बुढ़ापे का सहारा बेटा ही क्यों बने?

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केएस शेखर और उनकी पत्नी मंजुला शेखर हर महीने स्काइप के ज़रिए अपने बेटे किशोर के साथ संपर्क साधते हैं, जो मीलों दूर ब्रिटेन में रहते हैं.

हमेशा की तरह आज भी बेटे से उनका पहला सवाल वही है, “कैसे हो किशोर? भारत कब आ रहे हो हमसे मिलने?”

किशोर उधर से जवाब देते हैं कि वे आजकल काम में व्यस्त हैं और फिलहाल कह नहीं सकते कि भारत कब आना होगा.

किशोर ब्रिटेन में एक डॉक्टर हैं और अपने काम और छोटे से परिवार की ज़िम्मेदारियों के साथ काफी व्यस्त रहते हैं.

उनके जवाब से उनके पिता केएस शेखर निराश नहीं हैं. आखिरकार वे अपने बेटे से ये उम्मीद नहीं रखते कि वे उनकी वृद्धावस्था में उनका ख़्याल रखें.

जब उनके दोनों बेटे विदेश जाकर बस गए, तो कर्त्तव्यनिष्ठ भारतीय बेटों की तरह उन्होंने अपने माता-पिता को अपने साथ आकर रहने को कहा.

लेकिन के एस शेखर ऐसा नहीं चाहते थे.

वे कहते हैं, “मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि रिटायरमेंट के बाद मैं अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीना चाहता था. मुझे और मेरी पत्नी को किताबें पढ़ना पसंद है, हमें प्रकृति का आनंद लेना पसंद है और अपने ही तरह के लोगों के साथ बातें करना पसंद है. अगर मैं अपने बेटों के साथ रहता, तो वो मेरी ज़िंदगी पर राज करते, लेकिन ये मुझे गवारा नहीं था.”

समाज का डर

भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में एक बेटे का कर्तव्य समझा जाता है कि वो अपने माता-पिता की वृद्धावस्था में उनका सहारा बने.

समाजशास्त्री पेट्रीशिया ओबरॉय कहती हैं, “विदेश में बुज़ुर्गों को इस बात का डर रहता है कि उन्हें अपने बच्चों पर निर्भर न होना पड़े लेकिन भारत में स्थिति विपरीत है. यहां बुज़ुर्गों को लगता है कि जिस तरह से उनके बच्चे अपनी जवानी के दिनों में उन पर निर्भर थे, उसी तरह वृद्धावस्था में उनका अधिकार है कि वे अपने बच्चों से अपनी सेवा करवाएं.”

ऐसे में ज़ाहिर है कि जब किशोर के माता-पिता ने उनसे अलग रहने का फैसला किया, तो उन्हें इस बात की चिंता सताई कि लोग क्या कहेंगे.

स्काइप के ज़रिए बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “जब मेरे मां-बाप ने अलग रहने का फैसला किया, तो मैं खुद को दोषी मानने लगा. थोड़े दिनों बाद मुझे एहसास हुआ कि वे अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से बिताना चाहते हैं. मैं नहीं चाहता कि ये आज़ादी मैं उनसे छीनूं. अब मुझे लगता है कि आधुनिक भारतीय परिवार में वो दिन गए जब मां-बाप अपने बेटे के साथ रहना चाहते थे.”

शान भरी रिटायरमेंट

शेखर दंपती की तरह भारत में कई बुज़ुर्ग संयुक्त परिवार से दूर हट कर अपनी ही शर्तों पर ज़िंदगी बिताना चाहते हैं, इसलिए रिटायर होने के बाद वे ऐसे शानदार रिटायरमेंट होम का रुख कर रहे हैं, जिसमें वे अपनी बची ज़िंदगी बिना किसी तनाव के बिताना चाहते हैं.

शेखर दंपती बंगलौर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर 30 एकड़ ज़मीन पर फैले ‘सुविधा रिटायरमेंट समुदाय’ में रहते हैं, जहां केवल बुज़ुर्गों के लिए 200 कॉटेज बनाए गए हैं.

यहां इन्हें सुविधाएं भी मिलती हैं और जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं आसानी से पूरी हो जाती है.

यहां उन्हें चिकित्सकीय सुविधाएं, व्हील चेयर, हेल्थ क्लब, वृद्धों के लिए खास बनाई गई रूम फिटिंग और सामूहिक रसोई जैसी सुविधाएं मिलती हैं.

