मोदी के 'कांग्रेस मुक्त भारत' का मतलब क्या है?

भाजपा के चुनाव अभियान का जिम्मा सँभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से 'कांग्रेस मुक्त भारत निर्माण' के लिए जुट जाने का आह्वान किया.

उन्होंने ट्विटर पर भी लिखा, "हम कांग्रेस मुक्त भारत निर्माण बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे."

नरेन्द्र मोदी की बातों में आवेश होता है, और ठहराव की कमी. चूंकि उन्होंने इस बात को कई बार कहा है. इसलिए यह समझने की ज़रूरत है कि वे कहना क्या चाहते है.

उन्होंने ‘कांग्रेस मुक्ति’ की अपनी अवधारणा स्पष्ट नहीं की. वे यदि कांग्रेस की चौधराहट को खत्म करना चाहते हैं तो यह उनका मौलिक विचार नहीं है.

साठ के दशक के शुरुआती दिनों में राम मनोहर लोहिया 'गैर-कांग्रेसवाद' का नारा दे चुके हैं.

इस गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति में तत्कालीन जनसंघ भी शामिल था और 1967 में पहली बार बनी कई संविद सरकारों में उसकी हिस्सेदारी थी.

'गैर-कांग्रेसवाद' राजनीतिक अवधारणा थी. इसमें कांग्रेस का विकल्प देने की बात थी, उसके सफाए की परिकल्पना नहीं थी.

बेशक कांग्रेस की राजनीति ने तमाम दोषों को जन्म दिया, पर उससे उसकी विरासत नहीं छीनी जा सकती.

कांग्रेस से मुक्ति माने कांग्रेस की विरासत से मुक्ति. आइए यह जानने की कोशिश करें कि कांग्रेस को समाप्त करने के मायने क्या हैं. कांग्रेस से मुक्ति के मायने इन बातों से मुक्तिः-

राष्ट्रीय आंदोलन

चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक महान, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य और अकबर से लेकर अंग्रेजी राज तक भारत का राजनीतिक नक्शा बनता-बिगड़ता रहा.

लेकिन उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से शुरू हुए राष्ट्रीय आंदोलन में कांग्रेस की केन्द्रीय भूमिका थी.

कांग्रेस के पास महात्मा गांधी की विरासत है. मोदी जी जिन सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रशंसक हैं उनकी विरासत भी कांग्रेस के पास है.

अटल बिहारी वाजपेयी जिस गांधीवादी समाजवाद की कल्पना करते थे, वह कांग्रेस की विरासत है.

राष्ट्रीय आंदोलन के कारण कांग्रेस का कोई न कोई तत्व देश के हर गाँव, मुहल्ले, गली और घर में मिलेगा.

और इसी वजह से एक अरसे तक भारत की राजव्यवस्था को राजनीति शास्त्री एकदलीय व्यवस्था के रूप में पढ़ते-पढ़ाते रहे.

इसके विपरीत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अंग्रेजी राज के खिलाफ आंदोलन से नहीं निकला.

शुरुआती वर्षों में संघ के अनेक कार्यकर्ता कांग्रेस से भी जुड़े थे, पर सैद्धांतिक रूप से संघ ने अंग्रेजों से सीधा टकराव मोल नहीं लिया.

राष्ट्रीय एकीकरण

Image caption 1905 में भारत का नक्शा.

आज़ादी के बाद राष्ट्र निर्माण पहला सबसे बड़ा काम था. 15 अगस्त 1947 को समूचा भारत एक नहीं था.

हमें एक ओर विभाजन मिला था दूसरी ओर तकरीबन 600 देशी रियासतों को भारत में मिलाकर एक सूत्र में बांधने का काम बचा था.

यह काम कांग्रेसी राज में हुआ. उसके बाद 1956-57 में राज्य पुनर्गठन का जटिल काम हुआ.

पूर्वोत्तर के राज्यों, तमिलनाडु और पंजाब में अलगाववादी आंदोलन हुए. भारत को एक बनाए रखने के महत्वपूर्ण काम को क्या झुठलाया जा सकता है?

अस्सी और नब्बे के दशक में हमारे सामाजिक अंतर्विरोधों के कारण पूरे देश में आग जैसी लगने लगी थी.

ऐसे दौर में राष्ट्रीय एकीकरण का श्रेय कांग्रेस को भी जाता है.

कांग्रेस ने सभी सम्प्रदायों, जातियों और हर इलाके के लोगों को अपने साथ रखा.

इससे न केवल उसका अपना आधार मज़बूत हुआ, साथ ही यह देश एक सूत्र में बँधा रहा.

सामाजिक बहुलता

मोदी जी मानें या न मानें देश की सामाजिक बहुलता की जो अवधारणा कांग्रेस के पास है, वह भाजपा के पास नहीं है.

