सुप्रीम कोर्ट और संसदीय राजनीति की खींचतान

राजनीति और कार्यपालिका की गंदगी साफ़ करने की जब-जब कोशिश हुई है तब-तब राजनीतिक वर्ग ने अदालत को चुनौती दी है.

अब एक बार फिर न्यायपालिका और विधायिका आमने-सामने हैं.

दस और ग्यारह जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग दो महत्वपूर्ण निर्णय दिए. 85 साल की वृद्ध महिला लिली थॉमस की याचिका पर अदालत ने संविधान की उस धारा को ख़ारिज कर दिया जिसके तहत सांसद और विधायक निचली अदालत से दोषी साबित हो जाने के बावजूद न सिर्फ़ सदन में अपना कार्यकाल पूरा करते हैं, बल्कि आगे भी चुनाव लड़ते रहते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी सुविधा को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया. जन प्रतिनिधित्व क़ानून में 1989 में यह धारा जोड़ी गई थी ताकि आरोपी जनप्रतिनिधियों की मदद की जा सके.

अदालत का दखल

एक दूसरे निर्णय के तहत सुप्रीम कोर्ट ने 11 जुलाई को कहा कि जेल या हिरासत में पहुंच चुका कोई व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता.

इससे पहले अदालत ने माना कि हिरासत में रह कर कोई व्यक्ति जब वोट नहीं डाल सकता, तब वह चुनाव कैसे लड़ सकता है?

इस देश के अधिकतर दलों और नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के ख़िलाफ़ दबे स्वर में विरोध प्रकट किया है. पर सपा नेता रामगोपाल यादव ने अपने स्वभाव के अनुसार खुलकर इस निर्णय का विरोध किया.

उन्होंने कहा है कि दूसरी राजनीतिक पार्टियों को साथ लेकर वे संविधान में संशोधन के लिए दबाव डालेंगे ताकि राजनीतिज्ञों को चुनाव लड़ने से कोई न रोक पाए.

Image caption सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का मुखर विरोध कर रहे हैं मुलायम सिंह यादव

इसी साल अप्रैल में मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि द्रमुक के अध्यक्ष करुणानिधि ने केंद्र में यूपीए सरकार को समर्थन दिया तो उनकी बेटी और उन्हीं की पार्टी के एक मंत्री को केंद्र सरकार ने फँसा कर जेल में भेज दिया.

राजनीतिक दलों का विरोध

मुलायम ने आगे कहा कि परमाणु डील के दौरान हमने केंद्र सरकार को गिरने से बचाया लेकिन समर्थन देते ही हमारे पीछे सीबीआई को लगा दिया गया.

याद रहे कि डीएमके नेताओं और ख़ुद मुलायम के ख़िलाफ़ सीबीआई केंद्र सरकार नहीं बल्कि अदालत के आदेश से भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही है.

इस बात को जानते हुए भी मुलायम इसके लिए केंद्र सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं.

याद रहे कि इस मामले में अधिकतर नेताओं का समाजवादी पार्टी को मौन व मुखर समर्थन है. इसी तरह कुछ समय पहले संसद में लालू और मुलायम जैसे ही कुछ नेताओं ने टीम अन्ना पर आरोपों की बौछार की, पर अन्य अधिकतर नेताओं का मौन समर्थन भी उन्हें हासिल था.

नतीजतन जनलोकपाल विधेयक की बात आई-गई हो गई. संभव है कि समाजवादी पार्टी इस काम के लिए इस बार संविधान संशोधन लायक समर्थन जुटा ले.

'संसद का इस्तेमाल'

मुलायम जैसे नेताओं का मनोबल इसलिए भी बढ़ा हुआ है क्योंकि पहले भी अपने राजनीतिक व व्यक्तिगत स्वार्थ में अदालतों के निर्णयों को पलटने के लिए निहित स्वार्थी नेताओं ने संसद का इस्तेमाल किया है. क्योंकि राजनीतिक शुचिता के किसी भी प्रयास को विफल कर देने के लिए इस देश के अधिकतर दल और नेतागण हमेशा तत्पर रहते हैं.

1975 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भ्रष्ट चुनावी आचरण के आरोप में इंदिरा गांधी का लोक सभा का चुनाव रद कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें कोई ख़ास राहत नहीं दी. आपातकाल लगाकर चुनाव क़ानून की उन दो धाराओं को ही बदलवा दिया गया जिनके तहत इंदिरा गाँधी का चुनाव रद्द हुआ था.

संसोपा के राजनारायण की चुनाव याचिका की सुनवाई के बाद इंदिरा गांधी पर चुनाव क़ानून तोड़ने के दो आरोप अदालत में साबित हो गए थे. एक तो रायबरेली में उनकी चुनावी सभा के लिए मंच का निर्माण सरकारी ख़र्चे से हुआ.

दूसरा यह कि केंद्र सरकार के एक अधिकारी यशपाल कपूर ने इंदिरा गांधी के चुनाव एजेंट के रूप में काम किया था. संबंधित चुनाव क़ानून की संबंधित धाराओं में संशोधन के बाद सुप्रीम कोर्ट को इंदिरा गांधी को उन आरोपों से मुक्त कर देना पड़ा.

नेताओं का निहित स्वार्थ

Image caption सभी राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं

इस घटना के बाद देश में चुनावों में धांधली बढ़ी है. दरअसल अब कैश, कास्ट और क्रिमिनल चुनाव के अनिवार्य अंग बन चुके हैं और इस स्थिति को बनाए रखने में अधिकतर नेताओं का अब निहित स्वार्थ बन चुका है.

राजीव गांधी के शासन काल में शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिए संसद ने मुस्लिम वूमेन (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स ऑन डायवोर्स) एक्ट, 1986 पास कर दिया.

उससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश की 62 साल की एक महिला शाहबानो को गुज़ारा ख़र्च देने का आदेश उसके पति को दिया था. याद रहे कि पति ने उसे तलाक़ दे दिया था. इस फ़ैसले का मुस्लिम संगठनों ने यह कहते हुए सख्त विरोध किया था कि यह इस्लामी क़ानून के ख़िलाफ़ है.

राजीव सरकार ने एक ख़ास वोट बैंक को ख़ुश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निरर्थक बनवाया था जबकि संविधान के नीति निदेशक तत्व वाले अनुच्छेद 44 में यह कहा गया है कि राज्य भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा.

2002 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि उम्मीदवारों को अपने नामांकन पत्र के साथ शैक्षणिक योग्यता, आर्थिक स्थिति और आपराधिक रिकार्ड के विवरण देने होंगे.

इस आदेश को निरर्थक बनाने के लिए अटल सरकार ने संबंधित क़ानून में संसद से परिवर्तन करवा दिया. सुप्रीम कोर्ट ने उस परिवर्तन को उलट दिया. ऐसे कई और अन्य उदाहरण हैं.

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