'इंदिरा की तर्ज पर मोदी का उदय'

Image caption पत्रकार राशिद किदवई मानते हैं कि भाजपा के अंदर नरेन्द्र मोदी का बढ़ता प्रभाव बहुत कुछ इंदिरा गांधी जैसा है.

क्या पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी में कोई तुलना हो सकती है?

शायद नहीं. लेकिन पत्रकार लेखक राशिद किदवई की मानें तो हां.

किदवई '24 अकबर रोड' किताब के लेखक हैं. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की जीवनी भी लिखी है.

'24 अकबर रोड' किताब में उन्होंने कांग्रेस का इतिहास बताया है. '24 अकबर रोड' कांग्रेस पार्टी का मुख्यालय भी है.

किताब में आजादी के बाद खासकर इंदिरा गांधी के बाद की प्रमुख राजनीतिक घटनाओं, फैसलों की चर्चा की गई है.

मोदी के भाजपा प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि 'मोदी के उदय' में उन्हें इंदिरा गांधी की छाप दिखाई पड़ती है.

उन्होंने कहा, “जिस रूप में नरेंद्र मोदी का उदय हुआ है उसमें इंदिरा गांधी वाले दौर की छाप है. 1960 के दशक में जैसे नेहरू-शास्त्री के कार्यकाल के बाद इंदिरा गांधी का उदय हुआ था. उसी तरह मोदी का भी हुआ है.

किदवई के अनुसार, "उस समय कांग्रेस में कई बड़े कद्दावर नेता थे. शह और मात का लंबा खेल चला और उसके बाद इंदिरा गांधी 'कल्ट पर्सनालिटी' के रूप में उभरीं. उसके बाद की राजनीति इंदिरा और इंदिरा के विरोधियों के बीच विभाजित रही. और करीब दो-तीन दशक तक ऐसा ही रहा."

इंदिरा जैसा आभामंडल

इंदिरा गांधी को उस दौर में 'गूंगी गुड़िया' कहा जाता था लेकिन धीरे-धीरे इंदिरा गांधी ने कांग्रेस में अपनी जगह मजबूत की.

मोरारजी देसाई और के कामराज जैसे दिग्गज नेताओं को पीछे करते हुए इंदिरा पार्टी की प्रमुख बनीं. हालांकि उसी दौर में इंदिरा के नाम पर कांग्रेस का बंटवारा भी हुआ था.

Image caption गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मोदी को 2014 के लिए भाजपा प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया.

इदिरा गांधी ने 1969 में कांग्रेस (आई) का गठन किया था.

किदवई कहते हैं कि मोदी, इंदिरा गांधी जैसा आभामंडल बना पाएंगे या नहीं, उन्हें लेकर लोग लामबंद होंगे या नहीं- ये चुनाव के बाद पता चलेगा.

चुनाव के बाद तीन तरह की संभावनाओं की ओर किदवई ने इशारा किया है.

नई पार्टी बनाने के बाद 1971 में जब इंदिरा गांधी चुनाव में गईं तो उन्होंने 'गरीबी हटाओ' का नारा दिया और 352 सीटें लेकर संसद में आईं थीं.

क्या मोदी भी इंदिरा गाँधी जैसा करिश्मा दोहरा पाएंगे ?

किदवई कहते हैं, “नरेंद्र मोदी या कहें कि भाजपा की कोशिश होगी कि वो 200 या उससे ऊपर की सीटें लाएं क्योंकि 275 का जो जादुई आंकड़ा है उसकी राह बहुत आसान हो जाएगी. शिवसेना, अकाली दल तो साथ हैं ही और भी कई दल हैं जो गैर कांग्रेसवाद के नाम पर साथ आ जाएंगे. ”

दूसरी स्थिति ये है, “अगर भाजपा की150-200 के बीच सीटें आती हैं तो भाजपा के नेतृत्व में सरकार बने, जैसा कि अभी कांग्रेस कर रही है. उस स्थिति में ये सवाल उठेगा कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा. भाजपा में कई ऐसे नेता हैं जो सोचते हैं कि उनका नंबर आ सकता है.”

मीडिया में प्रसारित खबरों में कहा गया कि लालकृष्ण आडवाणी समेत कई वरिष्ठ नेता भाजपा में मोदी के बढ़ते कद से नाराज हैं. आडवाणी तो राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी शामिल होने गोवा भी नहीं गए.

कट्टर छवि का नुकसान

Image caption मीडिया में प्रसारित खबरों में कहा गया कि मोदी के विरोध में आडवाणी गोवा कार्यकारिणी में शामिल नहीं हुए

तो क्या मोदी को उनकी कट्टर छवि का नुकसान होगा?

मोदी की तलना में कांग्रेस की क्या स्थिति बनती है इन सवालों के जवाब में किदवई कहते हैं, “ये बहुत रोचक समय होगा क्योंकि कांग्रेस में सोनिया-राहुल प्रधानमंत्री बनने के बहुत इच्छुक नहीं हैं.

वो कहते हैं, " एक गुंजाइश ये भी है कि जो क्षेत्रीय दल से ताल्लुक रखता हो और जिसकी सीटें अच्छीं हो उसे भी प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है.”

किदवई के मुताबिक, “कांग्रेस की पहली कोशिश होगी कि वो 150 या उससे भी ज्यादा सीटें लेकर आए तो कांग्रेस के नेतृत्व में ही यूपीए—3 का स्वरूप बने. अगर उसमें कामयाब नहीं हुए तो कांग्रेस की कोशिश होगी कि धर्मनिरपेक्षता के आधार पर कोई गठबंधन बने. जैसा कि 1996 में हुआ था. तब यूनाइटेड फ्रंट की सरकार बनी थी. कांग्रेस चाहेगी कि उसी तरह से कोई सरकार बने और वो सरकार में शामिल होकर काम चलाए.”

लोकसभा चुनाव फिलहाल थोड़ी दूर है लेकिन राजनीतिक दलों ने कमर कसनी शुरु कर दी है.

हालांकिकिसी दल को पूर्ण बहुमत मिलेगा इस संभावना से किदवई इंकार करते हैं लेकिन वो ये भी मानते हैं कि अगर मुकाबला मोदी बनाम राहुल या नीतीश कुमार का हुआ तो मोदी काफी आगे रहेंगे जैसा कि कई सर्वे भी साबित कर चुके हैं.

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