'सीबीएसई ने कहा, साइंस पढ़कर क्या करोगे'

  • 8 जून 2013
कार्तिक साहनी

दसवीं कक्षा के बाद जब कार्तिक साहनी ने ये तय किया कि वो आगे साइंस विषय पढ़ना चाहेंगे तो उनके सामने एक नहीं कई मुश्किलें थी.

कार्तिक को सीबीएसई को ये समझाने में ख़ासा वक़्त लगा कि उनके जैसा एक नेत्रहीन छात्र भी साइंस जैसे प्रैक्टिकल विषय की पढ़ाई कर सकता है.

हाल ही में आए बोर्ड परिणामों ने कार्तिक के दावे की पुष्टि भी कर दी. उन्होंने बारहवीं की परीक्षा 96 प्रतिशत अंकों के साथ पास की है.

हाल ही में बीबीसी संवाददाता दीप्ति कार्की ने उनसे मुलाक़ात कर उनके संघर्ष की कहानी जानने की कोशिश की.

दीप्ति कार्की ने कार्तिक से पूछा कि साइंस पढ़ना क्या उनकी ज़िद थी?

इस सवाल का जवाब देते हुए कार्तिक कहते हैं, ''मेरी रुचि हमेशा से ही साइंस में थी और ख़ासतौर पर कंप्यूटर साइंस में. इसलिए मैंने सोच लिया था कि अगर विरोध है तो भी मैं कोशिश करूंगा कि मैं सबको समझाऊं कि नेत्रहीन भी ऐसा कर सकते हैं.''

सीबीएसई का विरोध

Image caption हाल ही में सीबीएसई के नतीजे घोषित किए गए.

कार्तिक की साइंस पढ़ने की इच्छा का क्यों विरोध कर रही थी सीबीएसई?

इस सवाल के जवाब में कार्तिक कहते हैं, ''सीबीएसई की पहली आपत्ति ये थी कि मैं साइंस पढ़कर करूंगा क्या. एक नेत्रहीन छात्र का कंप्यूटर इंजीनियर बनने का सपना देखना ये बात वो हज़म ही नहीं कर पा रहे थे. सीबीएसई को मुझे ये समझाना पड़ा कि आज ऐसी तकनीक मौजूद है जिसकी मदद से नेत्रहीन भी साइंस पढ़ सकते हैं.''

कार्तिक कहते हैं कि ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि नेत्रहीन छात्र बाक़ी बच्चों के मुक़ाबले कम प्रतिभाशाली होते हैं.

वो कहते हैं, ''दुर्भाग्यवश ये धारणा बहुत सारे लोगों में अभी भी है. सीबीएसई की भी यही सोच थी. इसी वजह से वो मेरे साइंस पढ़ने का विरोध कर रहे थे. उनका कहना था कि साइंस में बहुत कुछ देखकर समझने लायक़ होता है, प्रैक्टिकल्स करने होते हैं और ये मैं नहीं कर पाउंगा.''

जानकारी का अभाव

इतना ही नहीं कार्तिक तो सीबीएसई और आईआईटी जैसे उच्च संस्थानों को चला रहे लोगों के जानकारी के स्तर पर भी सवाल उठा रहे हैं.

वो कहते हैं, ''सीबीएसई जैसे संस्थानों में भी कोई रिसर्च नहीं करता. सबसे मुश्किल बात तो ये है कि जब विकलांग बच्चों के लिए कोई नीति बनाई जाती हैं तो उस समय किसी ऐसे संगठन को शामिल नहीं किया जाता जो विकलांगों के लिए काम करता हो.''

अपनी बात को पूरा करते हुए वो कहते है, ''एक आईएएस अफ़सर ख़ुद ही विकलांगों को लेकर निर्णय ले लेता है. इसलिए कई बार ऐसे निर्णय ग़लत हो जाते हैं, अव्यवहारिक भी होते हैं. जानकारी का अभाव और असंवेदनशील रवैया दो ऐसी चीज़ें हैं जो भारत में बहुत ज़्यादा हैं.''

आईआईटी नहीं स्टैंफ़र्ड

Image caption आईआईटी भारत का जाना माना इंजीनियरिंग संस्थान है.

कार्तिक चाहते तो थे कि वो बारहवीं के बाद अपनी पढ़ाई भारत के सर्वोच्च इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी से करें.

लेकिन नेत्रहीन छात्रों को प्रवेश परीक्षा में मिलने वाली रियायतों में आए बदलावों के कारण कार्तिक ने ये तय किया कि वो अमरीका जाएंगें.

कार्तिक कहते हैं कि जब पहली बार उन्होंने आईआईटी से संपर्क साधा तो उन्हें बड़ी हैरानी हुई. कैसी हैरानी कार्तिक?

इस सवाल का जवाब देते हुए वो कहते हैं, ''जब मैंने पहली बार आईआईटी से ये जानना चाहा कि क्या मैं वहां से कंप्यूटर इंजीनियरिंग कर सकता हूं तो कंप्यूटर साइंस विभाग के हेड ने मुझसे ये पूछा कि नेत्रहीन होने की वजह से मैं काम कैसे करता हूं. अगर आईआईटी के कंप्यूटर साइंस के एचओडी को ये नहीं पता कि स्क्रीन रीडर या टेक्स्ट टू स्पीच टेक्नॉलॉजी क्या होती है तो यह चिंताजनक स्थिति है.''

ख़ैर अब तो कार्तिक स्टैंफ़र्ड जा रहे हैं लेकिन क्या वापस भारत लौटेंगे वो?

हमारे इस सवाल का जवाब देते हुए वो कहते है, ''जी ज़रूर मैं वापस आउंगा. मैं अक्षम छात्रों के लिए काम करना चाहुंगा ताकि उनके लिए शिक्षा का रास्ता आसान हो सके.''

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