'आत्मसमर्पण करने वालों को छोड़ दिया'

अजय सिंह
Image caption सलवा जुडूम के नेता अजय सिंह भी नक्सलियों के निशाने पर रहे हैं

हमारा क़ाफ़िला दर्भा घाटी में ठीक साढ़े तीन बजे पहुंचा. कुछ फूटने की आवाज़ आई तो महेंद्र कर्मा जी ने कहा लगता है कि केशलूर के उत्साहित कांग्रेसी कार्यकर्ता स्वागत में पटाख़े फोड़ रहे हैं.

उसी बीच हमारी गाड़ी ने जैसे ही पहला मोड़ पार किया तो गाड़ी पर तीन से चार गोलियां आकर लगीं. मैंने उनसे कहा, "भैय्या ये पटाख़े नहीं, गोलियां चल रहीं हैं."

हमारे पास ये गुंजाइश नहीं थी कि हम गाड़ी को वापस मोड़ लें और पीछे की तरफ़ भागें क्योंकि क़ाफ़िले में एक के पीछे एक, कई गाड़ियां थीं. हमने पीछे मुड़ने के बजाए आगे बढ़कर निकल जाने का फ़ैसला लिया.

मगर नक्सलियों ने पूरे इलाक़े को इस तरह ज़बरदस्त तरीक़े से अपने नियंत्रण में कर रखा था कि हमारे क़ाफ़िले की सभी गाड़ियाँ एक-दूसरे से टकरा-टकरा कर एक जगह खड़ी हो गईं.

उसके बाद नक्सलियों ने गाड़ियों पर सौ से ज़्यादा राउंड गोलियां चलायीं. जिसको जैसे बचने का मौक़ा मिला, उसने वैसी कोशिश की. लोग अपनी-अपनी गाड़ियों से कूदकर सड़क पर लेट गए. कुछ चट्टानों के पीछे छुप गए. उनमें से मैं भी एक था.

मैं गाड़ी से कूद गया. सड़क से मुश्किल से ढाई से तीन मीटर की दूरी पर एक चट्टान थी. मैं, सत्तार अली और रायपुर के एक बुज़ुर्ग नेता - हम तीनों उस चट्टान के पीछे जा छुपे.

सरेंडर करो-सरेंडर करो

इस बीच नक्सली लगातार गोलियां चलाते रहे. लगभग पांच से छह बजे के बीच जहाँ पर हम छुपे थे वहां नक्सली लगातार हथगोले फ़ेंक रहे थे. एक हथगोला हमारे चट्टान के ऊपर फटा. दूसरा हमारे ऊपर आकर गिरा. मगर, वो फटा नहीं. मैंने उस हथगोले को जल्दी से उठाकर दूर फ़ेंक दिया. वो फिर भी नहीं फटा.

उसके बाद नक्सलियों ने आवाज़ देना शुरू किया कि आपलोग चारों तरफ़ से घिरे हुए हैं और बचने का कोई रास्ता नहीं है. वो कह रहे थे "सरेंडर करो, सरेंडर करो".

Image caption 25 मई को नक्सलियों ने कांग्रेस के काफ़िले पर हमला बोल दिया था

पहले ये आवाज़ें दूर से आ रहीं थीं. मगर बाद में लगा कि वो पास आ गए हैं. महेंद्र कर्मा जी के निजी सुरक्षा अधिकारी सियाराम ने अकेले नक्सलियों से लोहा लिया और 3.30 बजे से लेकर छह बजे तक उन्होंने गोलियां चलाते हुए नक्सलियों को सड़क तक आने से रोके रखा.

जब सियाराम घायल हो गए उसके आधे घंटे के बाद नक्सलियों ने एक बार फिर उस जगह, जहाँ हम छुपे हुए थे, अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दीं. चार विशेष पुलिस अधिकारी उनकी गोलियों के शिकार हुए और वहीं मारे गए.

तब मैंने सत्तार अली को कहा कि अब हमारे बचने की कोई उम्मीद नहीं है और हमें आत्मसमर्पण कर देना चाहिए. लेकिन आत्मसमर्पण करने के लिए हम हिम्मत नहीं जुटा पाए क्योंकि मैं, सत्तार और विक्रम मडावी सलवा जुडूम के नेता रहे हैं. हम पहले से ही नक्सलियों के निशाने पर थे.

