'मोदी से जुड़ी हर बात 2002 पर जाती है'

नरेंद्र मोदी
Image caption मोदी के "कुत्ते के पिल्ले के मरने पर भी दुख होता है" बयान के बाद हंगामा मच गया है

नरेन्द्र मोदी भारत के ध्रुवीकारी नेताओं में सबसे आगे हैं, इसे मान लिया जाना चाहिए. उनका समर्थन और विरोध लगभग समान आक्रामक अंदाज़ में होता है. इस वजह से उन्हें ख़बरों में बने रहने के लिए अब कुछ नहीं करना पड़ता.

ख़बरों को उनकी तलाश रहती है. इसमें आक्रामक समर्थकों से ज़्यादा उनके आक्रामक विरोधियों की भूमिका होती है.

दूसरी बात यह कि उनसे जुड़ी हर बात घूम फिर कर सन 2002 पर जाती है. रॉयटर्स के रॉस कॉल्विन और श्रुति गोत्तीपति का पहला सवाल इसी से जुड़ा था. वे जानना चाहते थे कि नरेन्द्र मोदी को क्या घटनाक्रम पर कोई पछतावा है.

नरेन्द्र मोदी के रॉयटर्स को दिया इंटरव्यू पढ़िए

पिल्ले का रूपक

मोदी का वही जवाब था जो अब तक देते रहे हैं. उनका कहना था, "फ्रस्टेशन तब आएगा जब मैने कोई ग़लती की होगी. मैंने कुछ ग़लत किया ही नहीं."

कुत्ते के पिल्ले का रूपक मोदी ने अपमानजनक रूप में इस्तेमाल किया या सहज भाव से इस पर एक राय कभी सम्भव नहीं होगी. कहना मुश्किल है कि मोदी शेर के बच्चे का रूपक लेते तब भी यही प्रतिक्रिया होती या नहीं.

2012 में मोदी की इंटरव्यू का ऑडियो सुनिए

इतना स्पष्ट है कि यह जवाब न होता तो एक साधारण सा इंटरव्यू चर्चा का इतना बड़ा विषय न बन पाता. मोदी को नकारात्मक बातें चर्चा का विषय बनाती हैं, जैसे सन 2007 में सोनिया गांधी के ‘मौत का सौदागर’ ने बनाया.

मोदी के इस इंटरव्यू में पोलराइज़ेशन, सेक्युलरिज्म और आलोचना सहने को लेकर सवाल भी थे, पर उन पर चर्चा नहीं हो पाई.

रॉयटर्स के इंटरव्यू में मोदी ने ख़ुद को हिन्दू और हिन्दू राष्ट्रवादी बताया तो नया क्या किया? इससे बेहतर और साफ़ बातें उन्होंने पिछले साल शाहिद सिद्दीक़ी से उनके उर्दू अख़बार नई दुनिया के लिए कही थीं.

मैने तो तभी माफ़ी माँगी

मोदी ने उसमें कहा था, " मुसलमान को भी आगे बढ़ने का उतना ही मौक़ा मिलना चाहिए, जितना किसी हिंदू को. अगर मनमुटाव हो तो एक घर भी नहीं चल सकता. एक बहू अच्छी लगे और दूसरी न लगे तो घर में सुकून नहीं हो सकता."

( नरेंद्र मोदी ने टोपी क्यों नहीं पहनी)

Image caption नरेंद्र मोदी बीजेपी के चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष हैं और प्रधानमंत्री पद के दावेदार माने जा रहे हैं

मोदी ने कहा था, "2004 में मैंने एक इंटरव्यू में कहा था मुझे क्यों माफ़ करना चाहिए? अगर मेरी सरकार ने यह दंगे करवाए, तो उसे बीच चौराहे पर फांसी लगनी चाहिए...अगर राजनीतिक कारणों से मोदी को गाली देनी है तो इसका मेरे पास कोई जवाब नहीं है...आज माफ़ी मांगने का क्या मतलब है. मैंने तो उसी वक़्त ज़िम्मेवारी ली. अफ़सोस किया माफ़ी मांगी...आप यह तो लिखिए कि हम दस सालों से मोदी के साथ अन्याय कर रहे हैं."

