बिहार: ज़मीन के लिए 66 साल से मुक़दमा जारी

  • 28 मई 2013
सत्यनारायण सिंह
Image caption पिछले 66 सालों से अदालत के चक्कर लगाता एक परिवार

एक पुरानी कहावत है कि दुनिया में सभी लड़ाइयां केवल तीन कारणों से होती हैं- ज़र( सोना), ज़मीन और ज़न(औरत).

तीन सौ से ज़्यादा मुद्दई, लगभग तीस हज़ार पन्नों पर आधारित अपनी-अपनी दावेदारी, एक दर्जन से ज़्यादा वकील और पिछले 66 सालों से अदालत के चक्कर.

ये कहानी है भोजपुर ज़िले के एकौना गांव के रहने वाले दो परिवारों की लड़ाई की और दोनों परिवार के बीच इस लड़ाई का कारण है नौ एकड़ का एक प्लॉट.

गंगा और सरयु नदी के बीच बसे ज़मीन के इस टुकड़े पर अपनी-अपनी दावेदारी करते हुए बिसेसवर सिंह और हरगोविंद राय का परिवार पहली बार अप्रैल 1947 में अदालत पहुंचा.

और अब 2013 में दोनों परिवारों की चौथी पीढ़ी अदालत में वो केस लड़ रही है.

दोनों परिवार का कहना है कि इस क़ानूनी लड़ाई के कारण वे अब तक लाखों रूपए ख़र्च कर चुके हैं. एक और अहम बात ये है कि इस दौरान गंगा ने कई बार अपना रास्ता बदला जिसके कारण विवादित ज़मीन भी डूब चुकी है.

'सम्मान की लड़ाई'

हरगोविंद राय के पड़पोते सत्यनारायण सिंह कहते हैं कि नदी में डूबी इस ज़मीन को अब कौन ख़रीदेगा. नदी से सटी हुई ज़मीन की क़ीमत ज़्यादा से ज़्यादा 15 हज़ार रुपए होगी.

सत्यनारायण सिंह के अनुसार उनका परिवार अब तक अदालती चक्कर में लगभग 20 लाख रुपए ख़र्च कर चुका है लेकिन फिर भी वो क़ानूनी लड़ाई लड़ते रहेंगे.

वे कहते हैं, ''अब ये लड़ाई ज़मीन की लड़ाई नहीं बल्कि सम्मान की लड़ाई बन गई है. मेरे बाद मेरे बेटे और पोते इस लड़ाई को जारी रखेंगे.''

उधर बिसेसवर सिंह के परिवार की चौथी पीढ़ी के एक सदस्य उमेश कुमार सिंह कहते हैं कि आरा कोर्ट ने दो बार उनके पक्ष में फ़ैसला सुनाया था लेकिन केस अभी तक ख़त्म नहीं हुआ है.

Image caption आरा के सिविल कोर्ट में चल रहा है मामला

उच्च न्यायालय में अपील की गई जिसने निचली अदालत के फ़ैसले को पलट दिया.

उमेश कहते हैं, ''ये हमारी जटिल और धीरे चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया का नतीजा है कि हमारा केस पिछले 66 वर्षों से अदालत में लटका हुआ है.''

उमेश कहते हैं कि वो अदालत के चक्कर काटते-काटते थक चुके हैं लेकिन फिर भी वो अपने हक़ की लड़ाई जारी रखेंगे.

'सामंती समाज'

चौंकाने वाली बात ये है कि दोनों परिवार और उनके वकील भी मानते हैं कि अदालत में इस विवाद का हल निकलना संभव नहीं है और अदालत के बाहर ही बातचीत से इसका कोई हल ढूंढ़ा जा सकता है.

लेकिन उमेश कुमार सिंह के वकील बिनोद सिंह कहते हैं कि दोनों पक्ष किसी समझौते पर पहुंचेंगे इसकी संभावना बहुत कम है.

भारत में हाईकोर्ट और निचली अदालतों में लगभग तीन करोड़ केस लंबित हैं और अदालतों में जजों की भारी कमी है.

अकेले बिहार राज्य की विभिन्न अदालतों में 16 लाख से भी ज़्यादा मामले लंबित हैं और उनमें से ज़्यादातर मामले ज़मीन विवाद से जुड़े हैं.

समाज विज्ञानी श्रीकांत कहते हैं, ''यहां का समाज सामंती है, जहां ज़मीन के मालिक अपनी ज़मीन को लेकर काफ़ी भावुक होते हैं और इसलिए इस तरह के विवाद बहुत सामान्य हैं.''

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