हमने सोचा कि अब जब मरना तय है तो फिर समर्पण क्यों करें. यहीं आकर मारने दो नक्सलियों को.

इस बीच मैंने यह भी सोचा कि चट्टान से निकलकर खाई के रास्ते भाग निकला जाए. मैंने कोशिश भी की. मगर तभी मेरी नज़र सड़क पर खड़े तीन हथियारों से लैस नक्सलियों पर पड़ी. उन्होंने कहा अब भागने का कोई मौक़ा नहीं है. वो आधी हिंदी आधी तेलगु में बोल रहे थे कि हम आत्मसमर्पण कर दें.

मैंने उनकी बात नहीं मानी और फिर से उसी चट्टान के पीछे आ छिपा.

कुछ ही देर में मैंने देखा कि महेंद्र कर्मा खड़े हुए और बोले "यार मत मारो. मत मारो. मैं महेंद्र कर्मा हूँ. तुमको महेंद्र कर्मा की तलाश है तो मैं महेंद्र कर्मा हूँ."

उसके बाद नक्सलियों ने गोलीबारी पूरी तरह बंद कर दी. मगर पांच से दस मिनट के बाद फिर गोली चलने की आवाज़ आई. तब हमने आपस में कहा कि शायद उन्होंने महेंद्र कर्मा जी को मार दिया है.

फिर नक्सली जवानों के हथियार लूटने आए. जब वे हथियार लूटकर वापस जा रहे थे तो उनकी नज़र हम पर पड़ी और उन्होंने बंदूकें तानकर पूछा, "तुम लोग पुलिस वाले हो क्या ?"

Image caption आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा को नक्सलियों ने हाल ही में मार दिया

हमलोगों नें हाथ ऊपर उठा दिए और कहा कि हम पुलिस वाले नहीं हैं. तब उन्होंने कहा, "ठीक है वहीं पर लेटे रहो".

जब उन लोगों ने जवानों के सारे हथियार लूट लिए तो उन्होंने हमसे कहा, "चलो तुम लोग भी चलो. सरेंडर करो". हमने आत्मसमर्पण किया. जब वे हमें लेकर गए तो मैंने देखा कि मेरे कुछ चालीस से पचास साथी रोड से महज़ पचास मीटर की दूरी पर एक पहाड़ी के पास उलटे लेटे हुए थे. हमें भी वहां ले जाकर उलटा लिटा दिया गया.

उसी बीच एक नक्सली नेता ने आकर पूछा, "इसमें नंदकुमार पटेल कौन है ? महेंद्र कर्मा का लड़का कौन है?" हमने कहा कि इस समूह में वे दोनों नहीं हैं.

'वॉकी-टॉकी' लिए हुए एक नक्सली ने किसी विनोद नाम के अपने नेता से बात की और कहा कि पटेल और कर्मा के पुत्र वहां नहीं हैं.

फिर वो कहने लगे देखो तुम्हारा नेता महेंद्र कर्मा अब मारा गया है.

फिर हमने देखा कि कर्मा जी के शव के पास इकठ्ठा होकर पहले उन्होंने नारा लगाया और फिर नाचना गाना शुरू कर दिया.

दस से पंद्रह मिनट के बाद उनकी आवाज़ें बंद हो गईं. ज़मीन पर लेटे हुए हम सभी लोगों ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया और देखा कि वहां नक्सली मौजूद नहीं हैं. मगर हममें से किसी की हिम्मत नहीं थी कि हम उठकर सड़क की तरफ़ आ पाते.

फिर कुछ देर में वहां आईबीसी-24 के संवाददाता नरेश मिश्र पहुंचे. तब हमारी हिम्मत बंधी और हम फिर उठकर पैदल चलते हुए दर्भा थाना पहुंचे.

मगर एक बात है नक्सलियों ने आत्मसमर्पण करने वाले किसी भी इंसान को गोली नहीं मारी. चाहे वो नेता हों या फिर सुरक्षा बल के जवान. जो जवान मारे गए वो संघर्ष के दौरान मारे गए. जिन्होंने ख़ुद समर्पण किया उन्हें नक्सलियों ने छोड़ दिया.

(बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बातचीत पर आधारित)

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