नरेन्द्र मोदी का वह इंटरव्यू मीडिया में चर्चा का विषय अपने कंटेंट के कारण नहीं बना था, बल्कि इसलिए बना कि समाजवादी पार्टी से जुड़े एक पत्रकार के उर्दू अख़बार में वह छपा. उस इंटरव्यू के कारण शाहिद सिद्दीक़ी को पार्टी से हटा दिया गया.

कार की पिछली सीट

शुक्रवार की दोपहर से रात साढ़े आठ बजे तक नरेन्द्र मोदी का 'पिल्ला प्रकरण' भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर हावी रहा. फ़िल्म अभिनेता प्राण की ख़बर आने के बाद हवा का रुख़ बदल गया.

नरेन्द्र मोदी आमतौर पर कार में आगे की सीट पर ड्राइवर के साथ बैठते हैं. उन्होंने रायटर्स के इंटरव्यू में पीछे की सीट का हवाला क्यों दिया? इंटरव्यू के उस अंश को सुनें या रायटर्स की वेबसाइट पर उसे जाकर पढ़ें तो समझ में आता है.

उनका कहना था जब आप ड्राइव करते हैं, तब ड्राइवर कहलाते हैं. पर जब आप पीछे की सीट पर बैठे होते हैं, तब भी ‘पेनफुल’ होता है. अपनी बात पर वज़न रखने के लिए उन्होंने दो बार होता है, होता है बोला.

दिक्क़त यह है कि नरेन्द्र मोदी से हम कुछ ख़ास सुनना चाहते हैं. वह न बोलें तो जो बोला गया है, उसमें से कुछ ख़ास निकालते हैं. मोदी के इस इंटरव्यू पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए कांग्रेस को संवाददाताओं से बात करनी पड़ी, यह क्या ख़ास नहीं है?

मीडिया की देन

Image caption नरेंद्र मोदी के विरोधी उन्हें कार्पोरेट जगत की देन बताते हैं

मोदी के ऑडियंस में उनके समर्थक ही नहीं बड़ी संख्या में विरोधी भी है, जो मानते हैं कि मोदी मीडिया की ‘क्रिएशन’ हैं. भाजपा और जेडीयू का रिश्ता टूटने के बाद नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी के बारे में कहा था कि सब मीडिया का बनाया हुआ है.

मोदी को उनके विरोधी, कॉरपोरेट जगत की देन भी मानते हैं. शायद विरोध का एक कारण यह भी है, पर इसमें नफ़रत से ज्यादा ईर्ष्या का भाव है. कॉरपोरेट जगत से कांग्रेस का रिश्ता क्या मोदी के रिश्ते से कमतर है?

नरेन्द्र मोदी को शिकायत रही है कि देश का मीडिया, ख़ासतौर से अंग्रेज़ी मीडिया 2002 के गुजरात दंगों पर सारा ध्यान केन्द्रित करके उनकी लगातार नकारात्मक कवरेज करता रहा. खाद्य सुरक्षा क़ानून, शिक्षा के अधिकार और चुनाव सुधार पर हमारे राजनेताओं की उतनी बाइट नहीं होंगी, जितनी नरेन्द्र मोदी पर हैं.

एजेंडा मीडिया के हाथ

सही या ग़लत, भारतीय टेलीविज़न राजनीतिक एजेंडा तय करने लगा है, जो चिंता का विषय है. सन 2002 में भारत के नए-नवेले 24X7 चैनलों को गुजरात में कुछ काम करने को मिला. और उस हिंसा के बीच से अनेक महत्वपूर्ण ख़बरें निकल कर आईं.