कांग्रेस आज भी अकेली 'पैन इंडिया पार्टी' है.

देश के पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के कई इलाकों में भाजपा की उपस्थिति भी नहीं है. कांग्रेस कमोबेश हर जगह है.

भौगोलिक ही नहीं सामाजिक और धार्मिक प्रतिनिधित्व के मामले में कांग्रेस का आधार भाजपा के मुकाबले व्यापक है.

भाजपा का सहारा हिन्दुत्व है और कांग्रेस का सामाजिक बहुलता.

आधार ढाँचा

देश का बुनियादी आधार ढाँचा बनाने का श्रेय कांग्रेस को है.

प्रशांत चन्द्र महालनबीस, होमी जे भाभा और विक्रम साराभाई जैसे अर्थशास्त्रियों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और शिक्षा शास्त्रियों को देश की मुख्यधारा से जोड़ने का बुनियादी काम जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में हुआ.

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, इंडियन इंस्टीय्टूट ऑफ मैनेजमेंट, भिलाई स्टील प्लांट, भाखड़ा बांध जैसी तमाम संस्थाएं कांग्रेस के दौर की देन हैं.

उन्हें क्या खत्म किया जा सकता है?

लोकतांत्रिक संस्थाएं

भारत और पाकिस्तान दोनों देश एक साथ बने थे.

लेकिन भारत में न सिर्फ लोकतंत्र कामयाब हुआ बल्कि ज़मींदारी उन्मूलन और हिन्दू कोड बिल के मार्फत बुनियादी सामाजिक विकास का काम हुआ.

देश में चुनाव आयोग, सीएजी से लेकर उच्चतम न्यायालय तक की मान-मर्यादा क्रमशः बढ़ती गई जो हमारे लोकतंत्र की ताकत है. इसमें बड़ी भूमिका कांग्रेस की है.

भारत की चुनाव व्यवस्था कई मायनों में सारी दुनिया में अपने किस्म की अनोखी है. इसके श्रेय से भी कांग्रेस को वंचित नहीं किया जा सकता.

अनुसूचित जातियों-जन जातियों, पिछड़े वर्गों तथा अल्पसंख्यकों के संरक्षण के तमाम कार्यक्रम कांग्रेसी राज में शुरू हुए या इनकी अवधारणा बनी. यह लोकतंत्र का बुनियादी काम है.

पंचायती राज और ग्रामीण रोजगार

73वें संविधान संशोधन के माध्यम से देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं को ज़मीनी स्तर तक लाने की प्रक्रिया कांग्रेस शासन की देन है.

ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम भी. शिक्षा का अधिकार भी कांग्रेसी व्यवस्था की देन है.

भारत का सफल पल्स पोलियो कार्यक्रम दुनिया भर में अपनी मिसाल है.

आर्थिक उदारीकरण

आर्थिक उदारीकरण केवल पूँजी निवेश और आर्थिक विकास के आँकड़ों तक सीमित नहीं है.

इसका काफी काम देश की कानूनी व्यवस्थाओं में बदलाव और आर्थिक संस्थाओं के सुधार से जुड़ा है.

संयोग से यह काम 1991 में कांग्रेसी सरकार के शासनकाल में शुरू हुआ.

उसी दौरान देश में दूरसंचार क्रांति हुई. देश में टेलीविज़न, इंटरनेट और कम्प्यूटर क्रांतियों का श्रेय भी कांग्रेस शासनकाल को जाता है.

सफाया नहीं, विकल्प

यह सूची काफी लम्बी है. इसे कांग्रेस-भक्ति या कांग्रेस-द्रोह के चश्मे से न देखा जाए तो यह आधुनिक भारत की उपलब्धियाँ हैं. इसमें भाजपा का योगदान भी होगा.

इस व्यवस्था में दोष हैं तो उसमें भी सभी दलों का कोई न कोई योगदान है.

जब कोई नेता किसी पार्टी से मुक्ति की बात करे तो यह बात आत्यंतिक लगती है. बेहतर लोकतांत्रिक शब्दावली है विकल्प बनना.

सन 2004 के चुनाव के पहले अरुण जेटली ने कहीं कहा था कि कांग्रेस अब खत्म हो चुकी है, वामपंथी सिर्फ बंगाल और केरल तक सीमित हैं.

सिर्फ भाजपा है जो कांग्रेस की जगह ले रही है.

भाजपा की सबसे बड़ी अभिलाषा कांग्रेस का स्थानापन्न बनने की है.

इसके लिए उसे उन कारणों को समझना होगा, जो कांग्रेस को महत्वपूर्ण, देश-व्यापी और स्वीकार्य बनाते हैं.

नरेन्द्र मोदी को आवेश या तैश में आने के बजाय अपनी शब्दावली पर ध्यान देना चाहिए.

विकल्प बनने के लिए उन्हें कांग्रेस से बेहतर बनना होगा.

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