‘स्पीड ब्रेकरों की बदौलत हमारा धंधा चलता है’

रौशनी चमोली की वर्कशॉप में रोज़ की तरह आज भी एक ऐसी गाड़ी मरम्मत के लिए आई है जो स्पीड ब्रेकर से आहत हुई है.

स्पीड ब्रेकर से रगड़ खा कर इस गाड़ी के रेडियेटर में दिक्कत आई, जिसे ठीक होने में कम से कम दो दिन तो लगेंगे.

रौशनी पिछले 15 सालों से दिल्ली में अपना ऑटोमोबाइल सर्विस सेंटर चला रही हैं.

गाड़ी की मरम्मत की देख-रेख करते हुए वे कहती हैं, “देखा जाए तो स्पीड ब्रेकर मेरे बिज़नेस के लिए अच्छे हैं. हमारे पास हर दिन कम से कम 2-3 गाड़ियां ऐसी आती हैं जो स्पीड ब्रेकर की वजह से डैमेज हो जाती हैं. ज़्यादातर गाड़ियां महंगी वाली होती हैं, तो ज़ाहिर है कि उनके रिपेयर के लिए कंपनी मोटा पैसा मांगती है. हमारे यहां कंपनी से आधे कम रेट में मरम्मत हो जाती है.”

पढ़िए कैसा होना चाहिए एक आदर्श स्पीड ब्रेकर

वे बताती हैं कि आजकल लोग पैसे बचाने के लिए अपनी बड़ी गाड़ियों में सीएनजी सिलेंडर भी लगवा लेते हैं, जिसकी वजह से वो और नीचे बैठ जाती है.

उनके पास इसका इलाज भी है. उनके सर्विस सेंटर में गाड़ियों के शॉकर पैड की ऊंचाई बढ़ा कर गाड़ी की ग्राउंड क्लियरेंस कुछ हद तक बढ़ा दी जाती है.

आहत होती गाड़ियां

लेकिन भारत में कुछ स्पीड ब्रेकर इतने ऊँचे और संकरे हैं कि ऐसे समाधानों से भी बात नहीं बनती.

दिल्ली में रहने वाले ज्ञान प्रकाश होंडा सिविक गाड़ी के मालिक हैं और स्पीड ब्रेकर से होने वाले नुकसान से परेशान हैं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया, “यहां इतने तरह के स्पीड ब्रेकर हैं कि चाहे लाख बचाओ, लेकिन गाड़ी का निचला भाग उनसे रगड़ खा ही जाता है. एक बार स्पीड ब्रेकर की वजह से मेरी गाड़ी से तेल रिसने लगा जिससे कि गाड़ी बंद हो गई. सुरक्षा के लिहाज़ से स्पीड ब्रेकर का होना ठीक है, लेकिन यहां इतने ज़्यादा स्पीड ब्रेकर हैं कि गाड़ी को भारी नुकसान होता ही है.”

इसी तरह से लांसर, लीनिया, डिज़ायर, एस्टीम और वरना जैसी गाड़ियों के मालिकों ने भी बीबीसी से बातचीत में यही रोना रोया.

कैसे ज़िंदगी पर ब्रेक लगाया स्पीड ब्रेकर ने

सड़क के लिए गाड़ियां या गाड़ियों के लिए सड़क?

भारतीय सड़कों पर स्पीड ब्रेकर को लेकर निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया जाता.

यही कारण है कि जब दशकों पहले मारूति सुज़ुकी ने भारत में आगाज़ करने का फैसला किया, तो कंपनी ने उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिमी भारत की सड़कों का दौरा किया.

इस सफर के बाद कंपनी ने तय किया कि भारतीय सड़कों के लिए कार बनाने के लिए उन्हें नायाब तकनीक और डिज़ाइन ढूंढना होगा. और फिर कोशिश की गई एक ऐसी गाड़ी बनाने की जिसका सस्पेंशन और निचला भाग मज़बूत हो.

यही वजह है कि मारूति की गाड़ियों के ग्राउंड क्लियरेंस के भारतीय कार बाज़ार में उदाहरण दिए जाते हैं.

लेकिन उनकी मुसीबतें भी यहां खत्म नहीं हो जाती. दूसरी अंतरराष्ट्रीय आलीशान गाड़ियों की तरह ही उनके ग्राहक भी स्पीड ब्रेकर से होने वाले नुकसान की शिकायत करते हैं.

