'खूनी सड़क' और माओवादियों का ख़ौफ

कभी इस बाज़ार की रौनक़ देखते ही बनती थी. बस्तर के जंगलों के उत्पादों की ये सबसे बड़ी मंडी हुआ करती थी.

पुराने लोग बताते हैं कि बस्तर में सिर्फ यही एक बाज़ार था जो रात में भी खुला रहता था.

आज बीजापुर से 24 किलोमीटर की दूरी पर बसा ये गंगालूर का बाज़ार व्यवसाइयों और ग्राहकों की बाट जोत रहा है.

न दुकानें बची हैं, न रौनक़ और ना ही खरीददार. यहाँ सबकुछ ख़त्म हो चुका है.

आज इस बाज़ार पर प्रतिबंधों का साया है. नक्सलियों के फरमान के बाद बीजापुर से गंगालूर तक बसों का परिचालन पूरी तरह बंद पड़ा हुआ है.

सिर्फ गिने चुने पिक -अप वाहन और जीपों के अलावा दूसरी गाड़ियों के आवागमन पर भी प्रतिबंध लगा हुआ है.

प्रतिबंध के साये में

ये प्रतिबंध सिर्फ गाड़ियों तक सीमित नहीं है. आस पास से 21-परगना के गावों के लोगों पर भी इस बाज़ार में आने पर प्रतिबंध लगा हुआ है.

यहाँ लकीरें साफ़ खींचीं हुई नज़र आ सकती हैं. गंगालूर के बाज़ार के आगे की दुनिया जिनकी है वो नहीं चाहते कोई यहाँ चहलक़दमी करे.

बाज़ार के लोग गाँव नहीं जा सकते और गाँव के लोग बाज़ार नहीं आ सकते.

इस बाज़ार में अगर ग्राहक हैं तो वो थाने और पास के ही कैम्प में रहने वाले जवान और अधिकारी हैं.

गंगालूर के पूर्व मुखिया दशरथ बताते हैं कि कई बार स्थानीय लोगों ने माओवादियों से संपर्क कर प्रतिबंधों के साए से आजादी की मांग की.

मगर पिछले साल जब यहाँ के मांझी (कबीले के मुखिया) की हत्या माओवादियों ने कर दी तो पूरे इलाके में दहशत पसर गई.

आदिवासियों की संस्कृति

दशरथ कहते हैं, "अगर बाज़ार सोमवार की रात से लगता था तो मंगलवार की रात तक कारोबार चलता था. इस मंडी से थोक के भाव व्यापारी जंगलों की उपज खरीदा करते थे. दिन भर में दस से ज्यादा ट्रक इमली और महुआ के निकला करते थे."

गाँव के लोग बताते हैं इस बाज़ार में वो अपने खेतों की उपज लाकर बेचा करते थे.

बुजुर्गों का कहना है कि गंगालूर का बाज़ार इस इलाके के रहने वाले आदिवासियों की संस्कृति का भी केंद्र रहा है.

गंगालूर के रहने वाले हेमला सुक्नु ने बताया कि इस इलाके के आदिवासी कई दिनों तक पैदल चलकर गंगालूर आया करते थे.

यहीं उनके शादी ब्याह भी तय हुआ करते थे. बाज़ार के बहाने एक गाँव के आदिवासी दूर दूसरे गाँव के अपने रिश्तेदारों से मिल भी लिया करते थे.

'खूनी सड़क'

गंगालूर बाज़ार के दुर्गति पिछले कुछ कुछ सालों में हुई जब ये इलाका माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच चल रहे संघर्ष का केंद्र बन गया.

आये दिन इस इलाके में होने वाले झडपें आम बात हो गई.

माओवादियों ने पहला निशाना बीजापुर से गंगालूर को जोड़ने वाली सड़क को बनाया. इस सड़क को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया.

फिर वर्ष 2010 में इस 24 किलोमीटर लम्बी सड़क को बनाने की कवायद शुरू की गयी.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आज इस सड़क को 'खूनी सड़क' के नाम से इस लिए जाना जाता है क्योंकि इसके बनने के क्रम में सौ से ज्यादा लोगों की हत्या की जा चुकी है.

कर्मचारियों पर हमला

Image caption गंगालूर के पूर्व मुखिया दशरथ.

सड़क के बनने का माओवादी विरोध करते रहे.इस लिए उन्होंने सड़क के निर्माण में लगे उपक्रमों को कई बार नष्ट किया और काम कर रहे कर्मचारियों पर हमला किया.

काफी संघर्ष के बाद सड़क बन तो गई मगर माओवादियों ने जगह जगह पर इसे काट डाला.

ये उम्मीद थी कि सड़क के बन जाने के बाद कई सालों से ठप्प पड़ा गंगालूर का बाज़ार एक बार फिर जिंदा हो जाएगा और इसकी रौनक़ वापस लौट आएगी.

मगर इस इलाके पर प्रतिबंधों के साए ने बाज़ार को पूरी तरह से खत्म कर दिया है.

अब इसके दोबारा अपने शबाब पर आने की बात यहाँ के लोगों के लिए एक सपने जैसी ही है.

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