उत्तराखंडः अपनों को तलाश करती तीन साल की वो बच्ची

उत्तराखंड
Image caption बच्ची के दोनों पांवों में फ्रैक्चर है और वो एक सरकारी अस्पताल में भर्ती है.

उत्तराखंड में आई आपदा में अनगिनत परिवार अपने प्रियजनों से बिछुड़ गए. सैकड़ों को मौत ले गई तो बहुत सारे लोग लापता हैं.

उन्हीं अपनों की तलाश में एक बच्ची भटक रही है. वो लावारिस पाई गई है. उसकी उम्र तकरीबन तीन साल है.

बच्ची के घर, मां-बाप किसी का अब तक कुछ पता नहीं चल पाया है.

उसके दोनों पांव में फ्रैक्चर है. पिछले नौ दिनों से उसका देहरादून के सरकारी अस्पताल में इलाज चल रहा है.

राहत और बचाव के लिये केंद्र से नियुक्त नोडल अधिकारी वी. के. दुग्गल और उत्तराखंड के मुख्य सचिव सुभाष कुमार बुधवार को खुद बच्ची का हाल लेने गए. मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भी उसे देखने जा चुके हैं.

मां पुकारती है

वी.के.दुग्गल ने बच्ची से मिलने के बाद बताया, “देश के सभी जिलाधिकारियों को बच्ची की फोटो समेत ईमेल भेजा गया है ताकि परिजनों का पता चले तो वे सूचना दे सकें.”

उन्होंने आगे बताया, “खुशी की बात ये है कि बच्ची की हालत में सुधार है. वैसे हमने डॉक्टरों से कहा है कि अगर जरूरत पड़ी तो बाल रोग विशेषज्ञ और मनोचिकित्सकों को बुलाया जा सकता है.”

इस बच्ची को 24 जून को एक गैर सरकारी संगठन की एंबुलेंस सेवा की मदद से देवप्रयाग के रास्ते लाया गया था. पहले उसे ऋषिकेष में रखा गया फिर देहरादून के जिला अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया. अब शासन ने उसे वीआईपी वार्ड में रखने के लिये कहा है.

दून अस्पताल में बच्ची की देखरेख कर रही निर्मला बहुगुणा ने बताया कि, “जब बच्ची को लाया गया था तो वह कुछ भी बोल नहीं पा रही थी. अब वह कभी-कभी मां पुकारती है और फिर गुमसुम सी हो जाती है.”

निर्मला ने आगे कहा, “हम उसे खिलौनों से बहलाने की कोशिश करते हैं.”

वह कहती हैं, “उसे टॉफी पसंद नहीं. कल से वो थोड़ा-थोड़ा चिप्स खा रही है. शौक से सिर्फ दाल-रोटी खाती है.”

पहचान

Image caption अंदाजा लगाया जा रहा है कि बच्ची मध्यप्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश या झारखंड की हो सकती है.

बच्ची को देखकर अंदाजा लगाया जा रहा है कि वो मध्यप्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश या झारखंड की हो सकती है.

लेकिन ये सिर्फ अंदाजा है. अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि वो उत्तराखंड घूमने आई थी या यहीं की रहने वाली है.

जब तक उसकी पहचान नहीं हो जाती तब तक निश्चित तौर पर ये भी नहीं कहा जा सकता कि उसका परिवार आपदा का शिकार हो गया या बात कुछ और है.

मगर वो सुर्खियों में छाई है और प्रदेश के निजाम से लेकर आम जन तक उसे देखने पंहुच रहे हैं.

वीआईपी ट्रीटमेंट

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्त्ता उषा नेगी को बच्ची को सरकार और प्रशासन की ओर से मिल रही खास ट्रीटमेंट से शिकायत है. वे कहती हैं कि, “एक बच्ची को तो वीआईपी ट्रीटमेंट दी जा रही है लेकिन आपदा के मारे ऐसे न जाने कितने लोग हैं जिन्हें मदद की जरूरत है.”

विडंबना ये है कि एक तरफ इस नन्ही सी जान का कोई अपना सामने नहीं आया है. और दूसरी तरफ हजारों लोग अभी भी अपने परिजनों की तलाश में दर दर भटक रहे हैं .

मां, पिता या अपने बच्चों की फोटो लिए लोग सरकारी दफ्तरों, चारधाम मार्ग और मीडिया संगठनों के चक्कर काट रहे हैं.

मिसिंग सेल

Image caption बाढ़ में 3000 से ज्यादा लोग लापता हैं.

उत्तराखंड में बनाए गए ‘मिसिंग सेल’ के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में आई प्रलयंकारी बाढ़ में अब तक 3000 से ज्यादा लोग लापता हैं.

इस बीच कई गैरसरकारी संगठनों ने बच्ची को गोद लेने की पेशकश की है.

मगर वी. के. दुग्गल ने कहा है कि, “अभी इस बारे में कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता. हम उसके माता-पिता को ढूंढने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. जब तक वे नहीं मिलते हमें यह सोचना है कि आगे इसका ध्यान कैसे रखना है.”

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