हाथ मिलाकर दुनिया जीत लेंगे भारत-चीन?

  • 20 मई 2013

चीन के प्रधानमंत्री ली कचियांग भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ सोमवार को हुई बातचीत में सीमा विवाद को सुलझाने सहमत हुए और कहा कि दोनों देशों के बीच कारोबारी और सांस्कृतिक संबंधों को जितना अधिक बढ़ावा दिया जाएगा, उससे संबंध और बेहतर होंगे.

दोनों ही नेताओं ने द्विपक्षीय बातचीत में व्यापारिक संबंधों को एक नई दिशा देने की बात पर ज़ोर दिया है.

लेकिन दोनों एशियाई ताकतों के बीच क्या कोई ऐसी संभावना बन सकती है कि वो आपसी सहयोग से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अपना साझा वर्चस्व क़ायम कर सकें?

भारत और चीन के बीच अगर व्यापार की बात करें, तो ये 2003-2004 के सात अरब डॉलर से बढ़कर 2012-2013 में 67.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया है.

जून 2012 में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को 2015 तक बढ़ाकर 100 अरब डॉलर करने का लक्ष्य निर्धारित किया था जो अब एक हक़ीक़त बनता नज़र आ रहा है.

मंदी के बावजूद विकास

पिछले दस सालों में अमरीका और पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक मंदी का शिकार रही हैं. उनकी अर्थव्यवस्थाओं में नकारात्मक विकास देखने को मिला है जबकि भारत और चीन जैसी एशियाई शक्तियों की अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक आर्थिक मंदी से प्रभावित होने के बावजूद बढ़ी हैं.

चीन की अर्थव्यवस्था जहां 10 फीसदी की दर से बढ़ी है वहीं भारत की अर्थव्यवस्था ने छह से सात फीसदी की दर से विकास किया है.

दोनों देशों की आर्थिक शक्ति के बारे में वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार एम के वेणु कहते हैं, “पिछले चार-पांच साल से पश्चिम के देश आर्थिक विकास के रास्ते पर पीछे जा रहे हैं जबकि भारत और चीन आगे बढ़े हैं. पश्चिम के देश भारत और चीन की तरफ़ देख रहे हैं. हालांकि पिछले दो-तीन साल में भारत और चीन में आर्थिक विकास कम हुआ है लेकिन इसके बावजूद ग्रोथ इन्हीं देशों में है.”

बड़ा बाज़ार

Image caption चीन ने पिछले दस सालों में 10 फीसदी की दर से आर्थिक विकास किया है.

भारत और चीन दोनों देशों के घरेलू बाज़ार का आकार काफ़ी बड़ा है. चीन में जहां 130 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं वहीं भारत में 120 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं. सबसे ज्यादा नौकरीवाले और पेशेवर लोग इन्हीं दो देशों में हैं.

चीन और भारत की तेज़ी से मज़बूत होती अर्थव्यवस्थाओं की वजह से अब आर्थिक विश्लेषक ये कहने लगे हैं कि वैश्विक आर्थिक गतिविधियों का केंद्र अटलांटिक से हटकर अब हिंद महासागर में आ गया है.

भारत और चीन दोनों ही देश कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्थाएं हैं. चीन में जहां क़रीब 30 करोड़ लोग कृषि कार्यों में लगे हैं वहीं भारत की 65 फीसदी आबादी सीधा खेती-बाड़ी के काम में लगी है.

आर्थिक विश्लेषक शंकर अय्यर कहते हैं, “अगर दोनों देश कृषि उत्पादों को लेकर साथ हो जाएं तो वैश्विक स्तर पर कृषि उत्पादों के कीमत निर्धारण में इनकी अहम भूमिका हो सकती है.”

स्केल में निवेश

चीन में बनने वाले सामान भारत के मुकाबले सस्ते होते हैं इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि वहां स्केल में निवेश किया गया है.

शंकर अय्यर बताते हैं, “भारत में अगर एक बड़े क्षेत्र में दस लाख टीवी सेट बनता हो तो वहीं चीन में एक प्लांट में दस लाख टीवी सेट बनते हैं. यही वजह है कि चीन अपने उत्पाद सस्ते दामों में बेच पाता है. ऐपल के जो उत्पाद हैं वो चीन में बनते हैं. चीन एक जगह पर दस लाख लोगों को नौकरी दे पाता है. अगले दस साल में दोनों देशों के बीच आदान-प्रदान का कोई फॉर्मूला बनता है तो उससे दोनों देशों को काफी फायदा हो सकता है.”

आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि दोनों देश साझा प्रयास से वैश्विक अर्थव्यवस्था को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं. चीन दुनिया में दूसरे नंबर की अर्थव्यवस्था है जिसका आकार क़रीब आठ अरब डॉलर का है. भारत की अर्थव्यवस्था तीन अरब डॉलर की है.

भारत के पास क्षमता है लेकिन उसका उपयोग नहीं हो सका है. अगर ये दोनों देश साथ मिल कर प्रयास करें तो वैश्विक स्तर पर काफी कुछ कर सकते हैं. लेकिन इसके लिए ज़रूरी है आर्थिक विकास को बढ़ावा देना जो संभव होगा ज्यादा से ज्यादा निवेश को आकर्षित करके. चीन ने इस दिशा में भारत के मुकाबले काफी तरक्की की है.

उदारीकरण

Image caption भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था में निवेश के दरवाज़े देर से खोले, खासतौर से नागर-विमानन में.

शंकर अय्यर कहते हैं, “एक होता है राजनैतिक उद्देश्य और उसे निभाना. भारत में इसका कोई खाका तैयार नहीं हो पाता और उस पर काम भी नहीं हो पाता. चीन ने देंग ज़ियाओ पिंग के समय में ही 1980 के दशक में निवेश के लिए देश के दरवाज़े खोल दिए थे. भारत में 1991 में उदारीकरण की शुरुआत हुई, आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई लेकिन आज भी कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां निवेश पर प्रतिबंध है या उसे आंशिक रूप से ही खोला गया है.”

इसे और स्पष्ट करते हुए शंकर अय्यर कहते हैं, भारत में नागर-विमानन क्षेत्र में निवेश अभी खुला है. जब ये सेक्टर चढ़ाव पर था, उस समय खोल देते तो आज जो समस्याग्रस्त एयरलाइंस दिख रहे हैं वो शायद नहीं दिखाई पड़ते. चीन ने अपनी मार्केट बंद रखी थी लेकिन निवेश खुला रखा था. जबकि भारत ने अपना बाज़ार खुला रखा है लेकिन निवेश को बंद रखा था. आर्थिक विकास के लिए दो तरह के मॉडल प्रचलित हैं निवेश आधारित या फिर उपभोग आधारित. चीन अब अपनी अर्थव्यवस्था को उपभोग आधारित बनाना चाह रहा है.

फैंटेसी

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और भारत का साझा आर्थिक ताकत बनना एक फैंटेसी की तरह है. एक संभावना जताई जाती है कि अगर चीन, भारत और पैसिफ़िक रिम के देश मिलकर अपनी कोई मुद्रा बना लें या एक मुद्रा से व्यापार करें तो वो विश्व अर्थव्यवस्था पर अपना वर्चस्व स्थापित कर सकते हैं.

इसे स्पष्ट करते हुए एम के वेणु कहते हैं, “1950-60 दशक में किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि यूरोपीय देशों की कोई साझा मुद्रा भी हो सकती है जबकि जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन युद्ध से उबरे थे. भयानक तबाही हुई थी. बीसवीं सदी के सबसे बड़े विनाश से उबर के बाद में उन्होंने एक-दूसरे से दोस्ती की और साझा मुद्रा भी बनाई. भारत और चीन के बीच तो ऐसा कोई झगड़ा भी नहीं है. 1962 में एक छोटी सी लड़ाई हुई थी. तो साझा एशियाई मुद्रा की संभावना को नकारा नहीं जा सकता. साझा बाज़ार की बातें भी हुई हैं. कई पश्चिमी विश्लेषक ये राय ज़ाहिर करते हैं कि एशिया में यूरोप जैसी साझा मुद्रा या साझा बाज़ार नहीं हो सकते क्योंकि एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में तनाव बहुत है. लेकिन तनाव कोई स्थायी चीज़ नहीं है. आज तनाव है हो सकता है कि पांच साल बाद तनाव न हो.”

बाधा

Image caption पिछले महीने चीन की सेना के लद्दाख़ क्षेत्र में घुसपैठ ने भारत के साथ उसके संबंधों में तनाव बढ़ा दिया था.

