मध्य वर्ग: रास्ता बना लिया है दलितों ने

दलित भी तेजी से मुख्यधारा का हिस्सा बन रहे हैं

शायद जैलीफिश को छोड़कर सभी जीवित प्राणियों में केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र का जो महत्व है, उसी तरह दुनिया भर में मध्य वर्ग समाज के लिए अहम है. मध्य वर्ग वह गोंद है जो सामाजिक वर्गों को समरसता के साथ आपस में जोड़े रखता है.

मध्य वर्ग के महत्व को बेहतर ढंग से समझने के लिए उच्च वर्ग और निम्न वर्ग को भी समझना होगा.

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हालांकि कोई भी निम्न वर्ग का दर्जा नहीं चाहता, लेकिन एक बड़ा हिस्सा संभ्रांत वर्ग को आदर्श के रूप में भी नहीं देखना चाहेगा. ऐसे में इस बात को लेकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि बहुसंख्यक लोग अरबपति बनने का सपना क्यों नहीं देखते हैं.

'शुद्धता और परिपूर्ण होना' अपने आप में काल्पनिक है, लेकिन इसकी चाहत मध्य वर्ग में सबसे ज्यादा है. मध्य वर्ग की क्या पहचान है- किसी अच्छे खासे इलाके में दो बेडरूम का एक फ्लैट, एक कार, बच्चों के लिए अच्छा स्कूल, स्वास्थ्य बीमा, कुछ बचत और शायद जिंदगी में कम से कम एक बार विदेश में छुट्टी मनाना!

हालात में सुधार

सदियों तक अपमानित, वंचित और मजाक का पत्र बनने के बावजूद दलित भी आज आगे बढ़ रहे हैं.

पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय में 'सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया' के एक अध्ययन के मुताबिक उत्तर प्रदेश में बीस हजार से अधिक दलित परिवारों के खानपान, जीवन शैली और पेशे में बहुत बदलाव आया है और वो प्रगति कर रहे हैं. अध्ययन के अनुसार अब इन दलितों का खान पान भी वैसा ही है जैसे संभ्रांत वर्ग के लोगों का होता है.

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Image caption एक अमरीकी सर्वे के अनुसार दलितों के जीवन स्तर में सुधार आ रहा है

हालांकि भारतीय राज्य द्वारा सरकारी रोजगार के क्षेत्र में सकारात्मक कार्रवाई से एक छोटे से दलित मध्य वर्ग का उदय हुआ है. 1990 के आर्थिक सुधारों के बाद धन के विस्फोट ने दलित मध्य वर्ग को पहचान दी है. दलित निम्न वर्ग की आकांक्षा भी मध्य वर्ग की श्रेणी में शामिल होने की है.

मुख्यधारा की कश्मकश

दूसरे शब्दों में कहें तो उभरते दलित स्वयं मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं. यही समस्या शुरू हो जाती है. दलित आत्म-संघर्ष की स्थिति में दाखिल हो जाते हैं. दलित एक बात है और दलित आन्दोलन दूसरी.

बलात्कारः दलितों को नीचा दिखाने का हथियार

दलित आबादी का एक हिस्सा उत्थान के साथ ही मध्य वर्ग की श्रेणी में शामिल होना चाहता है और ‘मैं यहाँ हूँ’ कहकर मुख्यधारा के साथ अपने ढंग से मोलतोल करता है, जबकि दलित आन्दोलन की एक आपत्ति है कि- उनमें क्यों शामिल हो!

निम्नवर्गीय दलितों के साथ अतीत में हुए अन्याय और अपमान का क्या, जो अब भी जारी है? हमारी पहचान का क्या होगा? हमारी संस्कृति का क्या होगा? मुख्यधारा में प्रवेश किस कीमत पर होगा?

भारत की कुल आबादी में 16.20 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दलित सामाजिक रूप से अल्पसंख्यक हैं. सामाजिक, नस्लीय या धार्मिक- सभी अल्पसंख्यकों की तरह दलितों ने भी आत्म-टकराव की स्थिति का सामना किया है.

मुख्यधारा को नहीं, बल्कि दलितों को ही अपनी मौजूदा दुर्दशा का उत्तर तलाशना होगा. दलित जनसमुदाय इन उत्तरों को नहीं खोजेगा. दलित आन्दोलन को ही इस आत्म-टकराव की स्थिति को खत्म करना होगा. दलित आंदोलन जाति व्यवस्था की उत्पत्ति और दलितों के अलगाव पर एक नया नजरिया अपना सकता है.

क्या होगा पहचान का?

जाति व्यवस्था के संविधान 'मनु धर्म' में कहा गया है कि दलित मुख्यधारा की बस्तियों से अलग अपने रहने का प्रबंध करें. नतीजतन भारतीय गाँवों में दलित सबसे अलग रहते हैं.

'मनु धर्म' उन सभी सांसारिक वस्तुओं से दलितों को वंचित करता है, जो मध्य वर्ग की पहचान हैं, मसलन फ्लैट, कार, अच्छी शिक्षा तक पहुँच, स्वास्थ्य सुरक्षा और बचत आदि. वंचित रखे जाने की इस व्यवस्था को मात देने के लिए दलितों को जल्द से जल्द मध्यवर्गीय श्रेणी के प्रतीकों को हासिल करना चाहिए. ऐसे में मुख्यधारा में प्रवेश का अर्थ होगा जाति व्यवस्था की हार.

सवाल अभी भी बना हुआ है! मुख्यधारा में प्रवेश करने के लिए क्या दलितों को अपनी विचारधारा, पहचान और संस्कृति से समझौता करना होगा?

यदि कोई दलित आन्दोलन के मूल उद्देश्यों को फिर से पढ़े तो ये बात स्वयं स्पष्ट हो जाएगी. ज्यादातर गैर-पश्चिमी सभ्यताओं की तरह भारत की मुख्यधारा भी अपने से श्रेष्ठ पश्चिम की जीवन शैली, खानपान और संस्कृति को अपना रही है.

बेहतर भविष्य की आहट

Image caption भारतीय मध्य वर्ग एक ऐसी स्थिति तैयार करेगा जहाँ सभी पहचानें, एक पहचान में मिल जाएंगी

यदि भारत की मुख्यधारा पश्चिम के सांचे ढलने को उतावली है, तो दलितों को भारत की मुख्यधारा का स्वाद लेने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. ये मुख्यधारा जाति व्यवस्था से ज्यादा पश्चिम की कार्बन कॉपी है.

दलित आंदोलन के उद्देश्यों की बात करें तो इसमें दो राय नहीं हो सकती है कि ये आंदोलन जाति निरपेक्ष व्यवस्था चाहता है. पूरा भारत पश्चिम की ओर जा रहा है, जिसका अर्थ जाति व्यवस्था का अंत है.

मुख्यधारा के लोग आज पश्चिमी अंदाज के कपड़े पहनते हैं और पश्चिमी शैली में बने घरों में रह रहे हैं. भारत में पूँजीवादी व्यवस्था का उदय पश्चिम से आया है. भाषा के रूप में अंग्रेजी का दबदबा भी पश्चिम का असर है.

जिस ढंग से भारतीय मुख्यधारा अपनी जड़ों, पहचान, विचारधारा को छोड़ रही है, इस दिशा में दलितों को और भी तेजी से आगे बढ़ना चाहिए.

भारतीय मध्य वर्ग एक ऐसी स्थिति तैयार करेगा जहाँ सभी की पहचान एक हो जाएंगी और इसका नामकरण भावी पीढ़ियाँ करेंगी.

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