जद-यू भाजपा के बीच फ़ोन लाइनें व्यस्त

नीतीश कुमार, नरेंद्र मोदी

जद-यू की तरफ़ से ऐसी खबरों के बाद कि वो गठबंधन तोड़ने की घोषणा शनिवार 15 जून को कर देंगे भाजपा नेताओं ने रिश्ता बचाने की कोशिशें तेज़ कर दी हैं.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आज सुबह कहा है कि नए राजनीतिक घटनाक्रम के तहत पिछले दिनों जो कुछ भी हुआ है उनकी पार्टी उसे लेकर चिंतित हैं और उस पर पार्टी में चर्चा होगी.

जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग होने की गर्म होती ख़बरों के बीच नीतीश कुमार की इस टिप्पणी पर लोगों की नज़रें लगी थीं.

उन्होंने बताया कि भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने बीती रात उन्हें और जनता दल यूनाइटेड अध्यक्ष शरद यादव को फ़ोन किया था.

मुख्यमंत्री ने बताया, " उन्होंने कुछ बातें कही हैं, जब हम चर्चा करेंगे तो इन बातों का संज्ञान लेंगे."

नीतीश कुमार ने बताया कि राजनाथ सिंह और मुरली मनोहर जोशी का भी फ़ोन आया था.

इसके पहले

जद-यू के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद शिवानन्द तिवारी ने बीबीसी को बताया कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद ने इस पर निर्णय के लिए शरद यादव और नीतीश कुमार को अधिकृत कर दिया है.

तिवारी के अनुसार शुक्रवार 14 जून को जद-यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव पटना आ जाएंगे और तब इसकी ज़रूरी प्रक्रिया शुरू हो जाएगी.

उनहोंने कहा- ''ताल्लुक़ बोझ बन जाए तो उस को तोड़ देना ही अच्छा होता है. सत्रह साल पुराने इस गठबंधन को कुछ भाजपा नेताओं की कट्टर सोच ने बोझिल कर दिया था. इसलिए अपने बुनियादी उसूलों से समझौता करके गठबंधन क़ायम रखना अब हमारी पार्टी को मंज़ूर नहीं है.''

मोदी के चलते

दरअसल भाजपा में नरेन्द्र मोदी की हैसियत को मिली उछाल के दबाव में नीतीश कुमार को अपना सियासी रास्ता जल्दी बदलने के लिए बाध्य होना पडा है.

गोवा के भाजपा सम्मलेन से लेकर लालकृष्ण आडवाणी के इस्तीफ़ा प्रकरण तक 'नमो नमः ' के प्रभाव से चिढ़े हुए नीतीश कुमार को अपने वायदे पर अमल का यही समय सही लगा है.

उन्होंने बहुत पहले ही घोषणा की थी कि नरेन्द्र मोदी को अगर भाजपा प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाएगी तो जद-यू इस पार्टी से अपना रिश्ता तोड़ लेगा.

सेकुलर छवि की चिंता

इसके बाद कई और ऐसे मौक़े आए, जब नीतीश कुमार ने 'सेकुलर छवि' को आधार बनाकर नरेन्द्र मोदी पर सियासी तीर चलाए.

लेकिन जद-यू और भाजपा के एक गुट की नाराज़गी या विरोध से बेपरवाह भाजपा नेतृत्व ने नरेन्द्र मोदी का ' प्रोजेक्शन ' जारी रखा.

ऐसे में नीतीश कुमार को अपनी राजनीतिक साख बचाने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से बाहर निकल जाने का विकल्प अपनाना पड़ा है.

प्रेक्षकों ने इसे नीतीश कुमार में पनपी ' सेकुलर इमेज ' वाली चाहत से भी जोड़कर देखा है. लेकिन भाजपा के साथ लंबी सत्ता-साझेदारी के कारण नीतीश की इस चाहत पर कई सवाल भी उठ जाते हैं.

जो भी हो, अब तो भाजपा से अलग होने पर जद-यू को ' धर्मनिरपेक्षता ' संबंधी आधार वाली किसी राजनीतिक मोर्चेबंदी का ही हिस्सा बनना होगा.

तीसरे मोर्चे के ओर

तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तीसरे मोर्चे के रूप में ग़ैर भाजपा और ग़ैर कांग्रेसी क्षेत्रीय मोर्चा का एक रास्ता सुझाया है. नीतीश कुमार इस तरफ़ आकर्षित भी हुए हैं.

उधर भाजपा से अलग होने की स्थिति में बिहार की मौजूदा नीतीश सरकार का स्वरुप बदलने जा रहा है. यानी भाजपा के बिना भी जद-यू की सरकार यहाँ नीतीश कुमार के नेतृत्व में चल सकती है.

सरकार को ख़तरा नहीं

कारण है कि 243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में जद-यू के 118 सदस्य हैं. सरकार बनाने के लिए कम-से-कम 122 सदस्य चाहिए और जद-यू ने चार सदस्यों की कमी निर्दलीय सदस्यों से पूरी कर लेने का दावा किया है.

ज़ाहिर है कि ऐसी सूरत में 91 विधायकों वाली भाजपा इस सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेगी और तब नीतीश सरकार को सदन में विश्वास मत हासिल करना होगा.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुक्रवार 14 जून के बाद वाले अपने निर्धारित सरकारी कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं. जून के तीसरे हफ्ते से बिहार की राजनीति का एक नया दौर शुरू होगा.

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