भाजपा नेताओं के बयानों का 'सच'

गोवा में भाजपा बैठक
Image caption गोवा में नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया गया.

भारतीय जनता पार्टी के पदों से लालकृष्ण आडवाणी के इस्तीफ़े से पहले और बाद आए तमाम बयानों का अर्थ और निहितार्थ अलग अलग रहा है. आइए देखते हैं किसने क्या कहा और क्या कहने की मंशा थी.

आडवाणी की बीमारी

पिछले शुक्रवार को जब भारतीय जनता पार्टी के कई बड़े नेता पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में हिस्सा लेने गोवा की राह पर थे, लालकृष्ण आडवाणी को पेट की तकलीफ़ ने आ घेरा. उन्होंने राजस्थान के कुछ पार्टी कार्यकर्ताओं को बताया कि इसी कारण वो गोवा नहीं जा पाए. पेट की इस तकलीफ़ से उबरते उबरते उन्होंने एक बड़ा धमाका कर दिया और पार्टी पदों से इस्तीफ़ा दे दिया. मीडिया में आडवाणी की पेट की तकलीफ़ को राजनीतिक बीमारी बताया गया और कहा गया कि आडवाणी गोवा इसलिए नहीं गए क्योंकि वो नरेंद्र मोदी के केंद्रीय मंच पर आने से ख़फ़ा है.

आडवाणी राजस्थान में होने वाले एक कार्यक्रम में वीडियो कॉंफ़्रेंसिंग के ज़रिए शामिल हुए. वो चाहते तो वीडियो कॉंफ़्रेंसिंग के ज़रिए भी गोवा अधिवेशन में शामिल हो सकते थे. लेकिन अगर उन्होंने ऐसा नही किया तो वजह साफ़ है कि मामला कुछ और था. आडवाणी के विरोध के बावजूद भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने गोवा अधिवेशन के दौरान ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 के लिए पार्टी चुनाव प्रचार समिति का चेयरमैन बना दिया.

और पार्टी ने कहा कि आडवाणी की सहमति शामिल है.

मोदी उवाच

राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष बनाए जाने के बाद नरेंद्र मोदी ने कहा, "राजनाथ जी बोलने के लिए खड़े हुए और मुझे बैठने को कहा. जो लोग बाहर हैं उनके लिए इस बात की अहमियत समझना मुश्किल है. केवल कोई पद रहने से ही कोई ऐसा नहीं करता, उसके लिए दिल भी होना चाहिए. इसे दरिया-दिली कहते हैं जो कि अध्यक्ष जी ने दिखाई है."

Image caption आडवाणी ने इस्तीफ़ा देकर सभी को चौंका दिया.

नरेंद्र मोदी ही बेहतर समझते हैं कि वो "बाहर बैठे लोग" कह कर किसकी ओर इशारा कर रहे थे. पर ये भी सच है कि उस समय लालकृष्ण आडवाणी ही सबसे महत्वपूर्ण नेता थे जो गोवा बैठक से "बाहर" थे.

आडवाणी से आशीर्वाद?

मोदी ने तो यहां तक कहा कि उन्होंने आडवाणी से फ़ोन पर बात की है और उन्होंने उनको आशीर्वाद भी दिया है. मोदी ने फ़ोन पर बात की थी या नहीं इस बात की पुष्टि करना तो मुश्किल है लेकिन आडवाणी ने आशीर्वाद दिया था अब इस बात पर भी सवाल उठ रहे हैं. कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आडवाणी की विनम्रता को मोदी ने उनका आशीर्वाद समझ लिया.

ज़ाहिर है मोदी को चुनाव प्रचार प्रमुख बनाए जाने से आडवाणी बहुत ज़्यादा नाराज़ थे, ऐसे में वो भला मोदी को आशीर्वाद क्यों देंगे.

कार्यकर्ताओं की आड़

Image caption यशवंत सिंहा ने भी फ़ौरन ही पाला बदल लिया.

आडवाणी के इस्तीफ़े के बाद मोदी ने पहली प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने आडवाणी से इस्तीफ़ा वापस लेने का आग्रह किया है.ये ख़बर भी मोदी ने ट्विटर के ज़रिए दी.

मोदी ने ट्विटर पर लिखा, ''फोन पर आडवाणीजी से विस्तृत बातचीत हुई है. उनसे निर्णय बदलने का आग्रह किया. मुझे उम्मीद है कि वह लाखों कार्यकर्ताओं को निराश नहीं करेंगे.''

इस बयान के बहुत आसानी से दो अर्थ निकाले जा सकते हैं. एक व्याख्या के हिसाब से मोदी सीधे सीधे आडवाणी से अपील कर रहे हैं कि वो इस्तीफ़ा वापिस ले लें क्योंकि उनके इस्तीफ़े से पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं को तकलीफ़ हुई है. लेकिन इस बयान को दोबारा पढ़ें तो ये व्याख्या भी आसानी से की जा सकती है कि मोदी ने दरअसल आडवाणी को संदेश दिया है कि वो इस्तीफ़े का अपना फ़ैसला बदलें और उन लाखों कार्यकर्ताओं की भावनाओं का आदर करें जिनके कारण पार्टी मोदी को केंद्रीय मंच पर लाने पर मजबूर हुई है.

पुराने समर्थक

गोवा नहीं जाने वालों में वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा भी शामिल थे. वे ये कहते रहे कि उनकी तबीयत बिल्कुल ठीक है लेकिन वो कुछ और कारणों से गोवा नही जा रहे. मोदी को चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख चुने जाने के बाद यशवंत सिंहा ने बाज़ाबता एक बयान जारी कर कहा कि मीडिया उनकी अनुपस्थिति को ग़लत तरीक़े से पेश कर रहा है. यशवंत सिंहा ने कहा कि वे तो मोदी के समर्थक हैं और उन्होने ही सबसे पहले कहा था कि मोदी को बड़ी ज़िम्मेदारी दी जानी चाहिए.

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