क्या 95 फ़ीसदी अंकों से फ़र्क पड़ता है?

  • 29 मई 2013
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Image caption सीबीएसई के ताज़ा इम्तिहानों में 37 फ़ीसदी से ज़्यादा बच्चों ने 90 फ़ीसदी से ज़्यादा नंबर हासिल किए हैं

12 वीं के सीबीएसई इम्तिहान के नतीजों ने कुछ ऐसे मानदंड खड़े किए जो पहले नहीं थे. खासी तादाद में बच्चों ने 90 फ़ीसदी से ज़्यादा अंक हासिल किए हैं. हो सकता है कि अगले साल आपकी मुलाकात किसी ऐसे बच्चे से हो जिसने हर विषय में 100 फ़ीसदी अंक पाए हों.

ज़ाहिर है कि नामी कॉलेजों की कट ऑफ़ लिस्ट भी ऊपर जाएगी. इसे देखते हुए ये सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या 90 से 95 फ़ीसदी अंक पाने वाले हर बच्चे को मनचाहे कोर्स या पाठ्यक्रम में दाख़िला मिल पाएगा.

क्या प्रतिभाशाली होने के लिए 90 फ़ीसदी तक नंबर हासिल करना ज़रूरी हो गया है? क्या इसका आगे करियर पर भी असर पड़ेगा?

इन्हीं सवालों के इर्दगिर्द बीबीसी ने टॉपर बच्चों, उनके माता-पिता, शिक्षा, करियर, विज्ञान और कला क्षेत्रों के क्षेत्रों से जुड़े लोगों से बात की.

माता-पिता की तमन्ना, बच्चों का आत्मविश्वास

Image caption बच्चों और माता-पिता दोनों पर ही इम्तिहानों का दबाव देखने को मिलता है

सबसे पहले हमने सीबीएसई की 12वीं परीक्षा में ऑल इंडिया टॉपर पारस शर्मा से बात की. पारस ने माना कि सबसे ज़्यादा नंबर हासिल करने की वजह से उन्हें काफ़ी संतुष्टि है. उन्हें उम्मीद है कि उन्हें मनचाहा करियर मिल जाएगा.

पारस ने बताया, ‘अंदर से एक सेल्फ़ कॉन्फिडेंस मिलता है कि हमने कुछ हासिल किया है. इससे आगे बढ़ने की प्रेरणा भी मिलती है’

पारस की मां माला शर्मा ने बताया कि सभी चाहते थे कि उनका बेटा इम्तिहान में सबसे ऊपर दिखाई दे. यहां तक कि पारस घर में आए मेहमानों तक से नहीं मिल पाता था.

ज़ाहिर है पारस के आत्मविश्वास के पीछे उनके परिवार की तमन्नाएं भी शामिल थीं. हमने छात्रों को कोचिंग देने वाले ट्यूटोरियल्स से दरयाफ़्त किया कि आख़िर उनके पास वो कौन सी रेसिपी है जो बच्चों से 95 से 99 फ़ीसदी नंबर स्कोर कराती है.

कोचिंग ज़रूरी या महज़ पैंतरेबाज़ी

Image caption 12वीं के इम्तिहान दे रहे ज़्यादातर बच्चे कोचिंग के बग़ैर अच्छे नंबरों की उम्मीद नहीं कर सकते

दिल्ली में ब्रिलियंट इंस्टीट्यूट की डायरेक्टर अर्चना बोस के मुताबिक वो टैक्स्ट बुक के अलावा कुछ ख़ास तरह से प्रश्नोत्तर बनाकर उनकी तैयारी कराते हैं.

अर्चना बोस ने बताया ’80-90 परसेंट जिन बच्चों को मिलता है वही बच्चे आगे जाते हैं. और ये बच्चे समाज के समृद्ध तबके के हैं. हमने देखा है कि जॉब उन्हीं को मिलता है’.

अर्चना बोस का कहना था कि कम पैसे कमाने वाले लोगों के बच्चों के लिए टेक्निकल सेक्टर में पढ़ाई या जॉब करने के सिवाय कोई चारा नहीं बचता. या फिर वो बच्चे रिसर्च के क्षेत्र में चले जाते हैं.

इस पर शिक्षाविद अनिल सदगोपाल का कहना था कि असल में कोचिंग इम्तिहान पास करने की ट्रिक्स और पैंतरेबाज़ी सिखा रहे हैं.

उनका कहना है कि ‘इन ऊंचे नंबरों का योग्यता से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि नंबर तो किसी भी तरह हासिल किए जा सकते हैं. ग़रीब तबके के बच्चे कोचिंग नहीं ले सकते तो वो पहले ही फ़िल्टर हो जाते हैं’

वसंत वैली स्कूल की सीनियर विंग की हेड टीचर रेखा कृष्णन भी ज़्यादा नंबरों की मारामारी को ठीक नहीं मानतीं.

