माओवादियों को बीबीसी हिंदी के लेख पर आपत्ति

माओवादी हथियारबंद दस्ते

छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में काँग्रेस के काफ़िले पर हुए हमले के बाद बीबीसी हिंदी डॉट कॉम में छपे एक लेख पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( माओवादी) ने प्रतिक्रिया ज़ाहिर की है और इसे "माओवादी संघर्ष को नीचा दिखाने" की कोशिश बताया है.

' मिलट्री मास्टर के हाथ नक्सलियों की कमान' शीर्षक से 27 मई को छपे इस लेख में पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी ने लिखा था कि दण्डकारण्य इलाक़े में माओवादी पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन की ख़बरें अगर सही हैं तो इन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा था कि कोसा की जगह रामन्ना को पार्टी की दण्डकारण्य इकाई का प्रमुख बनाया गया है और वो अब तक के लगभग हर बड़े हमले में शामिल रहे हैं.

माओवादी पार्टी ने 5 जून को जारी किए गए एक बयान में कहा है, "ये सब कोरी बकवास के अलावा कुछ नहीं."

शुभ्रांशु ने रामन्ना से अपनी बातचीत के आधार पर लिखा था कि "रामन्ना कोसा जैसे नेताओं को पसंद नहीं करते हैं. जब भी मैं रामन्ना से कोसा, उनके सचिव की बात करता, वे कहते अरे उस हेडमास्टर से क्या होगा?"

माओवादियों ने इसे आपत्तिजनक बताते हुए कहा है कि "हमारी कमेटी शुभ्रांशु की इन भद्दी टिप्पणियों की कड़ी निंदा करती है."

बस्तर में 25 मई को माओवादियों ने काँग्रेस के एक काफ़िले पर हमला कर दिया था जिसमें माओवादी-विरोधी सलवा जुडूम के जनक महेंद्र कर्मा, राज्य काँग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और बाद में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल की मृत्यु हो गई.

'धमकी नहीं दी'

मीडिया में कुछ जगहों पर ख़बर प्रकाशित हुई है कि माओवादियों ने 'बीबीसी के संवाददाता' को धमकी दी है. लेकिन स्वतंत्र पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी ने बीबीसी को बताया कि ये ग़लत है.

उन्होंने कहा, "माओवादियों ने मुझे कोई धमकी नहीं दी है. ऐसा लगता है कि अख़बार ने माओवादियों के प्रेस बयान को ही धमकी मान लिया."

Image caption महेंद्र कर्मा पिछले दो दशकों से माओवादियों की हिटलिस्ट में थे.

शुभ्रांशु का कहना है कि हमें अभी आधिकारिक तौर पर ये भी नहीं मालूम कि रामन्ना दण्डकारण्य में माओवादी पार्टी के सचिव बने भी हैं या नहीं. उन्होंने कहा कि लेख में मैंने लिखा था कि खुफ़िया सूत्रों से अख़बारों में छपी नेतृत्व परिवर्तन की ख़बरें अगर सही हैं तो इन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, "माओवादी तथ्यों को चैलेंज नहीं कर रहे हैं बल्कि विश्लेषण का खंडन कर रहे है पर मैं अपने विश्लेषण पर कायम हूँ."

मनोवैज्ञानिक युद्ध?

शुभ्रांशु चौधरी ने माओवादी आंदोलन पर हाल ही में अपनी एक किताब 'उसका नाम वासु नहीं' प्रकाशित की है, जिसमें उन्होंने माओवादी आंदोलन के कई पहलुओं पर प्रकाश डाला है.

माओवादियों ने इस किताब में कही गई बातों की भी आलोचना की है और कहा है कि शुभ्रांशु ने माओवादी आंदोलन को समझने की कोशिश नहीं की है.

माओवादियों को बीबीसी रेडियो पर 1 जून को प्रसारित किए गए एक कार्यक्रम पर भी आपत्ति है जिसमें शुभ्रांशु चौधरी ने हिस्सा लिया था और कहा था कि माओवादियों का राजनीतिक लक्ष्य और उनके नेतृत्व में लड़ रहे आदिवासियों के मुद्दे अलग-अलग हैं.

पार्टी का कहना है, "शोषणकारी राजसत्ता हमारी पार्टी के नेतृत्व में जारी क्रांतिकारी आंदोलन का सफाया करने के लिए आज एक भारी दमनात्मक युद्ध चला रही है जिसका एक महत्वपूर्ण अंग है मनोवैज्ञानिक युद्ध... जाने या अनजाने में शुभ्रांशु चौधरी भी इसका हिस्सा बन गए हैं."

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