उत्तराखंड:'मौत को इतनी करीब से पहली बार देखा'

उत्तराखंड बाढ़

पत्रकारिता में अपने अभी तक के करियर में तमाम बम धमाके और प्राकृतिक आपदाएँ कवर करने का मौका मिला है.

कई बार ये भी लगा है कि आखिर ये सब क्यों होता है.

लेकिन उत्तराखंड में इस साल वक्त से पहले हुई बारिश और उसके बाद तबाही का जो मंज़र देखने को मिला है, उसे मैं दिल दहला देने वाला कहूँ तो यह कम ही होगा.

जलप्रलय की कहानी

जौली ग्रांट से हेलिकॉप्टर पर बैठकर वायु सेना के एयर बेस से आगे बढ़े हमें दस ही मिनट हुए थे कि लगा जैसे पहाड़ों में बड़े-बड़े मिट्टी के धब्बे दिखाई पड़ रहे हैं.

नज़दीक पहुँचने पर समझ में आया कि ये तो पिछले हफ्ते तक सड़कें थीं जो पानी के तेज़ बहाव में बह गई थीं और अपने साथ न जाने कितनों को लील गई थीं.

कराह

हमारा पहला पड़ाव गुप्तकाशी था और वहाँ हेलिकॉप्टर उतरने से पहले ही पहाड़ी पर लोग हाथ हिलाने लगे और गुहार देते दिखाई दिए.

लैंड करते ही वहां लोगों के बीच इस बात के लिए मारकाट मच गई कि किसको पहले सुरक्षित निकाले जाने का हक़ बनता है. हमें वहाँ आधे घंटे तक रुकना था.

हाथ में कैमरा और माइक्रोफोन लिए हम आगे बढ़ते जा रहे थे और भूखे और बेबस पड़े लोगों की कतार ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी.

पास में कुछ बिस्कुट के पैकेट थे, निकाले और आगे बढ़ाए तो कब किसने झपट्टा मारा, पता ही नहीं चला.

वाजिब भी था. इन सैकड़ों लोगों को चार से पांच दिन तक खाने के लिए मोहताज होना पड़ा था.

एक व्यक्ति ज़मीन पर लेटा था. उसे देखकर मुझे उसके बचने की उम्मीद कम ही लगी .

केदारनाथ

अगला पड़ाव वही था, जिसकी दुनिया भर में चर्चा है. सच कहूँ तो जब केदारनाथ मंदिर के पास एक तिरछी पहाड़ी पर पायलट हेलिकॉप्टर उतार रहे थे तब ज़हन में सिर्फ अपना परिवार ही था.

लगभग अस्सी लोग फटे और मैले-कुचैले कपड़ों में वहां या तो खड़े थे या फिर लेटे हुए थे.

एक वृद्ध से बात हुई तो बोले, "हाथ जोड़ते हैं, हमें बस यहाँ से निकाल चलिए."

घाटी से नीचे झाँकने की हिम्मत जुटाई, तो नीचे दूर नदी की धारा में घरों की बह चुकी छत और गैस के सिलेंडर ही देखने को मिले.

आप ख़ुद अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उन घरों में रह रहे लोगों का क्या हुआ होगा.

सन्नाटा

घायलों और फँस हुए लोगों को लेकर हमारा हेलिकॉप्टर कुछ ही देर उड़ा होगा कि कई लोगों को उल्टियाँ शुरू हो चुकीं थी.

इसके बावजूद ढाई घंटे के पूरे सफ़र में किसी एक मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला.

उन लोगों ने तो अपने परिजनों और साथ वालों को अपनी आँखों के सामने पानी में बहते और ग़ायब होते देखा था.

लेकिन मैंने जो देखा था वो भी कम भयावह नहीं था. मैंने उस पूरे इलाके में और तमाम फंसे हुए लोगों की आँखों में साक्षात मौत देखी थी.

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