उनके मुताबिक ‘सभी कॉलेज इन मार्क्स पर ग़ौर नहीं करते. न सभी इंजीनियरिंग कॉलेज या प्रोफ़ेशनल कॉलेजों के लिए इनका महत्व है. भारत से बाहर की यूनिवर्सिटीज़ और कॉलेजों में भी इन नंबरों को अब उतना महत्व नहीं दिया जाता’

‘कॉलेज हैं ज़िम्मेदार’

सवाल ये है कि फिर सीबीएसई के इम्तिहानों को लेकर इतनी मारामारी क्यों है? और ज़्यादा से ज़्यादा नंबर पाने की होड़ क्यों? इसका जवाब दिया स्प्रिंगडेल स्कूल की प्रिंसीपल और सीबीएसई से जुड़ीं डॉ अमिता मुल्ला वत्तल ने.

डॉक्टर अमिता के मुताबिक ‘इसका जवाब कॉलेजों से पूछिए. कॉलेज भी तो कट ऑफ बढ़ाते जाते हैं. उन्हें सोचना चाहिए कि हम क्या कर रहे हैं. उच्च शिक्षा संस्थानों को इस बारे में सोचना चाहिए. अगर वो बदलाव करेंगे तो इसमें बदलाव आएगा फिर चाहे 80 फ़ीसदी मिलें या 90 फ़ीसदी’

Image caption 70 फ़ीसदी अंक पाने वाले करियर में आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं

डॉक्टर अमिता का कहना था कि सीबीएसई ने आर्ट्स, ह्यूमेनिटीज़ और कॉमर्स के विषयों में प्रेक्टिकल शुरू किए हैं. इस वजह से बच्चों ने ज़्यादा नंबर स्कोर किए हैं.

‘70 फ़ीसदी वालों में होता है माद्दा’

तो क्या वाकई 95 और 98 फ़ीसदी की होड़ करियर में फ़ायदेमंद साबित होती है. हमने इस बारे में एचआर और प्लेसमेंट एजेंसियों के मैनेजरों से बात की.

ग्लोबल हंट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर सुनील गोयल ने इस होड़ को बेमानी करार दिया. सुनील के मुताबिक सिर्फ पहली बार नौकरी में इसे महत्व मिलता है लेकिन उसके साथ भी कई इफ़ एंड बट जुड़े हैं.

सुनील ने बताया कि ‘हर आदमी में एप्टीट्यूड, एटीट्यूड, उत्सुकता, रुचि और काम करने की जद्दोजहद अलग होती है. ज़रूरी नहीं कि 90 फ़ीसदी वालों में ही ये ज़्यादा हो. बल्कि देखा गया है कि 70-75 फ़ीसदी वालों में ये चीज़ें ज़्यादा होती हैं. उन्हें लगता है कि वो कहीं कुछ मिस कर गए हैं. उनमें ऊर्जा बची होती है कि कुछ करके दिखाना है.’

‘नंबरों की होड़ रचनात्मकता को मार देती है’

Image caption ज़्यादा नंबर पाने की होड़ में बच्चे की रचनात्मकता को नुकसान पहुंचता है.

वैज्ञानिक और शिक्षाविद प्रोफ़ेसर यशपाल ने भी इसकी पुष्टि की. उनका कहना था कि ज़्यादा नंबर पाने की जद्दोजहद और तनाव रचनात्मकता की हत्या कर देती है.

प्रोफ़ेसर यशपाल के मुताबिक मौजूदा शिक्षा पद्धति बच्चों को एक ही डिसिप्लिन में क़ैद करके रख देती है लेकिन जो लोग अलग-अलग क्षेत्रों में घूमकर, थोड़ा कम नंबर पाकर किसी मुकाम तक पहुंचते हैं, वो बेहतर साबित होते हैं.

प्रोफ़ेसर यशपाल ने कहा ‘अगर आप वास्तव में देखें तो जिन्होंने पिछले 50 साल में देश पर असर डाला होगा, वो आईआईटी में पहले दर्जे पर आए लोग नहीं होंगे या बहुत कम होंगे. ज़्यादातर उनमें औसत नंबर पाने वाले होंगे.’

शिक्षा से जुड़े तक़रीबन सभी लोगों का मानना था कि सीबीएसई के ताज़ा परिणामों ने बहस की गुंजाइश पैदा की है. इस बहस और मंथन से देश की शिक्षा व्यवस्था पर खड़े हो रहे सवालों का जवाब मिल सकता है. क्योंकि इनसे सीधे बच्चों का भविष्य जुड़ा है.

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