एक समय बच्चों का नाम प्राण नहीं रखा जाता था

ज़जीर का पोस्टर

हिंदी सिनेमा के हरदिल अज़ीज़ खलनायक और चरित्र अभिनेता प्राण की ज़िंदगी की कहानी कुछ इस तरह की है जिससे लोग प्रेरणा ले सकते हैं.

दर्शकों में वो अपने किरदार के प्रति नफ़रत पैदा कर देते थे लेकिन कहा जाता है कि पर्दे से परे वो बहुत ही बड़े दिल के व्यक्ति थे.

बँटवारे से पहले उन्होंने अपना करियर बतौर फोटोग्राफर शुरू किया था और फिर इत्तेफाकन उनकी मुलाकात एक फिल्म निर्माता से हुई.

नहीं रहे प्राण

इसके नतीजे में साल 1940 में ‘यमला जट’ फिल्म में पहली बार प्राण बड़े पर्दे पर अवतरित हुए. यह सफर साठ दशकों तक चलता रहा. अभिनेता प्राण की जिंदादिली और संजीदा मिजाज को उनके चाहने वाले लोग बेहद पसंद करते थे.

उनका जन्म एक सरकारी ठेकेदार लाला केवल कृष्ण सिंकद के घर 12 फरवरी 1920 को दिल्ली में हुआ था. नसैर्गिक प्रतिभा के धनी कलाकार कहे जाने वाले प्राण की पढ़ाई-लिखाई कपूरथला, उन्नाव, मेरठ, देहरादून और रामपुर जैसे शहरों में हुई.

उनके पिता सड़कें और पुल बनाया करते थे. कहा जाता है कि देहरादून शहर का कलसी ब्रिज लाला केवल कृष्ण सिकंद ने ही बनावाया था. साल 1945 में प्राण की शादी शुक्ला से हुई जिनसे उन्हें दो बेटे अरविंद और सुनील व एक बेटी पिंकी हुईं.

खलनायकी

बँटवारे के बाद अभिनेता प्राण को अपना फिल्मी करियर मुंबई आकर दोबारा से शुरू करना पड़ा. मुंबई में प्राण को कई दुश्वारियों का सामना करना पड़ा. काम मिलने में मुश्किल हो रही थी और वे लगभग अपनी हिम्मत छोड़ चुके थे लेकिन उनकी मुलाक़ात लेखक सादत हसन मंटो से हुई. जिन्होंने उन्हें देव आंनद अभिनीत फिल्म जिद्दी में रोल दिलाने में मदद की.

यह साल 1948 की बात है. इसके बाद प्राण ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. अपने करियर में उन्होंने 400 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया. बड़े पर्द पर उनकी अदाकारी दर्शकों पर ग़ज़ब का असर डालती थी.

अभिनय की प्राण की शैली ने बड़े पर्दे पर खलनायकी की किरदार को अलग तरीक़े से गढ़ा और उसे एक नया आयाम दिया. प्राण के करियर की प्रमुख फिल्मों में कश्मीर की कली, खानदान, औरत, बड़ी बहन, जिस देश में गंगा बहती है, हॉफ टिकट, उपकार, पूरब और पश्चिम और डॉन हैं.

हरदिल अजीज खलनायक

कहते हैं कि प्राण की खूबसूरती ने उनकी अदाकारी को नया रंग दिया था. पर्दे पर उनकी मौजूदगी डर पैदा करती थी और इस डर का यह आलम था कि लोगों ने एक समय अपने बच्चों के नाम प्राण रखना छोड़ दिया था.

यादगार भूमिकाएँ

कहा जाता है कि ‘राम और श्याम’ जैसी फिल्में देखकर लोग उनसे डरने लगे थे, उनसे नफरत करने लगे थे. वे शायद सिल्वर स्क्रीन के उन गिने चुने खलनायकों में से थे जिन्हें दर्शकों में सबसे ज्यादा नफरत मिली हो लेकिन उपकार के मंगल चाचा, जंजीर के शेर खान और गुलजार की परिचय में नरमदिल दादा जी के किरदार भी हैं जिन्हें पीढ़ियों तक याद रखा जाएगा.

यह प्राण की अदाकारी ही थी कि मनोज कुमार की उपकार में उन्होंने मलंग चाचा के किरदार को यादगार बना दिया और लोग उनसे मोहब्बत करने लगे. प्राण की दुनिया केवल फिल्मों तक ही सीमित नहीं थी. उन्हें खेलकूद में भी बेहद दिलचस्पी थी.

पचास के दशक में उनके पास अपनी एक फुटबॉल टीम हुआ करती थी. अभिनेता प्राण को उनके जीवन काल में कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. फिल्म इंडस्ट्री में 60 सालों के अपने करियर से वे संतुष्ट थे और कहा करते थे कि वे अगले जन्म में फिर से प्राण बनना चाहेंगे.

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