने वाले जन विरोध से कोई सबक नहीं सीखा. इस सरकार के ये दो साल पश्चिम बंगाल का अब तक का सबसे ख़राब शासन है."

अब जून में पंचायती चुनाव होने जा रहे हैं. क्या इस चुनाव में जनता की नाराजगी सामने उभरकर आएगी?

आउटलुक पत्रिका के वरिष्ट पत्रकार एसएनएम आबिदी कहते हैं, "इस चुनाव से जनता की नाराजगी का पता नहीं चलेगा. इस पंचायती चुनाव में ममता बनर्जी की भारी विजय होगी."

उन्होंने आगे कहा, "देखिए पहले तो ये समझना होगा कि उनकी आलोचना अधिकतर शहरों में हो रही है. देहातों में उनकी अच्छी पकड़ है. उनकी पार्टी के कार्यकर्ता काफ़ी सक्रिय हैं."

एसएनए आबिदी कहते हैं, "दरअसल ये चुनाव एक साइकिल का हिस्सा है. पहले साल 2009 के आम चुनाव में उन्होंने 19 सीटों के साथ भारी कामयाबी हासिल की. फिर दो साल पहले विधान सभा चुनाव में वामपंथी मोर्चे को पछाड़ा. अब बारी है पंचायती चुनाव में उनकी जीत की जहाँ अब भी वामपंथी मोर्चे का दबदबा है."

विशेषज्ञ कहते हैं कि वामपंथी मोर्चे के 34 वर्ष के शासन काल को ममता बनर्जी के दो साल से तुलना करना तृणमूल सरकार के खिलाफ अन्याय होगा. लेकिन जनता की अदालत में हकीकत पर नहीं बल्कि अनुभूति (परसेप्शन) पर फैसला होता है.

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