मारुति सुज़ुकी इंडिया प्राइवेट लिमिटिड के इंजीनियरिंग विभाग के निदेशक सीवी रमन ने बीबीसी को बताया, “अगर इंजीनियरिंग की दृष्टि से देखा जाए तो गाड़ी की ग्राउंड क्लीयरेंस जितनी कम हो, उतनी ही बेहतर सड़क पर उसकी परफोर्मेंस होती है. लेकिन भारत में ज़मीनी स्थिति को देखा जाए तो सड़कें इन गाड़ियों के लायक नहीं है, या ये कहें कि ये गाड़ियां इन सड़कों के लायक नहीं है. लेकिन फिर भी लंबी और बड़ी (सीडान) गाड़ियों की मांग बढ़ रही है.”

सीडान का नुकसान बना एसयूवी का फ़ायदा

Image caption गाड़ियों के निचला भाग स्पीड ब्रेकरों से अकसर रगड़ खा जाता है

भारत में आलीशान गाड़ियों की मांग बढ़ रही है, लेकिन यहां की सड़कें उन आलीशान गाड़ियों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही हैं.

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि स्पीड ब्रेकरों से होने वाले नुकसान से परेशान होकर लोग अब सीडान कारों की बजाय एसयूवी कारों का रुख करने लगे हैं.

शेवरले कार कंपनी के सर्विस सेंटरों में से एक के जनरल मैनेजर अमिताभ मुखर्जी ने बीबीसी को बताया, “कभी-कभी स्पीड ब्रेकरों की वजह से लंबी गाड़ियों में इतना भारी नुकसान होता है कि लाखों का खर्च भी आ जाता है. यहां कि सड़कों की हालत देख कर तो लगता है कि सीडान कारें यहां बननी ही नहीं चाहिए. यही कारण है कि दिल्ली से जुड़े गांवों में सड़कों की हालत देखते हुए लोग एसयूवी खरीदना पसंद करते हैं.”

लग़्ज़री कार जेगुआर को भी अपने ग्राहकों से कुछ ऐसी ही शिकायतें सुनने को मिलती हैं. कंपनी का कहना है कि ऐसे मामलों में वे असहाय महसूस करते हैं क्योंकि वे अपने प्रॉडक्ट की मूल तकनीक को भारतीय सड़कों के लिए नहीं बदल सकते.

क्या करें आलीशान कार कंपनियां?

ऑटो एक्सपर्ट हॉरमज़्द सोराबजी का मानना है कि भारत की सड़कों को यूरोपीय सड़कों जैसा बनाने में दशकों लग सकते हैं, लेकिन तब तक अंतरराष्ट्रीय कार कंपनियां खुद ही कुछ कदम उठा कर यहां के ग्राहकों को खुश रख सकते हैं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “अंतरराष्ट्रीय कार कंपनियों को भारतीय स्थिति के लायक बनने के लिए कुछ कदम उठाने होंगे. मसलन गाड़ियों के सस्पेन्शन की ऊंचाई थोड़ी बढ़ाई जाए जिससे कि गाड़ी का ग्राउंड क्लीयरेंस बढ़े. दूसरा समाधान ये है कि बड़े टायरों का इस्तेमाल करें. डिज़ाइन के साथ ज़्यादा छेड़-छाड़ करना भी मुनासिम नहीं है, लेकिन ये दो छोटी बातों पर अगर वे अमल करें तो बात कुछ बन सकती है.”

यानि भारत में जब तक ग़ैर-कानूनी स्पीड ब्रेकरों पर ग़ाज़ न गिरे, तब तक गाड़ियों पर ग़ाज़ गिरती रहेगी.

क्या आपके आसपास के इलाके में भी बनाए गए हैं कुछ ‘बेतुके’ कमर-तोड़ स्पीड ब्रेकर, जिनसे आपको परेशानी होती है? अगर हां तो हमें एक तस्वीर खींच कर भेजिए hindi.desk@bbc.co.uk या hindi.letters@bbc.co.uk पर. इसके अलावा आप हमारे फेसबुक पेज या ट्विटर पर भी तस्वीरें भेज सकते हैं. आपकी भेजी तस्वीरों में से कुछ को बीबीसी हिंदी की वेबसाइट पर लगाया जाएगा.

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