उत्तराखंड आपदा: 'विश्वास ही नहीं होता कि हम ज़िंदा हैं'

हरिद्बार
Image caption अमरीका के रिचर्ड पीटरसन आध्यात्म का ज्ञान लेने भारत आए हैं

हरिद्वार के विशाल स्वामी नारायण आश्रम के बड़े से आंगन के बीच छोटे से चबूतरे पर मंदिर बना है. बिजली कटौती के कारण फैले अंधेरे और ते़ज़ बारिश से बचने के लिए इस मंदिर के नए विदेशी मेहमान इसी चबूतरे का रुख़ करते हैं.

ये सभी लोग बेहद खुशकिस्मत हैं. किस्मत साथ नहीं देती तो उत्तरकाशी में बने आश्रम में आध्यात्म की शिक्षा लेते ये लोग भी उफनती नदी के गुस्से का शिकार हो गए होते.

ऑस्ट्रेलिया की कैथरीन को सोमवार 17 जून को सुबह पता चला कि कुछ ही दूरी पर बना पुल पानी के ज़बरदस्त बहाव के साथ बह गया है.

वो कहती हैं, “मैं जब बाहर गई तो पानी हमारी इमारत के नज़दीक आता जा रहा था. एक वक्त तो पानी हमसे सिर्फ़ 15 फ़ीट की दूरी पर था.”

कैथरीन के इस गुट को अंदाज़ा नहीं था कि स्थिति इतनी खराब हो जाएगी लेकिन जब उन्होंने देखा कि साथ में लगी सड़क पानी की वजह से तबाह हो गई है तब उन्हें स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा हुआ.

आश्रम

Image caption कोलंबिया के लुई हेनाओ ने तबाही का वो मंजर देखा था

पानी के बहाव के सामने पेड़, सड़कें, घर-बार, आम लोग कुछ भी टिक नहीं पा रहे थे और इन सभी का नदी के बहाव में बह जाना सभी ने अपनी आँखों से देखा.

इस गुट में अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया सहित कई दूसरे देशों के नागरिक थे इसलिए उन्होंने स्थानीय अफ़सरों के अलावा अपने-अपने दूतावासों में फ़ोन किया.

अमरीका के रिचर्ड पीटरसन के मुताबिक पास ही गिरी कुछ चट्टानों के कारण नदी ने अपना रास्ता बदल लिया था नहीं तो वो भी पानी की धार का शिकार हुए होते.

उन्हें अपनी किस्मत पर ही विश्वास नहीं होता कि वो ज़िंदा बच गए.

आश्रम में पानी, खाने आदि की कमी नहीं थी, सिर्फ़ बिजली नहीं थी लेकिन उनके पास एक कार बैटरी थी जो सौर ऊर्जा से चार्ज होती थी.

खुशकिस्मत

आखिरकार पूरा गुट पहाड़ों की ऊँचाई चढ़कर कई घंटों के सफ़र के बाद पास ही स्थित हेलीपैड पहुँचा जहाँ से भारतीय वायु सेना के लोगों ने उन्हें बचाया.

रिचर्ड कहते हैं, “प्रकृति की शक्ति देखने वाली थी. आप हैरान होंगे कि हमें कोई डर महसूस नहीं हुआ. हम प्रतिदिन सात घंटे तक प्रार्थना करते थे इसलिए हम बेहद शांत थे. मुझे इस बात का दुख था कि मुझे इस खूबसूरत जगह को छोड़ना होगा.”

भारतीय मूल के ब्रितानी नागरिक विशाल किशोर अपने आपको बेहद खुशकिस्मत मानते हैं कि वो मौत के मुँह से सुरक्षित निकल आए.

अमरीका के डॉक्टर ओलिक्स ऐडम्स भी वो चंद घंटे नहीं भूल पाएँ हैं.

Image caption बाढ़ में फंसे कई विदेशी यात्रियों को हेलीकॉप्टर से सुरक्षित निकाला गया (तस्वीरः एएफपी/भारतीय रक्षा मंत्रालय)

आपातकाल

उत्तरकाशी आश्रम के प्रमुख स्वामी विश्वात्मानंद गिरी के अनुसार आश्रम में आपातकाल दीवार का निर्माण किया गया था जिससे इमारत बच सकी, नहीं तो वो भी बाढ़ की भेंट चढ़ गई होती.

वो कहते हैं, “उस दौरान हम सोच रहे थे कि अगर ये दीवार टूट जाती है तो फिर हम क्या करेंगे.”

इन सबके बीच जिस बात ने सभी को प्रभावित किया है वो है कि किस तरह भारतीय सेना के जवानों और स्थानीय लोगों ने इस गुट की मदद की.

कैथरीन कहती हैं, "मुझे सबसे ज़्यादा इस बात पर आश्चर्य हुआ कि जिस तरह से लोग एक दूसरे की मदद कर रहे थे. मुझे एक महिला की याद आती है. उनके पति की मौत हो चुकी थी, उनका घर तबाह हो चुका था, उनके पास मात्र दो दिन का खाना था लेकिन उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थी.”

इस घटना ने इन सभी पर गहरा प्रभाव डाला है और वो इस सदमे से उबर नहीं पाए हैं. इन सभी का कहना है कि वो दोबारा भारत आना चाहेंगे.

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