18 दिन बाद मौत की घाटी से कैसे निकले ट्रक ड्राइवर

उत्तराखंड बाढ़, जीवित बचे ट्रक ड्राइवर

"जब उफनती अलकनंदा का पानी अपने साथ पत्थर और मलबा लेकर आया तो वो बेहद तेज़ रफ़्तार से आकर टकराया था. इसकी वजह से वहां पूरे इलाके में भारी तबाही हुई."

ये कहना है पंजाब से उत्तराखंड में हेमकुंड साहिब गए लगभग 150 से ज्यादा ड्राइवरों का जो 18 दिन तक गोविन्द घट में फंसे रहने के बाद शनिवार को आखिरकार वहां से निकलने में कामयाब हुए.

सेना, आईटीबीपी और सीमा सड़क संगठन ने कई दिनों की मशक्क़त के बाद जोशीमठ और गोविन्द घाट के बीच ध्वस्त हुए रास्ते की मरम्मत कर उसे शनिवार को जब खोला तो इन ड्राइवरों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था.

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इन गाड़ियों में मिनी बसों के अलावा छोटे वाहन भी थे जिस पर बैठकर पंजाब से यात्री हेमकुंड साहिब पहुंचे थे.

बीबीसी से बात करते हुए इस क़ाफिले में शामिल कई ड्राईवरों की आँखें भर आईं क्योंकि 16 जून की रात जब उफनती हुई नदी ने तांडव मचाया तो इनके कई साथियों को बचने का मौक़ा भी नहीं मिल सका.

सँभलने का मौक़ा

गोविन्द घाट की पार्किंग में खड़ी लगभग 60 से ज्यादा गाड़ियाँ बहते हुए मलबे की ज़द में आ गईं जो इन्हें अपने साथ बहाकर ले गया. ये गाड़ियाँ कहाँ हैं, किसी को नहीं पता.

गोविन्द घाट से नई ज़िन्दगी लेकर निकले ड्राइवरों का कहना है कि जो गाड़ियाँ बह गईं उनमें से कइयों में ड्राइवर और यात्री सो रहे थे.

पंजाब के तरन-तारन से आए गुरदेव सिंह ने बीबीसी को बताया कि जब नदी पहाड़ों को चीरती हुई आकर टकराई तो रात के एक बज रहे थे. इसीलिए गाड़ियों में सोने वाले ड्राइवरों को सँभलने का मौक़ा भी नहीं मिल सका.

हालांकि रात में ही गुरुद्वारे के माइक से चेतावनी दी जाने लगी कि सभी लोग उपरी इलाकों में चले जाएँ क्योंकि तेज़ रफ़्तार से नदी सबकुछ लपेटती हुई आगे बढ़ रही है.

अमृतसर से आए एक अन्य ड्राइवर सुखविंदर सिंह का कहना था, "बारिश तो तीन दिनों पहले से हो रही थी. मगर 16 जून की रात को बहुत ही ज्यादा पानी आ गया. लोगों ने गुरुद्वारे के माइक से दी जा रही चेतावनी को नहीं माना. नीचे पार्किंग में 150 से ज्यादा गाड़ियाँ थीं जो सब बह गईं."

घटना के बाद सभी यात्री गोविन्दघाट के इलाके में फँस गए थे क्योंकि जोशीमठ से आने वाली सड़क भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी.

सड़क मार्ग ध्वस्त

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान और सेना के जवानों ने यात्रियों को हेलीकॉप्टर से सुरक्षित जगहों पर पहुंचा दिया. मगर, वाहनों के साथ आए ड्राइवर वहीं फंसे रह गए क्योंकि वो रास्ते के खुलने का इंतज़ार करते रहे ताकि वाहनों को वापस लेकर जा सकें.

मगर गोविन्द घाट में फंसे इन ड्राइवरों के लिए 18 दिनों का अरसा ज़िन्दगी का सबसे मुश्किल इम्तेहान था. इस दौरान किसी की जेब में पैसे थे तो किसी की जेब खाली. अपने अनुभव सुनाते सुनाते इनमे से कइयों की आँखें भर आती थीं.

कुछ एक ड्राइवरों का कहना था कि उन्होंने कभी खाया तो कभी भूखे रहकर वक़्त गुज़ारा क्योंकि इस इलाके में राहत काफी देर से पहुँच पाई. सड़कें ध्वस्त हो जाने की वजह से राहतकर्मी यहाँ तक नहीं पहुँच पा रहे थे. बाद में सेना ने हेलीकॉप्टर से रहत सामग्री पहुंचाई.

इस काफ़िले में कई पंजाब के लोग भी हैं जो गोविन्द घाट में दुकानें चलाया करते थे और वो भी इस इलाके में फंसे थे. इनमे मजेंद्र सिंह हैप्पी भी हैं जिनकी दुकान 16 जून की तबाही में तहस नहस हो गई.

हैप्पी नें सोचा था कि इस साल इतनी संख्या में श्रद्धालु हेमकुंड साहिब पहुंचे थे तो अच्छा व्यवसाय होगा. मगर आज उनके पास अपने कपड़ों के एक बैग के अलावा कुछ नहीं है. उनका सबकुछ ख़त्म हो गया है.

हैप्पी कहते हैं, "जो थोड़ा बहुत बचा भी था तो वो नेपाली मजदूर लूट कर ले गए. मुझे अफ़सोस तो है कि सबकुछ चला गया. मगर ख़ुशी ज्यादा है कि मैं जिंदा हूँ."

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