लखनऊ से तय होगी नरेंद्र मोदी की दावेदारी

राजनीतिक तौर पर विवादास्पद माने जाने वाले नेता नरेंद्र मोदी को हाल ही में भारतीय जनता पार्टी ने अगले साल होने वाले आम चुनाव में अपने प्रचार अभियान की अगुवाई की कमान सौंपी है.

इसके साथ ही प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी संभावित दावेदारी थोड़ी और बढ़ गई है.

यह भी माना जा रहा है कि सियासी तौर पर अहम राज्य उत्तर प्रदेश को जीतना मोदी की महत्वाकांक्षा के केंद्र में होगा.

पिछले हफ्ते जब गोवा में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी की चुनाव अभियान समिति की कमान सौंपी जा रही थी और इसको लेकर उत्साह का माहौल था.

उस वक्त उत्तर प्रदेश के भीड़-भाड़ भरे अस्त-व्यस्त शहरों के लिए यह सब कुछ सामान्य राजनीति की तरह ही था.

'जाति के इर्द-गिर्द'

इत्मिनान से चलते गधे, ज़रूरत से ज़्यादा भरी गाड़ियाँ और सवारियों से लदी जीपों से उत्तर प्रदेश के इन शहरों की गड्ढेदार सड़कों का ट्रैफिक थम सा जाता है.

इतना ही नहीं यहाँ इमारतें कुछ यूँ बनाई जाती हैं कि उनमें कायदे से बसाए गए शहरों के निशान खोजना मुश्किल है.

बिजली की कमी और अन्य नागरिक सुविधाओं को लेकर लोगों की शिकायतें भी हैं.

ये सब कुछ किसी में यह भरोसा जगा सकता है कि ज्यादातर स्थानीय लोग एक संभावित प्रधानमंत्री के करियर पर नज़र रखे हुए होंगे.

वह भी ऐसे शख्स के बारे में जिसे एक कायदे से चलाए जा रहे राज्य के प्रशासन और उसके नियोजित विकास का श्रेय दिया जाता है.

लेकिन नहीं.

एक दिन के थकाऊ अभियान के बाद राज्य के एक अनुभवी नेता और पूर्व सांसद अफ़ज़ल अंसारी कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में सियासत आज भी जाति के इर्द-गिर्द चलती है."

उत्तर प्रदेश की जीत

इस सूबे की राजनीति को पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक गाँव के एक उदाहरण से समझा जा सकता है.

मुझे बताया गया कि इस गाँव में भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा लगाए जाने की दलितों की माँग को लेकर उनका अन्य पिछड़ी जातियों से विवाद चल रहा है.

यह राज्य देश की सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य है और देश की संसद के निचले सदन में सबसे ज्यादा संख्या में 80 सांसद चुनकर भेजता है.

यह वही राज्य है जहाँ भाजपा को 180 का आँकड़ा छूने के लिए हवा का रुख मोड़ना होगा.

संख्या के लिहाज से यह सबसे निचला अनुमान है जिसके बारे में माना जाता है कि सरकार बनाने के लिए भाजपा की किसी भी संभावना के मद्देनज़र पार्टी को कम से कम इतने सासंद चुनकर लाने होंगे.

और ऐसा कोई राज्य है भी नहीं जहाँ भाजपा के पास फायदा उठाने का अवसर हो जितना कि उत्तर प्रदेश में है.

लेकिन फिलहाल यहाँ हालात ऐसे हैं कि हवा का रुख भाजपा के पूरी तरह से खिलाफ है.

स्थानीय बनाम राष्ट्रीय

पिछले आम चुनाव में भाजपा को महज 10 सीटें ही मिल पाई थीं और पार्टी मिले मतों में भी 4.7 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी.

इसके ठीक बाद हुए राज्य विधानसभा चुनाव के नतीजे भी पार्टी के लिए कोई बहुत ज्यादा उत्साहवर्धक नहीं रहे थे.

मोदी के पास इस हवा का रुख मोड़ने का एक मात्र तरीका यही है कि मतदाताओं को इस बात के लिए मनाया जाए कि वे आम चुनावों में स्थानीय मुद्दों को दरकिनार कर राष्ट्रीय मुद्दों को तरजीह दें.

चुनावी पंडितों का कहना है कि मोदी की राह में दो मुश्किलें हैं जिनका हल उन्हें खोजना होगा.

पहला यह कि देश के ज्यादातर हिस्सों में आम चुनाव राज्य विधानसभा चुनावों की कड़ी का ही एक हिस्सा बन गए हैं.

भारत में होने वाले चुनाव पर नज़र रखने वाले एक जानकार का तो कहना है कि दुनिया के अन्य देशों की तुलना में यहाँ होने वाले आम चुनाव के चरित्र में राष्ट्रीय कही जा सकने वाली बहुत ही कम बातें रह गई हैं.