लेकिन दोनों देश साझा आर्थिक हितों के बारे में सोच नहीं पाते इसके रास्ते में बाधा क्या है?

शंकर अय्यर कहते हैं, “सबसे बड़ी बाधा भरोसे का अभाव होना है. 1962 की जो लड़ाई हुई वो भी एक ट्रस्ट डेफिसिट के माहौल में ही हुई. और अब भी हाल में लद्दाख में जो हुआ वो भरोसे की कमी के माहौल में हुआ. दोनों देश एक तरह से प्रतियोगी हैं तो एक तरह से उनके बीच तनाव भी रहता है. ऐसे माहौल को सुधारने के लिए काफी प्रबुद्ध नेताओं की ज़रूरत है. संबंध सुधारने के लिए बहुत ज़रूरी है कि उनके बीच सांस्कृतिक और कारोबारी आदान-प्रदान हो. यहां के छात्र वहां जाएं, वहां के छात्र यहां आएं. पंडित नेहरू के समय में ये काफ़ी होता था.”

चीन और भारत के बीच बड़े आर्थिक समझौतों की संभावना है. लेकिन इस संभावना में सबसे बड़ी अड़चन दोनों देशों की राजनीतिक व्यवस्था ही है.

एम के वेणु कहते हैं, “चीन की सत्ता से डील करने का मतलब है वहां की कम्युनिस्ट पार्टी से डील करना. वहां सब कुछ बेहद केंद्रीकृत है और कारोबार के स्तर पर उससे निर्वाह कर पाना मुश्किल हो जाता है. लेकिन अगर दोनों देशों की सरकारें सहमत हो जाएं कि अमुक क्षेत्र में हम मिलकर काम करेंगे तो काफी संभावना बनती है. चीन भारत को आने वाले 10-20 साल में बहुत बड़े बाज़ार के रूप में देखता है.”

व्यापार बनाम सीमा विवाद

Image caption सेनकाकू द्वीप समूह को लेकर चीन और जापान के बीच भारत और चीन के सीमा विवाद की तरह ही तनाव होते रहे हैं.

अब सवाल उठता है कि क्या व्यापार और वाणिज्य की स्थिति कभी ऐसी होगी कि विवाद के बाकी मुद्दे हाशिए पर चले जाएंगे.

आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि व्यापार और वाणिज्य अगर महत्वपूर्ण हो जाएंगे तो बाकी चीजें हाशिए पर भले न जाएं लेकिन काफी कुछ नियंत्रित हो जाएंगी. उदाहरणस्वरूप चीन और जापान के काफी लंबे अरसे से एक-दूसरे से तनावपूर्ण संबंध हैं, आज भी हैं. लेकिन जापान चीन का सबसे बड़ा कारोबारी पार्टनर है. हाल ही में चीन और जापान के बीच सीमा को लेकर बहुत बड़ा तनाव हुआ था जैसा कि चीन और भारत के बीच लद्दाख में घुसपैठ को लेकर हुआ था.

जापान का चीन के साथ उससे कई गुना ज़्यादा तनावपूर्ण संबंध रहा है सिनकाकू द्वीप समूह को लेकर. चीन में जापान के खिलाफ इस मुद्दे पर लंबे अरसे तक प्रदर्शन हुए हैं. चीन में जापानी सामान के बहिष्कार की बात भी हुई, लेकिन उसके बावजूद जापान का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर चीन है.

एम के वेणु कहते हैं, "एक समय के बाद दोनों ये महसूस कर लिया कि दोनों ही देशों के लोग एक-दूसरे के सामान के इतने आदी हो चुके हैं कि तनाव ज़रूरत से ज्यादा बढ़ने पर कारोबार पर उसका बुरा असर हो सकता है. भारत और चीन के बीच भी अब ऐसी ही स्थिति आ गई है. दोनों ही देशों के उपभोक्ता का अब एक-दूसरे के उत्पाद के बिना रह पाना मुश्किल है. लेकिन साथ में ये भी है कि सीमा विवाद रहेगा, तिब्बत को लेकर तनाव रहेगा. कल जब दोनों देशों का व्यापार सौ अरब डॉलर का हो जाएगा. चार पांच साल बाद 200 अरब डॉलर का हो जाएगा तो अच्छा है क्योंकि तनाव के बाकी मुद्दे नियंत्रण में रहेंगे."

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