कैसे बिछ रही है भाजपा की बिसात ?

लाल कृष्ण आडवाणी के इस्तीफ़े के मामले में कई लोगों को लगता है कि उन्हें न पार्टी पद छोड़ने थे और न उन्होंने छोड़े. इस्तीफा स्वीकार न होना भी लगभग तय था और स्वीकार नहीं हुआ. ये और बात है कि मीडिया को कुछ घंटों के लिए आडवाणी ने एक मुद्दा ज़रुर दे दिया.

खैर जब ये मुद्दा समाप्त हुआ तो क्यों न पहले के असली मुद्दे पर चला जाए और ये देखा जाए कि मोदी को चुनाव प्रचार की कमान देने में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को क्या फायदा है? वैसे भी गठबंधन सरकारों के ज़माने में राजनीति संभावनाओं की ज़मीन है और कब क्या संभावना बने ये कोई नहीं कह सकता.

पार्टी की दूसरी कतार के नेताओं के फायदे को गिनने के लिए दो बातें ध्यान में रखनी होंगी. पहली कि नरेंद्र मोदी मज़बूत नेता की छवि भले ही रखते हों लेकिन उनकी अपनी पार्टी और गठबंधन दल उनकी कट्टरपंथी छवि से बहुत खुश नहीं हैं.

अब आइए बात करते हैं कि मोदी को आगे बढ़ाने में बाकी नेताओं को क्या लाभ हो सकता है.

राजनाथ सिंह

मोदी के हाथ में चुनाव प्रचार की कमान देने के पक्षधर रहे हैं और इसके लिए कार्यकर्ताओं के दबाव का हवाला भी देते रहे हैं. लेकिन क्या मोदी की अगुआई में चुनाव प्रचार से पार्टी अध्यक्ष का कद छोटा नहीं हो जाता? अगर विश्लेषकों की ये बात मान ली जाए कि चुनाव में किसी भी दल के पूर्ण बहुमत की संभावना इस समय नगण्य है और संभावना गठबंधन सरकार की है तो मोदी के नाम पर आम सहमति की संभावना भी कम है. ऐसे में क्या राजनाथ का दावा सबसे मज़बूत नहीं होगा?

वो हिंदी पट्टी के नेता हैं. आम तौर पर विवादित नहीं रहे हैं. पार्टी अध्यक्ष भी हैं. और पार्टी अध्यक्ष का पहला दावा बनता ही है.

सुषमा स्वराज

लोकसभा में बीजेपी की नेता हैं. ऐसे में उन्हें पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिए खारिज सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता. भले ही कहा ये जाता हो कि आरएसएस उनके नाम के समर्थन में नहीं है लेकिन वो महिला हैं. गठबंधन के कई दल उन्हें स्वीकार कर सकते हैं. शिव सेना पहले भी मोदी की बजाय सुषमा के नाम का समर्थन कर चुका है. ऐसे में सुषमा स्वराज के लिए भी मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ना फायदे का सौदा है. पार्टी को मोदी के नाम पर ज्यादा सीटें मिल जाएं और फिर गठबंधन के ज़रिए पार्टी का कोई और उम्मीदवार पीएम बन जाए!

अरुण जेटली

ज़मीनी पकड़ कम भले ही हो लेकिन वह कुशल रणनीतिकार के रुप में जाने जाते हैं. जब नरेंद्र मोदी दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे तब भी अरुण जेटली को उनकी चुनावी रणनीति का सलाहकार माना गया था. जेटली धाराप्रवाह अंग्रेज़ी-हिंदी बोलते हैं. मिलनसार हैं. बडे़ विवादों से दूर हैं. कॉरपोरेट में उनकी पहुंच है और पूर्व की गठबंधन सरकार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं. उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात जाएगी कि वो मोदी के मित्रों में से हैं जिन पर मोदी शायद भरोसा करते हों.

लाल कृष्ण आडवाणी

यूं तो आडवाणी ने मोदी का कद बढ़ने के कारण पार्टी पदों से इस्तीफा दिया था लेकिन अब इस्तीफ़ा स्वीकार नहीं हुआ है तो आडवाणी के लिए भी सिल्वर लाइनिंग यही है. पार्टी को 150 से अधिक सीटें मिलें और पार्टी गठबंधन सरकार में बड़ी भूमिका में आ जाए. ऐसे में गठबंधन के एक सर्वमान्य उम्मीदवार के तौर पर उनके नाम पर रज़ामंदी तो बन ही सकती है.

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