मतदाताओं का रुझान

मोदी की राह में दूसरी चुनौती मतों को सीटों में बदलने के मामले में भाजपा का खराब रिकॉर्ड रहा है.

इसे सीट-वोट गुणक के तौर पर भी जाना जाता है.

भाजपा ने पार्टी को मिले हर मत फीसदी के अनुपात में जितनी सीटें जीती थी, उसमें लगातार गिरावट देखी जा रही है.

साल 1999 में यह अनुपात अपने उच्चतम स्तर पर था.

इसमें सुधार का सबसे स्पष्ट तरीका यही हो सकता है कि मतदाताओं का रुझान एक बार फिर से राष्ट्रीय मुद्दों के प्रति बढ़े.

मोदी को मतदाताओं को इस बात के लिए मनाना होगा कि आम चुनाव का सरोकार राष्ट्रीय मुद्दों से है और कोई राष्ट्रीय स्तर का नेता उनकी जिंदगी में बदलाव लाने के लिए सक्षम हो.

उन्हें इस बात का भली-भांति एहसास है और वह पहले भी यह जाहिर कर चुके हैं.

'विकास पुरुष'

यही वजह है कि वे खुद को 'विकास पुरुष' के तौर पर पेश कर रहे हैं और वे गुजरात में हुए विकास के लिए मिले श्रेय को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं.

पिछले दो आम चुनाव के नतीजों का रुझान देखें तो यह मालूम पड़ता है कि भारत में अब भी कांग्रेस को दिल्ली के लिए सत्ता की नैसर्गिक पार्टी के तौर पर देखा जाता है.

मोदी को इस परंपरा को भी तोड़ना होगा.

जब वे कांग्रेस मुक्त भारत निर्माण की बात कर रहे थे तो उनके निशाने पर न केवल कांग्रेस के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार की गलतियां और कमजोरियां थीं बल्कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की फैसले न कर पाने की नाकामी भी थी.

मोदी कांग्रेस प्रमुख सोनिया गाँधी और उनके बेटे राहुल को लेकर भी तल्ख थे.

लेकिन यह वही जगह है जहाँ मोदी खुद को मुश्किल हालात में पाते हैं.

मोदी को यह अच्छी तरह से पता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नेतृत्व उनसे पूरी तरह से खुश नहीं है.

संघ की आवाज

यह बात ध्यान देने लायक है कि प्रधानमंत्री बनने के लिए उनके संघर्ष के पहले चरण में चुनाव अभियान समिति की कमान मिलने में संघ का समर्थन बेहद ही महत्वपूर्ण था.

संघ में यह महसूस किया जाने लगा है कि गुजरात भाजपा एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई है.

इतना ही नहीं बल्कि संघ की आवाज को भी अनसुना किया जा रहा है

जबकि आरएसएस ही वह संगठन था जिसकी वजह से मोदी राजनीति में आ सके.

संघ के एक वरिष्ठ सदस्य ने हाल ही में मुझसे कहा कि मोदी को जो समर्थन हासिल है उसकी वजह से ही नेतृत्व अपने मुद्दों को दरकिनार कर खुलकर उनके समर्थन में आ सका.

ठीक उसी वक्त गोवा में पार्टी कार्यकारिणी के बैठक के दौरान यह साफ तौर पर दिख रहा था कि भाजपा नेतृत्व को मोदी की नियुक्ति को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं के दबाव से भी रूबरू होना पड़ रहा है.

गुजरात दंगे

अगर मोदी उन मुद्दों पर उन्हें निराश करते हैं तो जिस जमीन पर वह खड़े हैं, वह खिसक भी सकती है.

उस तनी हुई रस्सी पर वापस लौटते हैं जिस पर मोदी संतुलन साधने की कोशिश में खड़े दिखाई दे रहे हैं.

एक तरफ अगर वे हिंदुओं के मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते हैं तो उन्हें अपनी सियासी जमीन खोने का खतरा उठना पड़ सकता है.

दूसरी तरफ मुश्किल इस बात की भी है कि अगर वे तुलनात्मक रूप से संकीर्ण माने जाने वाले मुद्दों से जुड़ते हैं तो उन्हें राष्ट्रीय नेता नहीं माना जाएगा.

कांग्रेस पार्टी भी इस अवसर के इंतजार में है कि वह मतदाताओं को 2002 के गुजरात दंगों में उनकी भूमिका को लेकर लगे आरोपों की याद दिलाएगी.

सियासत के इन उबड़-खाबड़ रास्तों पर संतुलन साधना मोदी के लिए एक मुश्किल भरी चुनौती साबित होने जा रहा है.

आम चुनाव के आखिरी मुकाबले में पहुँचने से पहले मोदी का पतन भी हो सकता है.

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