क्या रुकेगा भाजपा का आंतरिक द्वंद?

  • 9 जून 2013
नरेन्द्र मोदी और एलके आडवाणी
Image caption मोदी और आडवाणी के खेमे आमने सामने दिखाई दे रहे हैं

आगामी लोकसभा चुनावों के बाद सरकार बनाने के योजना बना रही भारतीय जनता पार्टी में सत्ता के अनेक केन्द्र उभरे हैं जो इस मुख्य विपक्षी दल के लिए अच्छी बात नहीं है.

आज की तारीख़ में नरेन्द्र मोदी भाजपा के नंबर एक नेता हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है. लेकिन उन्हें कोई बड़ी भूमिका देने के मुद्दे पर पार्टी की अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ गई है.

पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी गोवा नहीं पहुंचे. बताया जा रहा है कि वो अस्वस्थ हैं. इसके अलावा पार्टी के कई दूसरे नेताओं ने भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी से किनारा कर लिया है.

लेकिन शायद ही कोई ऐसा हो जो ये मानने के लिए तैयार हो कि आडवाणी की ग़ैरमौजूदगी की वजह सिर्फ़ उनका अस्वस्थ होना है. 1980 में भाजपा के गठन के बाद ये पहला मौक़ा है जब आडवाणी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं हो रहे हैं.

बड़ी भूमिका

पार्टी में चल रहा द्वंद रुकने वाला नहीं है. आरएसएस के हस्तक्षेप के बाद भी इस स्थिति में कोई बदलाव आने वाला नहीं है.

Image caption राजनाथ सिंह मोदी को प्रचार समिति का प्रमुख बनाए जाने के पक्ष में हैं

राज्य स्तर पर अपने विरोधी की आवाज को दबाना आसान होता है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर लाल कृष्ण आडवाणी जैसे नेता की अनदेखी करना कतई आसान नहीं हैं.

आडवाणी की तुलना संजय जोशी या केशुभाई पटेल से नहीं की जा सकती. वो सिर्फ भाजपा के नेता नहीं हैं बल्कि आज पार्टी का जो रूप है, उसे बनाने में आडवाणी की अहम भूमिका है और मोदी से बेहतर इस बात को और नहीं जानता.

ऐसी स्थिति में मुझे नहीं लगता है कि मोदी के लिए भी ये अच्छा होगा कि आडवाणी उनके विरोध में दिखाई दें.

सत्ता के कई केन्द्र

भाजपा में ये अजीब स्थिति है कि उसमें सत्ता के कई केन्द्र बनकर उभरे हैं. ऐसी स्थिति में पार्टी को अच्छे ढंग से चुनावों में ले जाना एक अजीब स्थिति होगी. भारतीय राजनीति में आज तक तो ऐसा नहीं देखा गया.

मोदी के समर्थक चाहते हैं कि उन्हें भाजपा की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाए. लेकिन पार्टी का एक बड़ा गुट नहीं चाहता कि मोदी को ये ज़िम्मेदारी दी जाए.

मोदी समर्थकों का मानना है कि मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करने से पार्टी को चुनाव में काफ़ी फ़ायदा होगा और पार्टी सत्ता के क़रीब पहुंच सकती है लेकिन आडवाणी और दिल्ली के कुछ दूसरे नेताओं की राय है कि मोदी का व्यक्तित्व ऐसा है कि उनके प्रति लोगों की राय पूरी तरह से बंटी हुई है.

अगर एक तरफ़ मोदी के प्रशंसक हैं तो दूसरी तरफ़ मतदाताओं का एक ऐसा गुट भी है जो मोदी को किसी भी हालत में पसंद नहीं करेगा.

(बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त से बातचीत पर आधारित. ये लेखक के निजी विचार हैं)

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