30 शब्दों के भीतर खुलती मध्य वर्ग की खिड़की

  • 5 जुलाई 2013
भारत का मध्य वर्ग

'एडजस्ट' होने के तुरंत बाद 'सेटल' होने का अरमान भारत की मिडिल क्लास को हमेशा था.

आज़ादी के बाद फली और बहुत फूली मिडिल क्लास का सफर उसे अक्सर अपनी जमीन से दूर करता रहा.

पहले पढ़ाई करने के लिए, फिर नौकरियों या कामकाज के लिए. जमीन से दूर होने के बाद भी यह वर्ग अपनी जड़ों से टूटना गवारा नहीं करता और ज़मीन से दूर होकर भी जड़ों से जुड़े रहने का एक ही रास्ता था -अपनी जाति में अपने मां-बाप की मर्जी से शादी करना.

वैवाहिक विज्ञापन एक अच्छी खिड़की है, समाज के इस केंद्रीय अनुष्ठान को देखने की. अख़बारों में बमुश्किल 28-30 शब्दों के जरिए अपनी बात रखने वाले वर्गीकृत (क्लासीफाइड) कई जगहों पर देखे जा सकते हैं.

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एक जिंदगी यहां दूसरी को ढ़ूंढती है. ज्यादातर विज्ञापन माता-पिता लगवाते हैं और 30 शब्दों में सब कुछ बता देने का हुनर सब में नहीं होता पर मध्य वर्ग को लेकर कुछ इस तरह के लक्षण वैवाहिक विज्ञापनों में अक्सर देखने में आते हैं.

वैवाहिक विज्ञापन

भारत दुनिया के सबसे खूबसूरत, भले, कमाऊ, छरहरे, साफसुथरी आदतों वाले, सुसंस्कृत लोगों की जगह है. शायद इसलिए भी कि विज्ञापन देने वाले माता-पिता या बड़े बुजुर्ग ज्यादा होते हैं. कोई भी आपराधिक पृष्ठभूमि वाला शख्स वैवाहिक विज्ञापन नहीं देता.

25 साल पहले सरकारी नौकरियों वाले लड़कों की मांग ज्यादा थी. फौजी अफसरों की भी. अब प्राइवेट सेक्टर में काम कर रहे लड़कों की पूछ ज्यादा है. आईटी सेक्टर में काम करने वाले की तूती बोलती है.

25 साल पहले चार अंकों में आय जता दी जाती थी, आजकल ये बातें उतनी नहीं कही जातीं. बहुराष्ट्रीय कम्पनी (एमएनसी) में काम करना रोब जताने की बात है. अप्रवासी भारतीय (एनआरआई) होने की ठसक भी जमाये बिना नहीं रहा जाता.

शरीफ और साफसुथरी आदतों वाले युवकों की मांग हमेशा रहती है.

ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है, जो अपनी शादी के खुद अपना विज्ञापन दे रहे हैं, बजाय अपने माता-पिता के जरिए.

ऐसा भी बहुत होता है कि अपनी बेटी के लिए वर ढूंढने वाला पिता शादी धूमधाम से करने का वायदा करता है. इसमें अगर आपको दहेज की पेशकश नजर आती है, तो आप गलत भी हो सकते हैं.

तलाक बढ़े हैं और दूसरी शादी करने की चाह रखने वाले लोगों की तादाद भी. कई बार उम्र की आधी सदी पार कर चुके लोगों के विज्ञापन भी देखे जा सकते हैं. बदलते समाज का यह एक और पहलू है.

आजकल ईमेल आईडी दी जाती है ताकि बाकी बातें वहां कर ली जाएं. पहले पोस्ट बॉक्स नम्बर था.

यह बहुत आम है कि लड़की का छरहरा और गोरा होना जरूर रेखांकित किया जाए. कई बार तो वजन और ऊंचाई भी. लड़कियों के गृहकार्य में निपुण होने पर बड़ा जोर होता है.

ऐसा बहुत होता है कि बहुत सी लड़कियां 'पारम्परिक मूल्यों वाली होती हैं, आधुनिक विचारों वाली' भी. 30 शब्दों में इस विरोधाभास का पूरा बखान मुमकिन नहीं है. अंदाजा लगाया जा सकता है. संभवतः यह विरोधाभास लड़कियों से ज्यादा मध्य वर्ग का है, जो अपने अतीत और भविष्य के बीच उसी तरह फंसा हुआ है, जैसा अपने साधनों और अरमानों के बीच.

यहां जन्मकुंडली की भी इतनी दादागिरी है कि मांगलिक लोगों का अपना एक अलग वर्ग है.

अपने आपको उभरती महाशक्ति की शक्ल में देखने वाला भारत शादियों के मामले अभी भी जातियों में बंटा हुआ है. जिनके लिए जाति बंधन नहीं है, वे बहुत कम हैं जाति को प्राथमिक मानने वालों में.

दलित वर्ग के वैवाहिक विज्ञापन में वे अपने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि उन्हें उनसे संबोधित करने पर पुलिस मामला दर्ज कर सकती है. अक्सर दलित युवक-युवतियों के विज्ञापन कॉस्मोपॉलिटन वर्ग में देखने को मिलते है, शायद उन लोगों के जो स्वयं को अपनी जातिविशेष की उलझनों से खुद को बाहर देखते हैं. यह वह वर्ग भी है, जो जाति सम्बंधी बेड़ियों से खुद को मुक्त कर चुके हैं.

भारत का मध्यवर्ग जिस तेजी से देश और उसके बाहर फैला है, उसके लिए भारत के सबसे सफलतम इंटरनेट कारोबारों में शादी में मदद करने वाले इंटरनेट पोर्टल भी हैं. यहां न तीस शब्दों की सीमा है, न समय की और अब तो दूसरी शादी का अरमान रखने वालों के लिए भी विकल्प हैं.

फैशन स्टेटमेंट

करीब 30 शब्दों के जरिए जिंदगी का हमसफर पाने वाले भारत में बहुत से लोग हैं और इनमें से ज्यादातर शहरी मध्यवर्ग के होते हैं. वर्गीकृत शादियां उनके खानपान, रस्मो रिवाज, रिश्तेदारियों और जाति विशेष पहचान को भी बरकरार रखती हैं.

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हमसफर मिलने का एक ऐसा पड़ाव, जिसमें बारात के आने, दूल्हे के घोड़े पर चढ़ने, दुल्हन के ब्यूटी पार्लर जाकर स्पेशल ब्राइडल पैकेज लेने, नाचने- गाने- ढोल बजाने- नागिन डांस के नाम पर नशे में बारातियों के सड़क पर लोटने के महत्वपूर्ण रिवाज शामिल हैं.

बॉक्स ऑफिस पर हिट होने और सुखांत वाली ज्यादातर फिल्में शादियों पर केंद्रित होती हैं और वह पलटकर फिर तय करती है कि इस सीजन की शादी में इस बार लोग क्या पहनेंगे.

अट्ठारह साल पहले पंकज मिश्रा की किताब 'बटर चिकन इन लुधियाना' में उत्तर प्रदेश में हुई एक शादी का जिक्र था, जिसमें हर बाराती ने अपनी शादी का सूट पहना हुआ था, जो कि उस बाराती की शादी के साल का फैशन स्टेटमेंट था.

अब ऐसा नहीं है. मिडिल क्लास बदल गया है और शादियां हमारे कपड़ों की तरह 'कंटम्प्ररी' हो गई हैं.

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