के एस शेखर कहते हैं, “मेरे लिए यही मेरी ज़िंदगी का सुख है. यहां हम सभी बूढ़े लोग आपस में खूब बातें करते हैं, हंसी-मज़ाक करते हैं. इसलिए मैं ऐसी ज़िंदगी चाहता था.”

इस रिटायरमेंट समुदाय में ऐसे लोग हैं जो प्रॉफेसर, इंजीनियर, डॉक्टर और बड़ी-बड़ी कंपनियों के महानिदेशक रह चुके हैं.

उच्च-मध्यम वर्गीय परिवारों के बुज़र्गों के बीच ऐसे रिटायरमेंट घरों में रहने का चलन अब बढ़ रहा है क्योंकि वे वृद्धाश्रम में नहीं रहना चाहते. आखिरकार वृद्धाश्रम में उन्हें वो तमाम सुविधाएं और ऐशो-आराम नहीं मिल पाता, जिनका सुख उन्होंने हमेशा भोगा है.

बिल्डरों की चांदी

ज़ाहिर है कि बिल्डरों ने इस चलन की पहचान कर ली है और जगह-जगह ऐसे रिटायरमेंट होम बनाने शुरु कर दिए हैं, जो बुज़ुर्गों के मन-माफिक हों.

यूं तो बिल्डरों ने बुज़ुर्गों की इस चाहत को चंद सालों पहले ही पहचान लिया था लेकिन हाल-फिलहाल में उन्होंने इस क्षेत्र में काफी तेज़ी से काम करना शुरू कर दिया है.

कोवई सीनियर केयर कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटिड के महानिदेशक ए श्रीधरण का कहना है, “भारत में आज वरिष्ठ नागरिकों की जनसंख्या 10 करोड़ है. उसका पांच प्रतिशत अगर उच्च-मध्यम वर्गीय लगा लिया जाए, तो पांच लाख ऐसे वरिष्ठ नागरिक हैं जो ऐसे घरों का रुख कर रहे हैं. ज़ाहिर है रियल एस्टेट को इस वर्ग में फ़ायदा ही फ़ायदा दिखाई दे रहा है.”

बंगलौर, चेन्नई, कोयंबटूर, पुणे, हैदराबाद, हरिद्वार व ऋषिकेष जैसे इलाकों में ऐसे रिटायरमेंट होम बनाए जा रहे हैं, जिनकी कीमत आठ लाख से लेकर 10 करोड़ रुपये के बीच है.

मगर विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय रियल एस्टेट क्षेत्र के पास वृद्धों की देखभाल के लिए पर्याप्त संवेदना और विशेषज्ञता नहीं है.

ए श्रीधरण कहते हैं, “अमरीका में उन्हीं रियलटरों को वृद्धों को घर मुहैया करवाने की इजाज़त दी जाती है जो इसके लिए योग्य हैं लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है. रियल एस्टेट कंपनियां वरिष्ठ नागरिकों के लिए घर तो बना देती हैं लेकिन उसके बाद उनके आखिरी दिनों में ज़रूरत की सुविधाएं प्रदान नहीं करतीं. मेरे हिसाब से रियल एस्टेट को बुज़ुर्गों की देखभाल के क्षेत्र से दूर रहना चाहिए.”

सिर्फ भारत के बिल्डर ही नहीं, बल्कि ऐसे विदेशी निवेशकों की भी कोई कमी नहीं, जो इस क्षेत्र में पैसा लगा रहे हैं लेकिन पर्याप्त कानून के अभाव में वे फिलहाल संशय में हैं और इस उभरते क्षेत्र को दूर से ही देख रहे हैं.

‘मरने की कला’

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वरिष्ठ नागरिकों की जनसंख्या 2050 में तिगुनी हो जाएगी.

विश्लेषकों का कहना है कि सरकारी सेवाओं के अभाव में और बच्चों के बढ़ते पलायन के बीच वृद्धों को अपनी देख-रेख के नए तरीके ढूंढने होंगे.

आने वाले दिनों में रिटायरमेंट होम कम से कम अमीर वृद्घों के ढलते दिनों का सहारा बन सकते हैं.

ठीक वैसे ही जैसे कि के एस शेखर और उनकी पत्नी की ज़िंदगी का सहारा बना ‘सुविधा रिटायरमेंट समुदाय’.

ढलते सूरज की ओर कदम बढ़ाते हुए वे कहते हैं, “मज़ा इसमें नहीं कि ज़िंदगी को आपने कैसे जिया, सवाल इसका है कि मौत को आपने कितनी खूबसूरती से गले लगाया.”

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