पर पिछले साल असम में हुई साम्प्रदायिक हिंसा के बीच से वे ख़बरें निकल कर नहीं आईं, क्योंकि वहाँ मीडिया कवरेज उतना सघन नहीं था. सन 1984 के सिख दंगों या भोपाल त्रासदी के वक़्त या 1993 के मुम्बई विस्फोटों और देश भर में फैले साम्प्रदायिक दंगों के समय भारतीय मीडिया अपने ख़ोल से बाहर नहीं निकला था.

छह दिसम्बर 1992 को अयोध्या से किसी क़िस्म की लाइव कवरेज नहीं हो रही थी. हालांकि तब तक हांगकांग के रास्ते आकाश मीडिया भारत में प्रवेश कर गया था, पर अयोध्या की टीवी कवरेज में विजुअल्स नहीं थे और न रात के ‘शो’ की आवेशभरी मगज़मारी थी.

भारत में इंटरनेट की शुरूआत 1995 में हुई. उसके पहले उसी साल नौ फ़रवरी को सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फ़ैसला सुनाया कि हवा की तरंगों पर किसी का विशेषाधिकार नहीं है. उस वक़्त भारत में टीवी प्रसारण के तीन दशक पूरे होने ही वाले थे.

दूरदर्शन के राष्ट्रीय नेटवर्क को शुरू हुए बारह साल और कुछ महीने ही हुए थे. बहरहाल फ्री एयरवेव्स वाला फ़ैसला क्रांतिकारी था.

तिल का ताड़

Image caption नरेंद्र मोदी के साथ ही कई नेताओं की छवि बनाने में मीडिया की अहम भूमिका है

इस फ़ैसले ने ऐसे मौक़े तैयार किए जब मीडिया ने तिल का ताड़ बना दिया. मुकुटनाथ से लेकर बोरवैल में गिरे प्रिंस और गुड़िया की व्यथा कथा ने मीडिया के असंतुलित पक्ष को उजागर किया.

इस फ़ैसले की पहली परीक्षा सन 1999 के करगिल युद्ध में हुई. जुलाई 2001 में जब परवेज़ मुशर्रफ़ आगरा शिखर सम्मेलन के लिए भारत आए तो उन्होंने मौक़ा देखकर भारतीय सम्पादकों का सम्मेलन कर लिया.

वे भारतीय मीडिया की कवरेज से इतना ख़ुश हुए कि उन्होंने अपने यहाँ भी मीडिया के दरवाज़े खोलने का जतन शुरू कर दिया. और अब पाकिस्तानी चैनलों में भी देर रात तक मगज़मारी होती रहती है.

नरेन्द्र मोदी को या उनकी छवि को ‘बनाने’ में मीडिया की बड़ी भूमिका है. पर यह बात नीतीश कुमार और लालू यादव पर भी लागू होती है. और ममता बनर्जी पर भी. मीडिया के आलोचक सब हैं, पर उसकी मदद सबको चाहिए. उसकी आलोचना किसी को पसंद नहीं. मनमोहन से मोदी तक.

सन 2004 की 18 मई को 24 अकबर रोड पर भी दिन भर मीडिया की निगाहें थीं. कांग्रेस कार्यकर्ताओं से सड़क पटी पड़ी थी. पार्टी के कार्यकर्ता गंगाचरण राजपूत कैमरा सामने आते ही अपनी कनपटी पर रिवाल्वर तान रहे थे कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं बनीं तो ख़ुद को ख़त्म कर लेंगे.

मीडिया ने यह स्थापित किया कि सोनिया गांधी ने बहुत बड़ा त्याग किया है. पिछली जनवरी में जयपुर के मंच पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी का भावुक संवाद भी ऐसा ही था.

जब मीडिया की नज़र पड़ती है तो अन्ना हज़ारे का आंदोलन देश भर पर छा जाता है. और जब नहीं पड़ती तो असम के साम्प्रदायिक दंगों को लोग याद नहीं रख पाते.

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