उत्तराखंड के 'प्रलय में डूबा' पर्यटन उद्योग

उत्तराखंड में बाढ़ से हुआ नुक़सान

जैसे ही स्कूलों में गर्मी की छुट्टियां शुरू होती हैं लोग पहाड़ों की ओर रुख़ करने लगते हैं.

अपनी जेब और पसंद के अनुसार कोई 'पहाड़ों की रानी' मसूरी तो कोई 'तालों के ताल' नैनीताल की ओर. इस बार भी यही हुआ 15 मई के बाद मसूरी सैलानियों से गुलजार हो गई, माल रोड और होटलों में पांव रखने की जगह नहीं रह गई और कारोबारियों के चेहरे खिल उठे.

पर्यटन का पीक सीजन चल ही रहा था कि अचानक पहाड़ में जलप्रलय आ गई और उसका असर मसूरी पर भी पड़ा. आज वहां माल रोड और होटलों में सन्नाटा पसरा हुआ है और स्थानीय कारोबारियों के चेहरे पर मायूसी और आशंकाओं के बादल तैर रहे हैं.

सिर्फ मसूरी ही नहीं नैनीताल हो या औली या फिर अल्मोड़ा- आपदा से आई तबाही को देख सैलानियों और श्रद्धालुओं ने उत्तराखंड से ही मुंह मोड़ लिया है.

होटलों में सन्नाटा

गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ- ये चारों धाम तो आपदा की चपेट में हैं ही लेकिन पहाड़ के वे पर्यटन स्थल जो इस आपदा से सीधे प्रभावित नहीं हैं, वे भी इसके शिकार बन गए हैं. कोई भी पहाड़ नहीं आना चाह रहा, लोगों ने अपनी बुकिंग रद्द करा दी है और यहां घूमने आए लोग समय से पहले वापस चले गए हैं.

होटल, ढाबे और टैक्सी कारोबारी विचलित हैं कि आने वाले कम से कम दो-तीन साल तक उनकी रोजी-रोटी कैसे चलेगी.

देहरादून में एक बड़ी ट्रैवल एजेंसी के मालिक देवेंद्र सिंह चढ्ढा कहते हैं, “हमारा बिजनेस तो जीरो हो गया है. आप बताओ न उत्तराखंड में अब बचा ही क्या है. यही दो महीने होते थे जब हमारी साल भर की कमाई हो जाती थी. हमारा 90 प्रतिशत बिजनेस गढ़वाल से था."

देवेंद्र सिंह के अनुसार, "लोगों का शौक था हिल स्टेशन जाना लेकिन आज यहां कौन टूरिस्ट आना चाहता है? बहुगुणा सरकार की तरफ से तो कोई मदद है ही नहीं और बाकी, मीडिया में आ रही खबरों से लोग डर गए हैं."

चौपट हुआ कारोबार

एक दूसरी ट्रैवल एजेंसी के मालिक राकेश कुमार कहते हैं, “अब तो कुछ गाड़ियां सरेंडर करके बैठेंगे. सरकार को लिखकर दे देंगे और चक्कों की हवा निकाल देंगे. आप ही बताओ जब बिजनेस ही नहीं है तो टैक्स कहां से देंगे. हमारा तो काम ही चौपट हो गया.”

यही हाल होटल और लॉज मालिकों का है. जोशीमठ में एक गेस्ट हाउस चलाने वाले विनय डिमरी कहते हैं, “हर साल बद्रीनाथ आने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही थी. इसलिए पिछले साल लोन लेकर गेस्ट हाउस में और कमरे बनवाए थे. आज कमरे खाली पड़े हैं. मैंने अपने यहां रसोइए, वेटर, केयर टेकर सबकी छुट्टी कर दी है. लगता है कोई और काम देखना पड़ेगा. अब लोन की किस्त भी कैसे चुकाएंगे.”

मसूरी के पिक्चर पैलेस में एक होटल के मैनेजर का कहना है कि, “फिलहाल तो स्थिति ये है कि हम डिस्काउंट भी देंगे तो भी कोई नहीं आएगा.”

होटल मालिकों और टैक्सी चालकों के अलावा पर्यटन से जुड़े लाखों चाय वाले, ढाबे वाले, यहां तक कि पर्यटकों की वजह से मोटी कमाई करने वाले स्थानीय डॉक्टर और साज-सामान बेचने वाले लोगों का काम भी चौपट हो गया है.

'12 हज़ार करोड़ का नुकसान'

पीएचडी चैंबर्स ऑफ कॉमर्स की रिपोर्ट के अनुसार पर्यटन उद्योग में आई इस गिरावट से इस साल कम से कम 12000 करोड़ के नुकसान का अनुमान है. पर्यटन, उत्तराखंड का सबसे तेजी से बढ़ रहा उद्यम था जहाँ हर साल इसकी बढ़ोत्तरी की दर 25 से 30% थी लेकिन आपदा ने सारी संभावनाओं पर ग्रहण लगा दिया है.

उत्तराखंड में बाढ़ और भूस्खलन की विभीषिका में जान और माल की असाधारण क्षति हुई है. सैकड़ों मारे गए, हजारों अब भी लापता हैं और पाँच लाख से ज्यादा प्रभावित हुए हैं लेकिन इस आपदा ने उत्तराखंड की आर्थिक स्थिति के सबसे बड़े आधार पर्यटन को जिस तरह से उजाड़ दिया है और इससे जुड़े छोटे-बड़े कारोबारियों की रीढ़ तोड़ दी है उससे अब इनके लिए भी राहत पैकेज की मांग की जाने लगी है.

उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद के सदस्य संदीप साहनी कहते हैं, “पर्यटन कारोबार में 80 प्रतिशत गिरावट है और इसे देखते हुए कम से कम एक साल के लिए होटलों को टैक्स में छूट दी जाए और बैंक से लिए गए लोन पर ब्याज माफ़ किया जाए.”

'दो साल तक रहेगा सन्नाटा'

पिछले सप्ताह केंद्रीय पर्यटन मंत्री चिरंजीवी उत्तराखंड आए थे और उन्होंने चार धाम यात्रा मार्ग और चारों धामों के नए सिरे से पुनर्निमाण के लिए 195 करोड़ के पैकेज की घोषणा की है लेकिन आशंका जाहिर की जा रही है कि कम से कम अगले दो साल तक पर्यटकों को वापस उत्तराखंड की ओर खींचना मुश्किल होगा.

एक समय ऐसा भी था जब जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं से वहां का पर्यटन उद्योग बैठ गया था और इसका फायदा उत्तराखंड की वादियों को मिला था जहां पर्यटन चमक गया था लेकिन आज आपदा के आतंक से यहां के पर्यटन उद्योग की वही स्थिति हो गई है जो उन दिनों जम्मू-कश्मीर की थी.

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